असम में तिकौने संघर्ष के साथ असमिया अस्मिता का सवाल

पिछले साल दिसंबर के आखिरी हफ्ते में ही गृह मंत्री अमित शाह ने असम का दौरा कर बीजेपी के चुनावी अभियान को धार दे दी थी। इसके साथ ही पिछले एक महीने के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो-दो दौरे से साफ है कि बीजेपी असम में सत्ता की वापसी के लिए पूरी तरह कमर कस चुकी है और संगठन और सरकार के तौर पर उसने प्रयास तेज कर दिए हैं।

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– कुमार भवेश चंद्र, वरिष्ठ पत्रकार

प्र धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जबाव देते हुए अपने भाषण के करीब 18वें मिनट में ही पूर्वोत्तर भारत की चर्चा की। किसानों का मुद्दा हो या बुनियादी क्षेत्र के विकास की बात, इन सबसे पहले प्रधानमंत्री ने पूर्वोंत्तर में अपनी सरकार के असर का उल्लेख खास तौर पर किया। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा, “नार्थ ईस्ट में हम सबसे पहले सूरज तो आता है लेकिन सुबह नहीं आती थी। सूरज तो आ जाता था अंधेरा नहीं छंटता था। आज मैं कह सकता हूं कि नई सुबह भी आई है, नया सवेरा भी हुआ है..नया उजाला भी है और वह प्रकाश जब आप लोग चश्मे बदल लोगे, तब दिखाई देगा।” प्रधानमंत्री के भाषण में पूर्वोत्तर भारत की चर्चा के सियासी संदेश भी बहुत साफ हैं कि बीजेपी के लिए असम कितना अहम है। पिछले साल दिसंबर के आखिरी हफ्ते में ही गृह मंत्री अमित शाह ने असम का दौरा कर बीजेपी के चुनावी अभियान को धार दे दी थी। इसके साथ ही पिछले एक महीने के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो-दो दौरे से साफ है कि बीजेपी असम में सत्ता की वापसी के लिए पूरी तरह कमर कस चुकी है और संगठन और सरकार के तौर पर उसने प्रयास तेज कर दिए हैं। प्रधानमंत्री ने असम के हालिया दौरे में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की शुरुआत की। असम में ‘असोम माला’ के जरिए सड़कों का जाल बिछाने की योजना है तो अस्पताल की स्थापना के जरिए स्वास्थ्य के क्षेत्र में आगे बढ़ने की पहल। इन योजनाओं के जरिए प्रधानमंत्री अपनी डबल इंजन की सरकार वाली रणनीति पर जोर दे रहे हैं।

असम जातीय परिषद के रूप में नए सियासी दल ने असमिया अस्मिता और क्षेत्रीय पहचान का सवाल उठाते हुए बीजेपी का सबसे तीव्र विरोध शुरू किया है। उसने एक और क्षेत्रीय संगठन राजजोर दल के साथ मिलकर बीजेपी के खिलाफ सियासी मुहिम तेज कर दी है।

अप्रैल-मई में जिन पांच राज्यों की विधानसभा के चुनाव होने हैं, उनमें असम की अहमियत को समझने के लिए यह जरूरी है कि वहां के मौजूदा सियासी परिदृश्य को समझा जाए। वहां के जमीनी मुद्दों को जाना जाए। दरअसल, पिछली बार असम में पहली बार सत्ता में आई बीजेपी के लिए वहां पर अपनी सत्ता बचाना पश्चिम बंगाल से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। पूर्वोत्तर का गेट माने जाने वाले इस प्रदेश में बीजेपी ने असम गण परिषद और बोडो पीपुल्स फ्रंट के साथ मिलकर 2016 में सरकार बनाई थी। चुनाव से पहले तो उसने अपने गठबंधन में राभा जातीय ओइकिया मंच और तिवा जातीय ओइकिया मंच के साथ भी समझौता किया था। उसे एक-एक सीट भी दी गई थी लेकिन उनके उम्मीदवार जीत नहीं पाए। बहरहाल सरकार बनने पर इन समुदायों की मांगों को ध्यान में रखते हुए नई सरकार ने कुछ फैसले किए और बीजेपी के साथ इनका सहयोग जारी है। लेकिन बोडो पीपुल्स फ्रंट के एनडीए के साथ रिश्ते नहीं चल सके। बोडोलैंड टेरेटोरियल काउंसिल (बीटीसी) के चुनाव को लेकर दोनों दलों के हितो में टकराहट के बाद एनडीए के साथ बोडो पीपुल्स फ्रंट ने एनडीए से नाता तोड़ लिया है हालांकि उसके दल से चुनाव जीतकर मंत्री बनाए तीन विधायक अब भी असम सरकार में शामिल हैं। फ्रंट के एकमात्र राज्य सभा सांसद विश्वजीत दइमारी ने भी बीजेपी ज्वाइन कर ली है। बहरहाल बीजेपी ने बोडो क्षेत्र में ही अपना प्रभाव रखने वाली यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) के साथ गठजोड़ कर आगे विधानसभा चुनाव में जाने का फैसला किया है। यूपीपीएल पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के साथ थी और उसने चार सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन खाली हाथ रही थी। बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल चुनाव में 12 सीटें जीतकर और बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर बीटीसी में प्रमुख की कुर्सी पर कब्जा करने के बाद वह अब नई राह पर चल पड़ी है।

