एक अकेला इस शहर में रात में और दोपहर में

देवमणि पांडेय 

भूपेंद्र को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ ही पाश्चात्य संगीत की गहरी समझ है। दोनों के तालमेल से अपनी गायिकी और संगीत रचना में उन्होंने अद्भुत असर पैदा किया। सोज़, सुर और शोख़ी में भीगी हुई उनकी आवाज़ फ़ौरन दिल की गहराइयों में उतर जाती है।

संगीतकार मदन मोहन ने दिल्ली की एक घरेलू महफ़िल में एक नौजवान को गिटार बजाते और गाते देखा था। सन् 1964 में चेतन आनंद की फ़िल्म “हक़ीक़त’ का एक गीत गाने के लिए उन्होंने इस नौजवान को मुंबई बुलाया। इसे एक आश्चर्यजनक घटना के रूप में देखा गया। मदन मोहन को इस नौजवान की प्रतिभा पर यक़ीन था। मो. रफ़ी के साथ इस नौजवान ने गीत गाया- होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा। रातों रात यह नौजवान बॉलीवुड में भूपेंद्र सिंह के नाम से मशहूर हो गया। भूपेंद्र वापस दिल्ली लौट गए। फ़िल्म हक़ीक़त का यह गीत लोकप्रिय हो गया। दोस्तों ने दबाव डाला कि उन्हें अपनी प्रतिभा के उचित इस्तेमाल के लिए मुंबई जाना चाहिए। आख़िर भूपेंद्र मुंबई वापस लौटे।

भूपेंद्र की शख़्सियत से चेतन आनंद इतने प्रभावित थे कि उन्होंने फ़िल्म “आख़िरी ख़त’ में भूपेंद्र को एक म्यूज़िकल हीरो के रूप में काम करने का प्रस्ताव दिया। भूपेंद्र को लगा कि वे सिर्फ़ संगीत के लिए बने हैं। अभिनय का प्रस्ताव उन्होंने विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। फ़िल्म “आख़िरी ख़त’ में संगीतकार ख़य्याम ने उनसे सोलो गीत गवाया- “रुत जवां जवां रात मेहरबां’। चेतन आनंद ने कैफ़ी आज़मी के लिखे इस गीत को भूपेंद्र पर फ़िल्माया। दुबले-पतले, लम्बे नौजवान गायक भूपेंद्र को गिटार बजाकर एक पार्टी में इस पार्टी सांग को गाते हुए देखना बड़ा मज़ेदार लगता है। इसके साथ ही भूपेंद्र ने मुंबई को और मुंबई ने उनको हमेशा के लिए अपना बना लिया।

भूपेंद्र को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ ही पाश्चात्य संगीत की गहरी समझ है। दोनों के तालमेल से अपनी गायिकी और संगीत रचना में उन्होंने अद्भुत असर पैदा किया। सोज़, सुर और शोख़ी में भीगी हुई उनकी आवाज़ फ़ौरन दिल की गहराइयों में उतर जाती है।

भूपेंद्र को वाद्य यंत्रों की भी अच्छी जानकारी है। कैरियर की शुरुआत में उन्होंने गिटार और वायलिन से फ़िल्म संगीत को सजाया। उन्हें एक बेहद मुश्किल वाद्य “रबाब’ बजाने के लिए बुलाया जाता था। संगीतकार कुलदीप सिंह के अनुसार भूपेंद्र ने “रबाब’ को बहुत ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया। उनके बाद दूसरा कोई उस स्तर को नहीं छू पाया तो फ़िल्म संगीत में ‘रबाब’ का बजना ही बंद हो गया। एक गायक के रूप में कामयाब होने के बाद भूपेंद्र ने वाद्य यंत्रों से विदा ले ली। जिन गीतों में उनके गिटार की तरंग है उसे सुनकर आज भी दिल के तार झंकृत हो जाते हैं ऐसे चंद गीत हैं- दम मारो दम (हरे रामा हरे कृष्णा), वादियां मेरा दामन (अभिलाषा), चुरा लिया है तुमने (यादों की बारात), चिंगारी कोई भड़के (अमर प्रेम), महबूबा ओ महबूबा (शोले), तुम जो मिल गए हो (हंसते ज़ख़्म) आदि।

भूपेंद्र की आवाज़ का जादू आज भी बरकरार है। उनकी आवाज़ में वह “खरज़’ है जिससे श्रेष्ठ गायकी का आधार माना जाता है। ज़बरदस्त रियाज़ से भूपेंद्र ने अपनी आवाज़ को इस तरह ढाला है कि एक बार सुनने के बाद उनकी आवाज़ हमेशा के लिए याद रह जाती है। यह कहा जाता है कि उनकी आवाज़ ही उनकी पहचान है। भूपेंद्र एक ऐसे बहुआयामी गायक हैं जिनसे किसी भी रंग के गीत गवाए जा सकते हैं।

भूपेंद्र का जन्म अमृतसर में 6 फरवरी 1940 को हुआ। पिता प्रो नत्था सिंह मशहूर गायक थे। वे पंजाबी क्लासिकल गाते थे। भूपेंद्र को संगीत की प्रारंभिक शिक्षा पिताजी से मिली। बचपन दिल्ली में बीता। शिक्षा भी यहीं हुई। यहां उन्होंने उस्ताद के एल तहीन से शास्त्रीय संगीत सीखा। भूपेंद्र बचपन से ही गिटार बजाते थे। अपने छात्र जीवन में वे दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में गिटार वादक के रूप में बहुत लोकप्रिय थे। मंच पर गिटार बजाने के साथ ही वे शास्त्रीय गायन भी करते थे। बचपन से ही उनको संगीत रचना का भी शौक़ था। भूपेंद्र के दिलों दिमाग़ पर संगीत का ऐसा असर हुआ कि उन्होंने मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़ दी। पूरी तरह संगीत के होकर रह गए। मगर उनके मन में व्यवसायिकता नहीं थी। वे मंचों पर निशुल्क कार्यक्रम देते थे।

 

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