सरकारी अस्पतालों की लापरवाही से ख़त्म हो गया एक पूरा परिवार


नितेश तापड़िया | बाग

गर्भवती का चार अस्पतालों में इलाज नहीं हुआ, अंत बेहद दुःखद

बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार के प्रयास उस समय बौने साबित होते हैं, जब 210 किमी से अधिक और चार सरकारी अस्पताल भटकने के बाद भी एक गर्भवती को भर्ती नहीं किया गया। एक जिला अस्पताल और दो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में उसे उपचार नहीं मिलता है। गर्भवती पत्नी को लेकर एक लाचार शख्स पूरी रात इस अस्पताल से उस अस्पताल घूमता रहा। इसी मशक्कत के दौरान पहले पत्नी और बाद में नवजात की मौत हो गई। पत्नी व नवजात बेटे के गम में पति ने भी फांसी लगाकर ख़ुदकुशी कर ली। इस तरह एक पूरे परिवार का दुखद अंत हो गया।

बाग के नजदीकी ग्राम देवधा निवासी महेश भूरिया अपनी गर्भवती पत्नी रेखा को लेकर पहले बाग, फिर वहां से कुक्षी, फिर बड़वानी, धामनोद और फिर अंत में इंदौर पहुंचा। तीन बार एंबुलेंस बदली और 210 किमी से ज्यादा पूरी रात भटका। फिर भी अपनी पत्नी और नवजात बेटे को नहीं बचा पाया। पत्नी और बेटे को खोने की पीड़ा वह सहन नहीं कर पाया। बेटे की मौत के एक घंटे बाद उसने भी फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। ये घटना दर्शाती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी सुरक्षित प्रसव को लेकर अस्पतालों के क्या हाल हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था और सरकारी लापरवाही एक परिवार को इस तरह भुगतना पड़ी। महेश के पिता ईमान भूरिया ने बताया कि उनके बेटे महेश की पत्नी रेखा को 9 माह पूरे होने पर प्रसव पीड़ा हुई। उसे 11 फरवरी को मोटर साइकिल से बाग के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। वहां से लगभग 2-3 घंटे के बाद रेखा को एंबुलेंस से कुक्षी अस्पताल भेज दिया गया। कुक्षी में एक सलाइन चढ़ाई गई और वहां से रात 10 बजे बड़वानी के जिला अस्पताल रेफर कर दिया। बड़वानी में फिर एक सलाइन चढ़ाई गई और रात 12 बजे बाद वहां से एमवाय इंदौर रवाना कर दिया।

एंबुलेंस में ही हो गई प्रसूति

बड़वानी से निकलने के एक घंटे बाद रास्ते में एंबुलेंस में ही रेखा को प्रसूति हो गई। उस समय महिला के माता-पिता, सास-ससुर और पति साथ में थे। फिर महिला को करीब आधे घंटे के सफर के बाद धामनोद अस्पताल तक लाया गया। इस दौरान उसे बड़ी मात्रा में रक्त स्त्राव होता रहा। लेकिन, लापरवाही की हद तो तब नजर आई, जब धामनोद के सरकारी अस्पताल में पहुंचने के बाद महिला को वहां एडमिट नहीं किया गया। एंबुलेंस में ही उसकी नाल साफ कर तत्काल एमवाय पहुंचने की सलाह दी गई।

खून की कमी से हुई मौत

धामनोद से रवाना होने के बाद किस्मत का मारा यह परिवार सुबह 8 बजे एमवाय अस्पताल इंदौर पहुंचा। यहां महिला के शरीर में खून की कमी बताई गई। एमवाय आते-आते महिला की हालत इतनी बिगड़ चुकी थी कि उसे सीधे आईसीयू में दाखिल करना पड़ा। यहां खून चढ़ाया गया। 7 दिन एमवाय अस्पताल में भर्ती रहने के बाद 18 फरवरी को महिला की मौत हो गई। परिजन शव के साथ नवजात को लेकर अपने गांव देवधा पहुंचे। यहां शिशु का एक सप्ताह लालन-पालन चला और अचानक जन्म के 16वें दिन नवजात बालक की भी मौत हो गई।

पिता और पुत्र का एक ही चिता पर हुआ अंतिम संस्कार

महेश अपनी पत्नी की मौत के गम से उबर भी नहीं पाया था कि अचानक नवजात की मौत ने उसे गहरे सदमे में डाल दिया। 27 फरवरी की सुबह बालक की मौत के बाद परिवार के लोग जमा हुए ही थे कि एक घंटे बाद महेश ने फांसी लगा ली। इसी दिन पिता और नवजात शिशु का अंतिम संस्कार एक ही चिता पर किया गया। 11वीं तक पढ़े महेश ने अपनी अंतिम इच्छा मोबाइल में रिकाॅर्ड की है। उसने कहा कि बस मेरी लाइफ यहीं तक थी। माता-पिता आप टेंशन मत लेना। मैं अब जिंदा नहीं रह सकता। महेश की शादी को 10 माह ही हुए थे। उसके काका शंकर बताते हैं कि महेश की शादी की बात कई जगह चली, लेकिन वह रेखा से प्यार करता था, इसलिए हमने रेखा से ही उसकी शादी की। लेकिन, अफसोस कि एक खुशहाल परिवार सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़ गया।

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