आंध्र के कारसेवकों को सबसे आगे रखा गया, ताकि प्रधानमंत्री राव फायरिंग का आदेश न दे सकें…

चन्द्रकान्त जोशी

6 दिसंबर 1992 को क्या हुआ था अयोध्या में? 28 साल बाद जब उसी स्थान पर राम मंदिर का शिलान्यास हो रहा है, एक ऐसे पत्रकार की जुबानी जो पूरे घटनाक्रम का चश्मदीद रहा है। पहली बार सिर्फ “प्रजातंत्र’ में…

मैं उज्जैन से 2 दिसंबर की शाम को अयोध्या पहुंच चुका था। उज्जैन से दिल्ली और दिल्ली से अयोध्या की पूरी यात्रा रोमांचक थी। अयोध्या में कारसेवा के लिए जा रहे कारसेवकों के लिए रास्तेभर हर स्टेशन पर खाना खिलाने वालों से लेकर हार पहनाने वालों की भीड़ मौजूद होती थी। उज्जैन से दिल्ली जाते समय कोटा स्टेशन पर भाजपा कार्यकर्ताओं की भीड़ कारसेवकों का स्वागत ऐसे कर रही थी मानों किसी बरात का स्वागत किया जा रहा हो। कारसेवकों के साथ यात्रियों की भी जमकर खातिरदारी की जा रही थी। दिल्ली पहुंचने पर गाड़ी से उतरते ही भाजपा, विश्व हिंदू परिषद् और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता चाय-नाश्ता लेकर तैयार थे और आपका सामान लेकर आपको लखनऊ, फैजाबाद और अयोध्या की ओर जाने वाली गाड़ी में बैठाया जा रहा था।

यानी माहौल ऐसा था कि आप अगर अयोध्या जाने के लिए निकले हैं तो फिर आपको न टिकट की फिक्र थी, न सामान उठाने की और न खाने की। खैर, दिल्ली से 3 दिसंबर की शाम को जब मैं फैजाबाद पहुंचा तो वहां भी पूरे प्लेटफॉर्म पर भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व विश्व हिंदू परिषद् के कार्यकर्ताओं का हुजूम मौजूद था। कौन कार्यकर्ता किस प्रदेश से आया था, उसके हिसाब से उसे गाइड किया जा रहा था कि उसके प्रदेश का कैंप कहां लगा है और कैसे पहुंचना है।

फैजाबाद से अयोध्या की दूरी सभी कार्यकर्ता पैदल ही जय श्रीराम, रामलला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे, एक धक्का और दो… के नारों के साथ अपने-अपने प्रदेशों के कैंपों की ओर उत्साह से जाते दिखाई दे रहे थे। ये दृश्य अयोध्या में 3 दिसंबर की रात से 6 दिसंबर की सुबह तक 24 घंटे दिखाई दे रहा था। फैजाबाद से लेकर अयोध्या तक भगवा झंडे और भगवा दुपट्टा लिए कार्यकर्ताओं का सैलाब दिखाई दे रहा था। ट्रकों, ट्रैक्टरों, बसों और बैलगाड़ियों से भी हजारों लोग अयोध्या पहुंच चुके थे। फैजाबाद से लेकर अयोध्या तक पूरे माहौल में एक अजीब उत्साह, सनसनी और तूफान के पहले की खामोशी दिखाई दे रही थी।

अयोध्या में 3 दिसंबर की पहली और ठंडी रात मैं होटलों में ठिकाना ढूंढ़ रहा था, लेकिन छोटी-मोटी होटलों से लेकर धर्मशालाओं तक में कहीं जगह नहीं थी। फिर फैजाबाद में दो प्रमुख होटलों होटल तिरुपति और होटल अयोध्या का पता चला, लेकिन उनमें कई वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और दिल्ली से लेकर दुनियाभर से आए पत्रकारों ने पहले ही बुकिंग करा रखी थी और वो इतनी महंगी थीं कि उनमें ठहरना अपनी औकात के बाहर की बात थी। खैर, पहली रात मैंने एक छोटी-सी होटल वाले की कृपा से निकाली।

दूसरे दिन यानी 4 दिसंबर को सुबह मैंने अयोध्या का पैदल ही दौरा किया। वाहन और साधन के नाम पर वहां कुछ नहीं था, हजारों लोग पैदल ही इधर से उधर आ-जा रहे थे। कई राज्यों के कारसेवकों के कैंपों में गया, वहां हर कारसेवक में उत्साह का माहौल था। कैंप में सबकी परेशानियां और शिकायतें एक जैसी थीं, कहीं खाना ठीक नहीं था, कहीं सोने को बिस्तर नहीं मिला था तो कहीं मच्छरों ने सोने नहीं दिया। मगर हर एक इस बात के लिए समर्पित था कि वह कारसेवा करने आया है और चाहे गोली चले या जान चली जाए, कारसेवा करके ही जाएगा।

मुझे मिथिला के कुछ लोग मिले, जो खाने का सामान साथ लेकर आए थे। उनका कहना था कि सीता उनके गांव की बेटी हैं, इसलिए वे अयोध्या का पानी भी नहीं पी सकते। वे पानी भी साथ लाए थे।
राम जन्मभूमि आंदोलन और विश्व हिंदू परिषद् की ओर से सर्वोच्च न्यायालय को आश्वासन दिया गया था कि कारसेवा के नाम पर सांकेतिक रूप से सभी कारसेवक सरयू नदी से एक-एक मुठ्ठी रेत लेकर आएंगे और बाबरी ढांचे के पास जाकर डालेंगे। कहने को तो ये एक बहुत ही सहज-सरल और सामान्य-सी दिखने वाली योजना थी, लेकिन इस योजना को जिस तरीके से अमल में लाया गया, उससे ये साफ हो गया था कि 6 दिसंबर का दिन बाबरी ढांचे का आखिरी दिन होगा, लेकिन इसकी कल्पना न तो कारसेवकों को थी, न प्रशासन को, न सरकार की खुफिया एजेंसियों को और न ही राम मंदिर आंदोलन से जुड़े दिग्गज नेताओं को।

