सुप्रीम कोर्ट ने मप्र लव जिहाद कानून की याचिका पर सुनवाई से इंकार

कहा- हाई कोर्ट से करें सम्पर्क

मांगीलाल चौहान, इंदौर। सुप्रीम कोर्ट ने उस रिट याचिका पर सुनवाई करने से इंकार कर दिया जिसमें धार्मिक रूपांतरण और अंतर-धार्मिक विवाह से संबंधित मप्र धार्मिक स्वतंत्रता अध्यादेश 2020 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। देश के मुख्य न्यायाधिपति की अध्यक्षता वाली पीठ ने रिट याचिका पर कहा-“मप्र हाईकोर्ट से संपर्क करें। हम हाईकोर्ट के विचार जानना चाहेंगे। हमने इसी तरह के मामलों को हाईकोर्ट को वापस भेजा है।”

शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से याचिका वापस लेने को कहा और हाई कोर्ट में याचिका स्थानांतरित करने की स्वतंत्रता दी। गौरतलब है मप्र हाई कोर्ट ने पहले ही (30 जनवरी को) धार्मिक स्वतंत्रता अध्यादेश 2020 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है।याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि उत्तर प्रदेश द्वारा ‘लव जिहाद’ के नाम पर बनाया गया इसी तरह का अध्यादेश (उत्तर प्रदेश निषेध धर्म परिवर्तन अध्यादेश 2020) व्यक्ति की निजता और पसंद की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है जिससे भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) (ए) और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उप्र के इसी प्रकार के अध्यादेश के खिलाफ पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ( पीयूसीएल) द्वारा दायर की गई एक ऐसी ही याचिका पर विचार करने से इंकार कर दिया था। याचिकाओं में पारित उत्तर प्रदेश निषेध धर्म परिवर्तन अध्यादेश 2020 और उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट, 2018 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ‘जमीयत उलेमा-ए-हिंद’ (इस्लामिक विद्वानों की एक संस्था) को उत्तर प्रदेश निषेध धर्म परिवर्तन अध्यादेश 2020 और उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट, 2018 और अन्य राज्यों द्वारा बनाए गए इस प्रकार के कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं में प्रतिवादी के रूप में खुद को जोड़ने की अनुमति दी।

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