प्रदेश की जेलों में 37 बंदी अब भी फांसी के फंदे से दूर

धर्मेंद्र पैगवार | भोपाल

निर्भया के हत्यारों का डेथ वारंट बनने के बाद अब पूरे देश में जघन्य अपराधों के मामले में फांसी की सजा पा चुके दरिंदों को लटकाने की मांग तेज हो गई है। मप्र की 5 सेंट्रल जेलों में 37 ऐसे अपराधी हैं, जिन्हें निचली अदालतें जघन्य अपराधों में फांसी की सजा सुना चुकी हैं। ये सभी आरोपी ऊपरी अदालतों में कानूनी दांव पेंच के साथ बचे हुए हैं। ऐसे सर्वाधिक 13 बंदी इंदौर में और 12 जबलपुर जेल में हैं। इन 37 अपराधियों में से 24 बलात्कार और हत्या के दोषी हैं। जेल प्रशासन को ऐसे बंदियों के लिए विशेष ऐहतियात बरतना पड़ रहा है।

दिल्ली में हुए निर्भया हत्याकांड के बाद पूरे देश में बच्चियों से बलात्कार और हत्या के मामलों में आरोपियों को फांसी की सजा, वह भी जल्द से जल्द देने की मांग तेजी से उठी है। सिवनी के फिरोज खान ने बलात्कार के बाद एक बच्ची की हत्या कर दी थी। 2013 में उसे जिला न्यायालय ने फांसी की सजा दी। उसकी अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। 7 साल में निचली अदालत का फैसला बड़ी अदालतों की तारीखों में अटका है। खंडवा का अनोखीलाल बलात्कार और हत्या के मामले में दोषी है। 7 साल पहले उसे जिला न्यायालय ने फांसी की सजा दी थी, वह फांसी के फंदे से अभी भी दूर है।

इसी तरह मप्र की जेलों में कुल 37 अपराधी ऐसे हैं, जिन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, लेकिन हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील के दौरान ये मामले लंबित हैं। इनमें से चार अपराधी ऐसे हैं, जिन्होंने नाबालिग बच्चियों के साथ वारदातों को अंजाम दिया। इंदौर सेंट्रल जेल में फांसी की सजा पा चुके 13 अपराधी बंद हैं। इनमें से सात हत्या और बलात्कार के दोषी हैं। जबलपुर में 12 बंदी हैं, जिन्हें फांसी की सजा मिली है। इनमें से भी सात पर हत्या और बलात्कार के दोष सिद्ध हो चुके हैं।

हर बंदी की होती है विशेष निगरानी

प्रदेश की जेलों में बंद जिन 37 बंदियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। जिन अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी होती है, उन पर विशेष निगरानी रखी जाती है। उन्हें अन्य बंदियों से अलग रखा जाता है। संजय चौधरी, महानिदेशक, जेल

ऊपरी अदालतों में भी हो समय सीमा निर्धारित

मृत्यु दंड के मामले विशेष प्रकृति के होते हैं। जिला अदालतों के बाद ऊपरी कोर्ट में भी उनकी एक निश्चित समय-सीमा तय हो। यह पीड़ित पक्ष और समाज के लिए ठीक रहेगा। समाज में एक अच्छा संदेश तो जाएगा ही, कानून का खौफ बनेगा। पुरुषेंद्र कौरव, पूर्व महाधिवक्ता, मध्यप्रदेश

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