विलुप्त होने की कगार पर खड़ा असुर समुदाय ने शुरू किया भारत का पहला ‘असुर रेडियो अखाड़ा’

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। आदिवासी अक्सर नज़रअंदाज़ की कैटगरी में आते हैं अब ये किस्सा ही देख लीजिए हम सीएए, एनआरसी के हो हल्ला में इतने मशगूल हैं कि हमें पता ही नहीं चला सबसे ज़्यादा विलुप्त जनजाति असुर समुदाय ने भारत का पहला रेडियो शुरू कर दिया है।

ऐसे ही अनदेखा करने के कारण आज इनकी भाषा, पहनावा से लेकर संस्कृति भी ख़तरे में आ गयी है शायद हिन्दू संस्कृति से ज़्यादा ख़तरा इन्हें है। क्योंकि आये दिन हम नदी-तालाब में जो नरक मचा रहे हैं, पेड़-पौधों को नोच कर अपने आप को अच्छी लाइफ़स्टाइल दे रहे हैं दरअसल हम जिनके साथ खिलवाड़ कर रहे हैं वो इनकी लाईफस्टाइल है।

असुर रिकॉर्डिंग तथा रेडियो को संभालने वाले अश्विनी कुमार पंकज बताते हैं, “अगर हमें कोई ख़बर भेजनी होती है तो पहले हमलोग पहाड़ के नीचे ख़बर भेजते हैं फिर पीछे से ऊपर जाता है तब उनके पास पहुंचता है। फिर उनका रिप्लाई आता है तो हम बात करवा पाते हैं या पहले से तय करते हैं और उनको रोक कर रखते हैं फिर जा कर बात हो पाती है।”

ये समस्या उस जगह की है जिसे हम ‘क़्वीन ऑफ़ छोटानागपुर’ के नाम से जानते हैं शायद ये नाम भी पहली बार कई लोगों ने पढ़ा होगा इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। बात रांची से लगभग 145 किलोमीटर दूर नेतरहाट की है यहाँ असुर समुदाय समेत बाकी आदिवासी समुदाय भी रहते हैं।

असुर समुदाय तथा कुछ और लोगों ने मिलकर अपना पहला रेडियो शुरू किया है जिसमें वो अपने समुदाय के शादी-ब्याह के गीत से लेकर तमाम रीति रिवाज़ों के बारे में बताते हैं। इनकी रिकॉर्डिंग का मुख्य चेहरा सुषमा असुर हैं तथा रिकॉर्डिंग नेतरहाट में पावर बैकअप के द्वारा किया जाता है।

असुर आदिवासी विज़डम डॉक्यूमेंटेशन के नाम से फेसबुक पेज है जिस पर असुर आदिवासी मोबाइल रेडियो की जानकारी दी जाती है।

ये असुर समुदाय क्या होता है ?

भारत में जितने भी आदिवासी हैं चाहे वो किसी भी समुदाय से आते हो वो प्रकृति पूजक होते हैं। और प्रकृति पूजन करने वालों का पहला नियम ही यही है कि वो मनुष्यों के द्वारा बनायी गयी किसी भी प्रकार की मूर्ति पूजन या पूजा करने के तरीकों को नहीं मानते यदि उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया हो तो। वहीं असुर लोग ‘सरनाधर्मावलम्बी’ होते हैं माने प्रकृति के पूजक लेकिन इनका कॉन्सेप्ट थोड़ा अलग है ये असुर को अपना पुर्वज मानते हैं तथा उनकी भी पूजा करते हैं।

झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के विभिन्न इलाकों में रहने वाले असुर मूल रूप से किसान हैं। उनके त्यौहार और परंपरायें कृषि से संबंधित हैं जिनके केंद्र में प्रकृति होती है। वे बोंगा में विश्वास रखते हैं जो उनके सबसे प्रमुख देवता हैं। इसी तरह मरंग बोंगा और अन्य बोंगा भी देव समुदाय में गिने जाते हैं। सोहराई, सरहुल, फागुड़, नवाखानी, काठडेली और सरही कुटासी इनके महत्वपूर्ण त्यौहार हैं। ‘सरही कुटासी’ त्योहार लोहा गलाने के उद्योग की समृद्धि के लिए मनाया जाता है। वे पूर्वज, जादू-टोना में विश्वास रखते हैं और समस्याओं में बैगा से परामर्श करते हैं।

झारखण्ड का नेतरहाट इलाका जिसे ‘क़्वीन ऑफ़ छोटानागपुर’ भी कहा जाता है। यह स्थान अभी भी मुख्य रूप से एक आदिवासी क्षेत्र है और आदिम जनजाति समुदाय के निवासियों का निवास स्थान है, जो विलुप्त होने के कगार पर हैं।

इस बारे में अश्विनी कुमार पंकज बताते हैं “झारखण्ड में लगभग 32 आदिवासी समुदाय हैं जिसमें से 9 आदिवासी समुदाय धीरे-धीरे को हाशिये के बाहर जा रहे हैं यानी वो ख़तरे में हैं जिनमें से एक असुर समुदाय हैं। झारखंड में इनकी संख्या लगभग 8000 के क़रीब है।”

ये तो हुई असुर समुदाय की बात अब आते हैं इनकी भाषा पर यूनेस्को के वर्ल्ड स्पेसिफिक डेंजर लैंग्वेज के अनुसार इनकी भाषा डेंजर की कैटगरी में रखा गया है। मतलब इनकी भाषा विलुप्त हो चुकी श्रेणी में आती है।

असुर भाषा के बारे में बताते हुए अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं “भाषा के विलुप्तीकरण का मतलब होता है कि जिस समुदाय की भाषा ख़तरे में है उस समुदाय की आजीविका से लेकर इकोनॉमिक, सोशल, पॉलिटिकल सब खतरे में है। सबसे बड़ा ख़तरा इनकी जमीन और हेरिटेज का है।”

असुर प्रकृति-पूजक होते हैं। ‘सिंगबोंगा’ उनके प्रमुख देवता है। ‘सड़सी कुटासी’ इनका प्रमुख पर्व है, जिसमें यह अपने औजारों और लोहे गलाने वाली भट्टियों की पूजा करते हैं। असुर महिषासुर को अपना पूर्वज मानते है। हिन्दू धर्म में महिषासुर को एक राक्षस (असुर) के रूप में दिखाया गया है जिसकी हत्या दुर्गा ने की थी। पश्चिम बंगाल और झारखण्ड में दुर्गा पूजा के दौरान असुर समुदाय के लोग शोक मनाते है।

अश्विनी कुमार पंकज बताते हैं, “मध्यप्रदेश के खंडवा में आदिवासियों का एक गीत है जिसका अर्थ ये है कि सीता अपनी माता से कहती हैं माँ रावण देखो कितना सुन्दर है, मैं तो रावण के साथ जा रही हूँ। लेकिन ये कहीं नहीं पढ़ाया या बताया गया, हमें बस इतना पता है कि रावण ने सीता का हरण कर लिया था।”

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