4 और 5 दिसंबर को मैंने अयोध्या की गली-गली से लेकर बाबरी ढांचे के आसपास के क्षेत्रों का बहुत ही गहनता से मुआयना किया। अयोध्या और फैजाबाद के लोगों के लिए कारसेवकों का बार-बार आना और वहां इस तरह का माहौल बनना परेशानी का सबब था। अयोध्या और फैजाबाद के मुसलमान तक इस बात से खुश नहीं थे कि जिस मस्जिद में हम कई पीढ़ियों से नमाज पढ़ने नहीं गए उसके लिए मुस्लिम नेताओं और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने इतना बखेड़ा कर रखा है। हिंदू चाहते थे कि जैसे भी हो इस मसले का हल निकलना चाहिए।

बाबरी मस्जिद अयोध्या की बस्ती से थोड़ी दूर सुनसान-से क्षेत्र में स्थित थी। इसके चारों तरफ कारसेवकों ने इतनी खुदाई कर दी थी कि इसकी नींव पूरी तरह हिल चुकी थी। ये एक टिगड्डे पर किसी हवामहल की तरह खड़ी थी। 4-5 दिसंबर को सैकड़ों कारसेवक मस्जिद के आसपास की जमीन की खुदाई में लगे थे और जो भी कारसेवक उन्हें खुदाई करता देखता वो भी खुदाई में लग जाता, क्योंकि इस जमीन पर खुदाई को लेकर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं थे, इसलिए ये काम जोरों पर चल रहा था। जिस तरह कारसेवक खुदाई का काम कर रहे थे, उसे देखकर ऐसा लगता था मानों सभी गड्‌ढे खोदने, मिट्टी उठाने और फेंकने के काम में कुशल हों, मगर जब मैं इनसे मिला तो पता चला कि कोई शिक्षक था, कोई व्यापारी तो कोई सरकारी अधिकारी।

जब मैंने बाबरी ढांचे के चारों ओर गहन निरीक्षण किया तो पाया कि अगर इसे 6 दिसंबर को नहीं तोड़ा होता तो ये इतनी कमजोर हालत में था और इसके नीचे की जमीन इतनी खोदी जा चुकी थी कि पहली बरसात में ही ये भरभराकर गिर जाता।

5 दिसंबर की शाम से आधी रात तक सभी कैंपों में गहमागहमी थी। देर रात तक हर कैंप में भजन और संगीत के कार्यक्रम होते रहे। सब कारसेवकों को माइक पर लगातार निर्देश दिए जा रहे थे कि 6 दिसंबर की सुबह से हर कार्यकर्ता कारसेवा में भाग लेगा। कारसेवा के लिए कार्यकर्ता सरयू नदी पर जाएंगे और वहां स्नान कर एक मुट्‌ठी बालू लेकर बाबरी ढांचे के परिसर में जाएंगे और बालू वहां समर्पित कर अपनी कारसेवा को पूरा करेंगे। ये कारसेवकों पर था कि वे कितनी भी बार कारसेवा कर सकेंगे।

मैं कारसवकों, राम जन्मभूमि आंदोलन के नेताओं और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी से जुड़े नेताओं और खुफिया अधिकारियों से भी मिला, ताकि जान सकूं कि 6 दिसंबर को आखिर क्या होने वाला है। इन मुलाकातों में मैंने कई चौंकाने वाली जानकारियां हासिल की।

एक महत्वपूर्ण जानकारी मुझे ये मिली कि कारसेवकों का जो जत्था सबसे पहले कारसेवा यानी सरयू नदी की रेत लेकर बाबरी परिसर में अर्पित करने जाएगा, वह आंध्रप्रदेश के नंदयाल जिले का होगा। उसके पीछे आंध्रप्रदेश के सभी जिलों के कारसेवक, आंध्रप्रदेश के कारसेवकों के पीछे महाराष्ट्र के कारसेवक होंगे।

ये रणनीति इसलिए बनाई गई थी कि गोली चले तो सबसे पहले प्रधानमंत्री नरसिंह राव के गृह जिले नंदयाल के लोगों पर और दूसरा नंबर गृहमंत्री एसबी चव्हाण के राज्य महाराष्ट्र के कारसेवकों का हो।
मैं जब आंध्रप्रदेश के कारसेवकों के कैंप में गया तो मैंने देखा कि उनका खाना अयोध्या में ड्यूटी पर आए केंद्रीय पुलिस सेवा के कैंप से बनकर आ रहा था, क्योंकि उनको उत्तर भारत की सब्जी-पूड़ी नहीं भा रही थी और उनके लिए चावल और रसम की व्यवस्था सीआरपीएफ के जवान कर रहे थे। किसी कारसेवक ने प्रधानमंत्री कार्यालय में एक अधिकारी से शिकायत कर दी थी कि हमें यहां का खाना नहीं भा रहा और तीन दिन में तो हम भूखे मर जाएंगे।

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