एक पद्मश्री उनके नाम जिन्होंने फल बेच कर जुटाए रुपयों से बच्चों के लिए खोला विद्यालय

विभव देव शुक्ला

गणतन्त्र दिवस से ठीक एक दिन पहले पद्म पुरस्कारों का ऐलान हुआ। इस बार कई नाम ऐसे थे जिन पर चर्चा फिलहाल जारी है, जिन नामों की कल्पना करना किसी के लिए भी मुश्किल था। ऐसा ही एक नाम है हरेकाला हजाब्बा, जो पेशे से फल विक्रेता हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि एक फल विक्रेता ने ऐसा क्या किया जिसकी वजह से उन्हें पद्मश्री मिला।

कभी नहीं गए विद्यालय
कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ ज़िले में रहने वाले 68 वर्षीय हरेकाला जी की एक छोटी सी फल की दुकान है। उन्होंने महज़ फल की दुकान से होने वाली कमाई की बदौलत अपने इलाके में एक प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय खुलवाया है। ताज्जुब वाली बात यह है कि अब वह अपने क्षेत्र में एक विश्वविद्यालय खोलने की तैयारी कर रहे हैं। लोगों को यह जान कर भी आश्चर्य होता है कि वह शिक्षित नहीं हैं इसके बावजूद शिक्षा को लेकर उनका नज़रिया ऐसा है।

मस्जिद में बच्चों की पढ़ाई का इंतज़ाम
जिस तरह हर बड़ी पहल के पीछे कोई छोटी घटना होती है जिसके चलते पहल उपजती है ठीक वैसे ही इस पहल की नींव में एक किस्सा है। एक बार हरेकाला की दुकान पर एक विदेशी जोड़ा फल खरीदने आया और उन्होंने अपनी भाषा में हरेकाला से फल मांगा। हरेकाला को उनकी भाषा नहीं समझ आई जिसके बाद विदेशी जोड़ा उनकी दुकान से चला गया।
इस घटना के बाद उन्हें महसूस हुआ कि ऐसा किसी और के साथ नहीं होना चाहिए। अंततः उन्होंने फैसला किया कि वह बच्चों की पढ़ाई के लिए विद्यालय शुरू करेंगे। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले गाँव वालों से बात की और गाँव की ही एक मस्जिद में बच्चों के पढ़ने का इंतज़ाम किया।

बच्चों के लिए की तमाम कोशिशें
धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ी और फिर एक विद्यालय की ज़रूरत महसूस हुई। छुट्टियों में वह विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों और उनकी पढ़ाई से जुड़ी सुविधाएं बेहतर कराने के लिए गाँव से 25 किलोमीटर दूर ज़िला पंचायत कार्यालय जाते थे। वह अधिकारियों से मिल कर हमेशा बस एक ही बात कहते थे कि बच्चों को जितनी सुविधाएं मिल सकती हों वह ज़रूर मिलें। उनकी ज़्यादातर मांगों पर विचार हुआ और वह स्वीकारी भी गईं।

खुद करते हैं विद्यालय की सफाई
उनकी कोशिशों के चलते ही साल 2008 में ज़िला प्रशासन ने दक्षिण कन्नड़ ज़िला पंचायत के अंतर्गत आने वाले नयापुडु गाँव में माध्यमिक विद्यालय भी बनवाया गया। बच्चों की शिक्षा के प्रति उनका जुनून इस कदर था कि वह सुबह जल्दी उठते और विद्यालय पहुँच कर खुद साफ-सफाई करते थे।
इतना ही नहीं बच्चों के लिए साफ पीने का पानी खुद से उबालते हैं। 2014 में ज़िले के मंडलायुक्त एबी इब्राहिम ने कहा था कि हरेकाला पद्मश्री के हक़दार हैं। अंततः साल 2015 में उपायुक्त ने उनका नाम पद्मश्री पुरस्कार के लिए नामांकित किया था।

नहीं समझ आई हिन्दी
हरेकाला की उम्र 68 साल है और 3 बच्चों के पिता भी हैं। उनकी जीवनी मंगलोर विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती है, जिससे पढ़ने वाले छात्रों को उनकी ज़िन्दगी से सीख मिले। एक समाचार समूह से बात करते हुए उन्होंने कहा उनके पास गृह मंत्रालय से फोन आया। वह हिन्दी में बात कर रहे थे और फिर उन्हें कुछ समझ नहीं आया। लेकिन बाद में उन्हें किसी और ने बताया कि उनको पद्मश्री पुरस्कार मिलने वाला है। उनका कहना था कि इस बारे में उन्हे बहुत जानकारी नहीं थी पर पुरस्कार का सुन कर उन्हें बहुत खुशी हुई।

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