आखिर फसलों के समर्थन मूल्य की जरूरत ही क्यों?

हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि हम जिस भोजन का उपभोग करते हैं, उसे सब्सिडी देने की आवश्यकता आखिर क्यों है। आखिर किसान समर्थन मूल्य की मांग क्यों कर रहे हैं? यह मांग केवल उन किसानों की नहीं है जो इस भीषण सर्दी में राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हैं, उन्हें भारत की एक बड़ी अबादी का समर्थन भी प्राप्त है।

सुनीता नारायण, स्वतंत्र लेखिका

नए साल 2021 की शुरुआत हमने इस उम्मीद के साथ की थी कि यह हमें 2020 की विध्वंसकारी महामारी से राहत देगा। लेकिन इसके विपरीत हमारे किसान हजारों की संख्या में दिल्ली की सीमा पर धरने पर बैठे हैं। उनके इस आंदोलन की एक ही मांग है, सरकार हाल में पास किए गए कृषि बिलों को निरस्त कर दे। कौन सही है और कौन गलत, इस बारे में काफी बहस हो चुकी है। इससे जो एक बात सामने निकलकर आई है, वह यह है कि अब हमें किसानों द्वारा उगाए गए भोजन को उपभोक्ता के रूप में सोचने की जरूरत है, न कि किसी शोधकर्ता, शिक्षाविद या नीति निर्माता के तौर पर।

हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि हम जिस भोजन का उपभोग करते हैं, उसे सब्सिडी देने की आवश्यकता आखिर क्यों है। आखिर किसान समर्थन मूल्य की मांग क्यों कर रहे हैं? यह मांग केवल उन किसानों की नहीं है जो इस भीषण सर्दी में राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हैं, उन्हें भारत की एक बड़ी अबादी का समर्थन भी प्राप्त है। तो क्या ये सारे लोग अनुत्पादक और आलसी हैं? यह एक तथ्य है कि दुनियाभर में (खासकर समृद्ध देशों में) कृषि क्षेत्र को सरकारों से भारी मदद मिलती है। पेरिस स्थित अंतरसरकारी थिंक-टैंक ओईसीडी इस क्षेत्र को सकल कृषि प्राप्तियों के प्रतिशत के रूप में प्रोड्यूसर सपोर्ट के जरिए समर्थन का अनुमान लगाता है। इसके आंकड़ों के अनुसार जापान, दक्षिण कोरिया, नॉर्वे और आइसलैंड जैसे अमीर देशों में, उत्पादक समर्थन 2019 में सकल कृषि प्राप्तियों के प्रतिशत के रूप में 40 से 60 प्रतिशत के बीच था। अमेरिका में यह लगभग 12 प्रतिशत है और यूरोपीय संघ में 20 प्रतिशत।

लेकिन भारत में उत्पादक समर्थन (वह भुगतान जो उत्पादन के प्रतिशत के रूप में सरकार द्वारा किया जाता है) वास्तव में नकारात्मक (-5 प्रतिशत) है। दूसरे शब्दों में, दुनिया के कुछ सबसे गरीब लोगों के स्वामित्व एवं प्रबंधन में चल रहा यह कृषि क्षेत्र हमारे भोजन को सब्सिडाइज कर रहा है। लेकिन पूरी कहानी कुछ और है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते जोखिम के समय में समृद्ध राष्ट्र अपने कृषि क्षेत्र का समर्थन करने के लिए तेजी से नए तरीके विकसित कर रहे हैं। उत्पादन के लिए भुगतान सीधे नहीं किया जाता है। यह भुगतान इसी शर्त पर होता है कि किसान नई, सस्टेनेबल तकनीकों को अपनाएंगे। यूरोपीय संघ की आम कृषि नीति अब किसानों को पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के भुगतान के लिए निर्देशित की जाएगी। इसका मतलब हुआ और ज्यादा सब्सिडी लेकिन नए नाम से। इस तरह, लगभग सभी बड़े खाद्य उत्पादक देशों में सब्सिडी उनके सामाजिक और पर्यावरण कल्याण उपायों के हिस्से के रूप में शामिल है। सब्सिडी किसानों को सीधे भुगतान के माध्यम से या कुछ फसलों के समर्थन मूल्य के माध्यम से या पानी, उर्वरक और बीज जैसे प्रमुख कृषि इनपुट में निवेश के माध्यम से दी जा सकती है।

