एक्टिंग की नर्सरी को मिला एक बुजुर्गवार बागबान

विनोद नागर

एनएसडी में परेश रावल की नियुक्ति को मीडिया का एक तबका भाजपा से नजदीकियों का प्रतिसाद निरूपित कर सकता है। इसे केतन मेहता की सरदार (1993) में वल्लभभाई पटेल को जीवंत करने का विलंबित पुरस्कार भी माना जा सकता है।

बॉलीवुड में सुशांत राजपूत की मौत पर कंगना रनौत के बयानों से उठे बवंडर ने जब पंगा क्वीन के दफ्तर में बीएमसी द्वारा की गई तोडफ़ोड़ के बाद शिवसेना और महाराष्ट्र के राजनीतिक हल्कों को अपनी चपेट में ले रखा था, उसी बवाल के बीच परेश रावल को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में चेयरमैन नियुक्त करने की खबर नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई। पैंसठ वर्षीय गुणी अभिनेता को एनएसडी का अध्यक्ष बनाया जाना स्वागत योग्य है। पर उनके सुदीर्घ अनुभव का कितना लाभ एनएसडी को मिल पायेगा, फिलवक्त कह पाना मुश्किल है।

हवाई यात्रा दिल्ली से मुम्बई का सफर तो आसान करती है, पर दूरी कम नहीं करती। फिर परेश अभी भी फिल्मों में उतने ही सक्रिय हैं, जितने वे छह साल पहले भाजपा के टिकट पर अहमदाबाद से लोकसभा के लिए चुने जाते समय थे। हालांकि तब भी उन्होंने फिल्मों में काम करना जारी रखा और निर्वाचित जनप्रतिनिधि की भूमिका भी ईमानदारी से निभाने का भरसक प्रयास किया था। इसलिए यह मानने में हर्ज नहीं कि परेश रावल की नियुक्ति से एक्टिंग की नर्सरी को एक बुजुर्गवार बागबान मिला है।

अब यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा कि परेश की यह नियुक्ति कहीं सुरखाब के पर सरीखी साबित न हो। सनद रहे कि दशकों पूर्व सरकार ने ह्रषिकेश मुखर्जी को नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन (एनएफडीसी) के अध्यक्ष पद से नवाजा था। जया बच्चन और अमोल पालेकर चिल्ड्रन्स फिल्म सोसायटी के अध्यक्ष रह चुके हैं। गीतकार प्रसून जोशी अभी जिस फिल्म सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष हैं, कभी शर्मिला टैगोर और आशा पारेख भी उस पद को सुशोभित कर चुकी हैं।

मीडिया का एक तबका इसे परेश रावल की भाजपा से नजदीकियों का प्रतिसाद निरूपित कर सकता है। इसे केतन मेहता की सरदार (1993) में वल्लभभाई पटेल और को जीवंत करने का विलंबित पुरस्कार भी माना जा सकता है। हालांकि आगे चलकर परेश निर्माता के रूप में न केवल नरेन्द्र मोदी की बायोपिक बनाना चाहते थे बल्कि उसमें केन्द्रीय भूमिका भी निभाने वाले थे। लेकिन बात नहीं बनी। अंततः पिछले साल प्रदर्शित निर्माता ओमंग कुमार की विवेक ओबेरॉय अभिनीत ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ को आशातीत सफलता न मिली। उधर  ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का सजीव किरदार निभाने वाले अनुपम खेर से भी सत्तारूढ़ दल का मोहभंग हो गया। गौरतलब है कि परेश रावल से पहले अनुपम खेर भी एनएसडी के अध्यक्ष रह चुके हैं। हालांकि भाजपा से नजदीकियों के चलते सरकार उन्हें फिल्म सेंसर बोर्ड तथा भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन प्रशिक्षण संस्थान (एफटीआईआई) पुणे का अध्यक्ष भी बना चुकी है।

नई सदी की शुरुआत में अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी के साथ प्रियदर्शन की ‘हेराफेरी’ में बाबूराव आप्टे के जिस मराठीभाषी किरदार ने उन्हें नई पहचान दिलाई थी,उसकी अप्रत्याशित सफलता ने फिल्म को लोकप्रिय फ्रैंचाइजी में तब्दील कर दिया। पद्मश्री से सम्मानित इस अभिनेता ने 2012 में निर्माता के बतौर ‘ओ माय गॉड’ जैसी फिल्म बनाकर धार्मिक अंधविश्वास पर करारी चोट की थी। इससे पहले उन्होंने छोटे परदे के लिए ‘तीन बहूरानियाँ’, ‘जीवन साथी: हम सफर जिंदगी के’ और ‘लागी तुझसे लगन’ जैसे सीरियल भी बनाये।

1979 में मिस इंडिया रह चुकी परेश रावल की अर्द्धांगिनी स्वरूप सम्पत हाल में ‘ऊरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ में नायक विहान की माँ बनी थीं। अस्सी के दशक में स्वरूप ने दूरदर्शन पर शरद जोशी के लिखे हास्य धारावाहिक ‘ये जो है जिंदगी’ (1984) से दर्शकों का खूब दिल बहलाया था। इस लोकप्रिय सीरियल में निभाये रेणु के किरदार की अपने पति रंजीत वर्मा (शफी ईनामदार) और बेरोजगार छोटे भाई राजा (राकेश बेदी) के साथ होनेवाली नोकझोंक आज भी पुराने दर्शकों की यादों में बसी है। परेश रावल के दोनों बेटे आदित्य और अनिरूद्ध भी फिल्मोद्योग में अपनी जगह बनाने में लगे हैं। कोरोना लॉकडाउन में रंजन चंदेल निर्देशित आदित्य की पहली फिल्म ‘बमफाड़’ कोई बड़ा धमाका न कर सकी। जबकि अनिरुद्ध अपनी पारी सलमान खान की ‘सुल्तान’ से सहायक निर्देशक के बतौर शुरू कर चुके हैं।

 

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