19 साल बाद आज अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौता हो रहा है

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। अमेरिका और अफगानिस्तान के आतंकी गुट तालिबान के बीच कतर में शांति समझौते पर आज हस्ताक्षर होंगे। इस दौरान भारत समेत 30 देशों के राजदूतों को दोहा आने का न्योता भेजा गया है।

आतंकवादी हमले (9/11) के 19 साल बाद आज अफगानिस्तान में अमेरिका और तालिबान के बीच एक अहम शांति समझौता होने जा रहा है। इस समझौते की खास बात यह है कि यह पहला मौका होगा जब भारत तालिबान से जुड़े किसी मामले में आधिकारिक तौर पर शामिल होगा। इस समझौते में भारत की भूमिका अहम रही है।

24-25 फरवरी को भारत दौरे पर आए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चर्चा की थी। अमेरिका और तालिबान के बीच ऐतिहासिक शांति समझौता होने से एक दिन पहले शुक्रवार को विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने शुक्रवार को काबुल की यात्रा की और शांतिपूर्ण एवं स्थिर अफगानिस्तान के लिए भारत का खुला समर्थन व्यक्त किया। उन्होंने राष्ट्रपति अशरफ गनी से भेंट की और उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पत्र सौंपा।

श्रृंगला ने अफगानिस्तान के मुख्य कार्यकारी अब्दुल्ला अब्दुल्ला, निर्वाचित उपराष्ट्रपति अमरूल्ला सालेह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमदुल्लाह मोहिब और कार्यकारी विदेश मंत्री हारून चखानसूरी से मुलाकात की और उन्हें अफगानिस्तान के सर्वांगीण विकास के प्रति भारत की मजबूत प्रतिबद्धता का भरोसा दिया।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि श्रृंगला और हारून ने द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी की समीक्षा की और सकारात्मक रूप से गतिविधियों का आकलन किया। दोहा में आज अमेरिका और तालिबान के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर होंगे जिससे इस देश में तैनाती के करीब 18 साल बाद अमेरिकी सैनिकों की वापसी का रास्ता साफ होगा।

कुमार ने ट्वीट करते हुए लिखा है, “विदेश सचिव ने सतत शांति, सुरक्षा और विकास की अफगानिस्तान के लोगों की कोशिशों में भारत का पूर्ण समर्थन व्यक्त किया है।”

वर्ष 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने वादा किया था कि यदि वे सत्ता में आए तो अफगानिस्तान से अपनी फौज को वापस बुला लेंगे। इसका उन्हें समर्थन भी मिला था। उनका कहना था कि वर्षों तक अफगानिस्तान में मौजूद रहने के बाद भी अमेरिका को इसका कोई लाभ नहीं मिला है। उन्होंने इसको पूर्व की सरकारों की एक बड़ी गलती भी करार दिया था।

इतना ही नहीं उन्होंने यहां तक कहा था कि अमेरिका ने पूरी दुनिया को सुरक्षित करने का ठेका नहीं ले रखा है। अब जबकि उनका कार्यकाल खत्म होने की तरफ है और इस वर्ष के अंत में वहां पर चुनाव होने हैं तो फिर से अमेरिकी फौज की वापसी एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। ये वो वादा है जिसको अब तक ट्रंप पूरा नहीं कर सके हैं और ये उनके ऊपर भारी पड़ सकता है। इसलिए जानकार ये भी मानते हैं कि अमेरिका अफगानिस्तान में शांति कायम करने के लिए तालिबान से समझौते को हरी झंडी दे सकता है।

इस संभावित समझौते पर भारत की भी नजर है। दरअसल, भारत नहीं चाहता है कि तालिबान जैसा कोई भी आतंकी संगठन अफगानिस्तान में अपनी सरकार बनाए। वहीं तालिबान का इस समझौते के पीछे पूरा मकसद अफगानिस्तान में दोबारा सरकार कायम करना है। इसमें उसकी मदद पाकिस्तान भी कर रहा है। पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान की वर्तमान में चुनी गई सरकार की जगह तालिबान की हुकूमत कायम हो।

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