इस तरह एनडीए ने अपने बिखड़े हुए हुए घर को संभाल लिया है। बोडो क्षेत्र में प्रभाव बनाए रखने के लिए उसे यूपीपीएल का साथ तो मिल ही गया है। लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है। एनआरसी और सीएए पर प्रदेश के लोगों का रुख। इस बिल को लेकर प्रदेश में खासा बवाल हुआ था। और इस मुद्दे पर चुनावी संघर्ष की तस्वीर साफ दिख रही है। यह बात और है कि बीजेपी के हेमंत विश्व शर्मा कहते आ रहे हैं कि अब असम में कोई भी इसकी बात नहीं करता। असम के सियासी विश्लेषकों की नजर में बीजेपी जरूर इस मुद्दे पर बात नहीं करना चाहती लेकिन उसके विरोधी इस सवाल को चुनाव के करीब आने पर तेजी से उठाएंगे और इसके खिलाफ गोलबंदी की कोशिश से इनकार नहीं किया जा सकता। वे यह भी कह रहे हैं कि बीजेपी और उसके साथी दल अपने चुनावी कौशल से इस मुद्दे को परदे के पीछे धकेलने की कोशिश भी करेंगे। वे चाहेंगे कि चुनाव के दौरान दूसरे मुद्दे प्रभावी हो जाएं और उन्ही पर बात हो। लेकिन प्रदेश की क्षेत्रीय अस्मिता को बरकरार रखने वाली छोटी पार्टियों के समूह ने इस मुद्दे को गरम करने के लिए पूरा जोर लगा दिया है। असम जातीय परिषद के रूप में नए सियासी दल ने असमिया अस्मिता और क्षेत्रीय पहचान का सवाल उठाते हुए बीजेपी का सबसे तीव्र विरोध शुरू किया है। उसने एक और क्षेत्रीय संगठन राजजोर दल के साथ मिलकर बीजेपी के खिलाफ सियासी मुहिम तेज कर दी है। उसका कहना है कि केंद्र की मोदी सरकार प्रदेश के मूल निवासियों की संवैधानिक सुरक्षा करने में पूरी तरह नाकाम रही है। यह दल मूल निवासियों की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करने वाले असम समझौते के अनुच्छेद छह को पूरी तरह से लागू करने का सवाल उठाते हुए चुनावी माहौल गरमाने की तैयारी कर रहा है। ये दोनों ही दल सीएए-एनआरसी का मुद्दा जोर शोर से उठा रहे हैं। वे कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को भी अपने निशाने पर ले रहे हैं। एक बड़े भूभाग में इसकी जमीनी ताकत दोनों ही गठबंधनों के लिए मुश्किलें पैदा करेगी।

इन सबके बीच, पिछली बार तकरीबन अकेले चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस ने भी वाम दलों और एआईयूडीएफ के साथ मोर्चेबंदी तेज कर दी है। वैसे तो 2016 में 19 सीटों पर लड़ने वाली सीपीआई-एम और 15 सीटों पर लड़ने वाली सीपीआई जीरो पर आउट हो गई थी। लेकिन इस बार कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधन की असली ताकत वामपंथियों के साथ बदरुद्दीन अजमल का साथ मिल जाना है। बदरुद्दीन की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने पिछली बार 88 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 13 सीटें जीती थीं। जोरहाट, धुबरी, उत्तरी कछार क्षेत्रों में उसकी पकड़ का लाभ कांग्रेस को मिल सकता है। यह गठबंधन इसलिए भी बीजेपी के लिए चुनौती बनने की ताकत बन सकता है क्योंकि पिछले चुनाव में 122 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भी महज 26 सीटें जीत पाई थी क्योंकि वह मैदान में लगभग अकेली थी। बोडो प्रभावित इलाकों में यूपीपीएल का साथ उसे खास मदद नहीं कर पाया। लेकिन इस समीकरण में उसके सामने दिक्कत बस यही है कि एआईयूडीएफ की मुसलिम परस्त छवि उसे नुकसान पहुंचा सकती है। बीजेपी इसे अस्वाभाविक गठबंधन साबित करने पर भी तुली है। इस तरह असम में तीन तरफा चुनावी लड़ाई की तस्वीर उभर रही है जो बीजेपी की सत्ता वापसी और कांग्रेस के सपने पर एक बड़ा सवाल है।

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