देश के 254 गांव दशकों से लॉकडाउन जैसी स्थिति में

कोलकाता

कोरोना की वजह से भारत में 50 दिनों से लॉकडाउन है। आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन भारत-बांग्लादेश सीमा पर कई गांव ऐसे हैं जो कई पीढ़ियों और दशकों से लॉकडाउन जैसी स्थिति में रह रहे हैं। सीमा पर ये गांव नो मैस लैंड पर हैं, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर लगी कंटीले तारों की बाड़ के दूसरी ओर। यहां के लोग पहले तय समय पर ही बाड़ में बने गेट के जरिए आवाजाही कर सकते थे, लेकिन अब कोरोना की वजह से उनके बाहर निकलने पर पाबंदी है। बेहद इमरजेंसी में ही सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के लोग उनको बाहर आने की अनुमति देते हैं। ऐसा देश के विभाजन के समय सीमा के बंटवारे की वजह से हुआ है। बंगाल और बांग्लादेश की सीमा पर बसे ऐसे 254 गांवों के लगभग 70 हजार लोग साल के 365 दिन लॉकडाउन जैसी स्थिति में ही रह रहे हैं।

देश के विभाजन के समय रेडक्लिफ आयोग को सीमा तय करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी( लेकिन इस आयोग के प्रमुख सर रेडक्लिफ पहले न तो कभी भारत आए थे, न ही उनको यहां के बारे में कुछ पता था। ऐसे में उन्होंने जिस अजीबोगरीब तरीके से सीमाओं का बंटवारा किया, उसका खामियाजा आज तक लोगों को भरना पड़ रहा है। खासकर पश्चिम बंगाल और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तो सैकड़ों गांव ऐसे हैं जिनका आधा हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान में चला गया और बाकी आधा भारत में रह गया। यहीं तक रहता तो भी गनीमत थी। सीमावर्ती इलाकों के गावों में तो कई घर ऐसे हैं जिनका एक कमरा अगर भारत में है तो दूसरा बांग्लादेश में।

दस जिलों में फैली है सीमा

भारत से लगी बांग्लादेश की 4,096 किमी लंबी सीमा में से 2,216 किमी अकेले बंगाल के उत्तर से दक्षिण तक फैले दस जिलों से लगी है। सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाए जाने के बाद कोई 254 गांवों के 70 हजार लोग बाड़ के दूसरी ओर ही रह गए। बाड़ में लगे गेट भी उनके लिए निश्चित समय के लिए ही खुलते हैं। ऐसे में सात दशकों से हजारों लोग लॉकडाउन जैसी हालत में जिंदगी गुजार रहे हैं। जलपाईगुड़ी जिले के हल्दीबाड़ी इलाके में तो कई कुएं ऐसे हैं, जिनका आधा हिस्सा बांग्लादेश में है। सड़कों का भी यही हाल है। टमाटर की पैदावार के लिए मशहूर इस इलाके में ज्यादातर घर ऐसे ही हैं जिनका मुख्यद्वार भारत में खुलता है तो पिछला दरवाजा बांग्लादेश में।

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