दुनिया के कम समृद्ध देशों के किसान, जिनमें भारत के अमीर राज्य पंजाब और हरियाणा के लोग भी शामिल हैं, को इस वैश्विक पटल पर प्रतिस्पर्धा करनी होती है। सबसे पहले वे वंचित हैं क्योंकि उन्हें खेती को आकर्षक बनाने के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता नहीं मिलती है। दूसरी बात, जब खराब मौसम या अन्य कारणों से उनकी फसलें महंगी हो जाती हैं, तो सरकार सस्ता भोजन आयात कर लेती है। इस तरह हमारे किसान कहीं के नहीं रह जाते। यही कारण है कि किसान मूल्यों में उतार-चढ़ाव से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि वर्तमान समय में यह प्रणाली पूरी तरह से कमजोर हो चुकी है। हालांकि एमएसपी 23 फसलों के लिए तय की गई है लेकिन वास्तव में, यह केवल गेहूं एवं धान जैसी कुछ फसलों के लिए उपयोग में लाई जाती है, जिनकी सरकारी खरीद की व्यवस्था है। यही कारण है कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को डर है कि यह व्यवस्था खत्म कर दी जाएगी। वे मुख्यतः गेहूं और चावल उगाते हैं जो ज्यादातर सरकार द्वारा खरीदा जाता है।

लेकिन बाकी फसलों का एमएसपी एक खोखला वादा मात्र है। जैसा कि मेरे सहयोगी ने कृषि समर्थन पर अपने हालिया लेख में विश्लेषण किया है, बाजार किसानों को आवश्यक कीमत का भुगतान नहीं करता। सरकार के स्वयं के आंकड़ों के अनुसार, 600 थोक बाजारों में 10 चुनिंदा फसलों के लिए लगभग 70 प्रतिशत लेनदेन एमएसपी से कम कीमत पर हुआ था।

प्रमुख मुद्दा यह है कि भोजन की कीमत क्या होनी चाहिए? यह तथ्य है कि कृषि क्षेत्र में लागत बढ़ रही है, बीज और पानी से श्रम तक। फिर यह भी सच है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खराब मौसम से होने वाले नुकसान का खतरा बढ़ रहा है। इस तरह, किसानों को उत्पादन की बढ़ती लागत और फसलों के नुकसान के बढ़ते जोखिम, दोनों के एवज में भुगतान किया जाना चाहिए।

भारतीय किसान किसी भी निजी कंपनी या उद्योग के विपरीत, अपने परिचालन के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण में भारी मात्रा में निजी पूंजी का निवेश करते हैं। वे अपने खेतों की सिंचाई के लिए भी पैसे खर्च करते हैं। कुल सिंचित भूमि का आधे से अधिक हिस्सा भूजल पर निर्भर है। हमारे देश में कुछ 1.9 लाख कुओं और नलकूपों का निर्माण निजी पूंजी से किया गया है। सरकार इस मामले में कोई मदद नहीं करती। वास्तव में एमएसपी की गणना में किसान के साथ धांधली होती है क्योंकि सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि खाद्यान्नों की कीमत कम रहे ताकि सरकारी खरीद का बोझ भी कम रहे।

किसी भी सरकार को सबसे अधिक डर खाद्य मुद्रास्फीति से लगता है, क्योंकि उपभोक्ता तब सही मायनों में अपना आपा खो बैठते हैं। यह तब है जब सरकार कीमतों को कम करने के लिए खाद्यान्नों का आयात अमीर देशों से करती है, जहां उन्हें उगाने पर सब्सिडी दी जाती है और जिसके खिलाफ हमारे किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते। समय आ गया है कि हम अपने खाने की वास्तविक कीमत के बारे में बात करें, जो हमारे लिए अनाज पैदा करने वाले किसानें के लिए लाभकारी बने, इस विषय पर मंथन करें। यह एक ऐसा व्यवसाय नहीं है जिसे हम बंद कर सकते हैं। हमारे दरवाजे पर बैठे किसान इसी मुद्दे पर बात करना चाहते हैं। हम उन्हें निराश नहीं कर सकते।

(डाउन टू अर्थ)

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