अफसरों की मेहरबानी में उलझा जन कल्याण, 350 से अधिक शिकायतें दर्ज

फिर भी संस्था के संचालकों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई
इंदौर। इंदौर में गृह निर्माण सहकारी संस्थाओं की मनमानियो के खिलाफ शिवराज सरकार ने अभियान तो छेड़ दिया लेकिन ऐसी कई संस्था संस्थाएं हैं जिन्हें अफसर ही बचा रहे हैं। इनमें जनकल्याण गृह निर्माण सहकारी संस्था प्रमुख है। 350 से अधिक शिकायतें दर्ज होने के बावजूद जिला प्रशासन और सहकारिता विभाग संस्था के खिलाफ कोई कार्रवाई करने को तैयार नहीं है। कार्रवाई के नाम पर सिर्फ टालमटोल जारी है।

दो संस्थाओं की जमीनों को बेचने वालों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करके कलेक्टर मनीष सिंह भूमाफियाओं के खिलाफ अपने इरादे स्पष्ट कर दिए। शिकायतें लेने और बाद में जांच के नाम पर संचालकों से वसूली करके बैठने वाले अफसरों से परेशान जनकल्याण गृह निर्माण सहकारी संस्था के सदस्यों को सिंह से उम्मीद है। सदस्यों की माने तो अब तक 350 से अधिक शिकायतें कर चुके हैं। इनमें 125 शिकायतें जनवरी 2020 में की थी। सदस्यों ने बताया कि वे 1981 में सोसायटी के सदस्य बने थे, लेकिन आज तक उन्हें प्लॉट नहीं मिले। संस्था के संचालकों ने पात्र सदस्यों को प्लॉट न देकर कथित रूप से जमीन बेच दी और अपात्र लोगों को प्लॉट दे दिए। नाले सहित कई सरकारी जमीन भी बेच दी। सहकारिता विभाग के अधिकारी संस्था संचालक मनीष अग्रवाल पर मेहरबान रहे। जमीन की लूट का तमाशा देखते रहे। सदस्यों ने जितनी भी शिकायतें की। जांच के नाम पर अधिकारियों ने उनकी सौदेबाजी कर ली। इसीलिए सदस्यों का कहना है कि उन्हें सहकारिता विभाग पर भरोसा नहीं है। इस मामले में कलेक्टर संज्ञान ले और संस्था संचालकों की मनमानी पर अंकुश लगाएं। सदस्यों के हक पर डाका डालने वालों के खिलाफ कार्रवाई करें।

लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू भी नाम के…
सदस्यों का कहना है कि संस्था संचालकों की मनमानी के खिलाफ लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू तक में शिकायतें की गई. दोनों जांच एजेंसियों ने जांच के नाम पर सदस्यों से ही दस्तावेजी प्रमाण मांगे लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं की।

सीएम की आंखों में जो की धूल
सहकारिता विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत के चलते जनकल्याण गृह निर्माण सहकारी संस्था के संचालक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की आंखों में धूल झोंक चुके हैं। 2011 में संस्था ने उस जमीन पर मुख्यमंत्री के हाथों प्लाट बटवा दिए जो विवादित थी। इसीलिए सीएम के हाथों आवंटन पत्र मिलने के 10 साल बाद भी सदस्य प्लॉट के लिए परेशान हैं।

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