राजनीति के चलते कृषि सुधारों में देरी किसानों को अंधेरे की ओर धकेल देगी : प्रधानमंत्री

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को राज्यसभा से एक बार फिर किसानों और उनके पक्ष में राजनीति कर रहे विपक्षी दलों से कृषि सुधारों के प्रति सकारात्मक रुख अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि हरित क्रांति की तरह ही वर्तमान में किए जा रहे कृषि सुधार भविष्य में किसानों की समृद्धि के लिए हैं। राजनीति के चलते इन सुधारों में होने वाली देरी किसानों को अंधेरे में धकेल देगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा का उत्तर देते हुए कोरोना काल, आत्मनिर्भर भारत, कृषि सुधारों, और किसानों के हित में सरकारी की ओर से किए जा रहे प्रयासों का जिक्र किया।

किसान आंदोलन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और डॉ मनमोहन सिंह के कथनों का उदहरण देते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि चौधरी चरण सिंह ने कहा था कि देश के 51 प्रतिशत किसानों के पास एक हेक्टर भूमि भी नहीं है और आज यह प्रतिशत बढ़कर 68 हो गया है। उन्होंने उस समय कहा था कि हम कितना भी प्रयास कर लें किसान अपनी छोटी जमीन से गुजर-बसर नहीं कर सकते। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह का मानना था कि किसानों को उनके ढंग से कृषि उपज बेचने की आजादी मिलनी चाहिए और देश को एक बाजार बनाना चाहिए। उन्होंने इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें भी अपने कालखंड में कृषि सुधारों के चलते दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। उस समय भी वामपंथी दल इन सुधारों का विरोध करते हुए सरकार को अमेरिका परस्त बता रही थे। आज कृषि सुधारों का जिम्मा उन्होंने उठाया है और उसके लिए भरे ही उन्हें कुछ कहा जाए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि राजनीति के चलते वर्तमान में विचार पीछे रह गए हैं। हर सरकार किसान कृषि सुधारों की वकालत करती आई है। दो दशक से लगातार चल रही इन्हीं कोशिशों के चलते आज कुछ निर्णय लिया गया है। आंदोलन के मुद्दों पर सरकार को घेरना ठीक है लेकिन विपक्षी दलों को किसानों को यह भी समझाना चाहिए कि वर्तमान में सुधारों की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र से जुड़ी हुई समस्याओं का समाधान हमें स्वयं ही करना होगा। जहां तक कानून का प्रश्न है यह केवल सुधार की दृष्टि से किए गए हैं और किसी समस्या आने पर या सही परिणाम ना आने पर इनमें आगे भी सुधार हो सकता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्तमान में हमें यह विचार करने की जरूरत है कि क्या हम समस्या का हिस्सा है या समाधान का। समस्या का हिस्सा बनने पर राजनीति चल जाएगी लेकिन समाधान का हिस्सा बनने पर राष्ट्र नीति को चार-चांद लग जाएंगे। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन क्या है इस पर विपक्षी दलों के नेताओं ने चर्चा की है लेकिन किसी ने भी यह चर्चा नहीं की कि किसान आंदोलन किस कारण से जारी है। उन्होंने कहा कि कृषि मंत्री ने कुछ प्रश्न उठाए हैं जिनका विपक्ष और किसान आंदोलनकारियों की ओर से कोई जवाब नहीं आया है।

लोकतंत्र के मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिशों पर प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र ही नहीं बल्कि दुनिया में लोकतंत्र का जनक भी हैं। ऐसा इसीलिए है कि हमारा मन लोकतांत्रिक है। इसी के चलते हमने आपातकाल के बाद भी लोकतंत्र की बहाली की थी।

विपक्षी दलों को सुनने की नसीहत देते हुए राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री ने कहा कि सदन में इस पर 14 घंटें चर्चा चली जिसमें 50 से अधिक सदस्यों ने भाग लिया। अच्छा होता कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के समय सभी सदस्य वहां मौजूद रहते। राष्ट्रपति जी के कथन में विचारों और आदर्शों की ऐसी ताकत थी कि ना सुनने के बावजूद भी उनकी बात विपक्ष तक पहुंच गई।

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