दंगे झेलने के बाद होली के लिए कितनी तैयार हैं पुरानी दिल्ली की गलियाँ

विभव देव शुक्ला

कुछ दिनों पहले देश की राजधानी दिल्ली में जिस तरह के हालात थे उसका सामना करना सरकार के लिए चुनौती से कम नहीं था। उस दौरान हालात कैसे भी रहें हों पर फिलहाल स्थितियाँ सामान्य हैं। जिन आम लोगों ने दिल्ली में हुए दंगों की इतनी बड़ी कीमत चुकाई उन्हीं आम लोगों की ज़िंदगी फिर से पटरी पर आ रही है। इतना कुछ होने के बाद होली सामने है और पुरानी दिल्ली की गालियां होली मनाए जाने के तरीके के लिए मशहूर हैं।

मंदिर और मस्जिद आस-पास
अपनी बाज़ारों की रंगत और अनूठे मिजाज़ के अलावा पुरानी दिल्ली की गलियों में हर धर्म, पंथ और जाति के लोग मिल कर होली मनाते हैं। इन्हीं गलियों के एक कोने की बनावट ऐसी है जहाँ गौरी शंकर मंदिर, सिस गंज गुरुद्वारा, जामा मस्जिद और नया मंदिर (जैन मंदिर) आस-पास ही हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि हर धर्म के लोग पूरे सद्भाव के साथ होली मनाते हैं।
त्यौहारों की अच्छी भली सूची के बीच होली ऐसा त्यौहार है जिसे लेकर पुरानी दिल्ली में अलग ही रंगत होती है। पुरानी दिल्ली के बल्लीमारन इलाके में मोहम्मद असलम की दुकान है। असलम ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा ‘मुझे नहीं लगता जिस तरह की होली पुरानी दिल्ली में मनाई जाती है उस तरह की होली कहीं भी मनाई जाती होगी।

विदेशियों को भी लगाते हैं रंग
लगभग चार अलग धर्मों के लोग हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई और जैन यहाँ पर एक साथ होली मनाते हैं। दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके में अनुपमा जी का घर है उन्होंने भी इस बारे में एएनआई से बात की। चाँदनी चौक की होली पर बात करते हुए अनुपमा जी ने कहा हम केवल यहाँ रहने वालों के साथ होली नहीं मनाते हैं बल्कि होली के मौके पर जो विदेशी आते हैं उनके साथ भी होली मनाते हैं।
होली मनाने के लिए हम प्राकृतिक रंगों और पानी के गुब्बारों का उपयोग करते हैं। एक दूसरे को गुझिया और मिठाइयाँ खिलाते हैं, होली को लेकर यहाँ के लोगों में अलग तरह की खुशी होती है। ऐसे ही जामा मस्जिद के पास मोहम्मद इरफान की दुकान है। एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा महज़ होली ही नहीं, यहाँ के लोग हर त्यौहार साथ मिल कर खुशी से मनाते हैं।

‘होली खेलूँगा कह कर बिस्मिल्लाह’
ईद के मौके पर हम अलग-अलग धर्म के लोगों को दावत के लिए घर बुलाते हैं और होली-दिवाली के मौके पर वह हमें रंग खेलने और पटाखे छुड़ाने के लिए बुलाते हैं। अंत में उन्होंने कहा पूरी दुनिया में भले कुछ भी हो रहा हो लेकिन पुरानी दिल्ली के लोगों में एक दूसरे के लिए भावनाएँ नहीं बदलती हैं।
इतिहासकार राना साफ़वी ने एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ‘होली खेलूँगी कह कर बिस्मिल्लाह’। लेख में उन्होंने लिखा जब मैं होली मनाती हूँ तब तमाम मुस्लिम मुझे कहते हैं इस्लाम में रंग ‘हराम’ होते हैं। लेकिन 18वीं सदी में सूफी संत बुल्ले-शाह ने कहा था ‘होली खेलूँगी कह कर बिस्मिल्लाह’।
बुल्ले शाह की यह बात देश की गंगा जामुनी तहज़ीब की मजबूत तस्वीर पेश करती है। इसके बाद उन्होंने कहा चाहे होली-दिवाली हो या ईद, पुरानी दिल्ली में हर त्यौहार हर धर्म के लोग एक साथ मिल कर मनाते हैं। और यह भावना आज की नहीं बल्कि सदियों पुरानी है।

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