इस वक्त देश की जनता को बिस्मिल्लाह खान के बताए बुढ़वा मंगल को समझने की ज़रूरत है

विभव देव शुक्ला

साल दर साल हमारी नज़रों में एक बदलाव आया है, जिस बदलाव के बाद हमें महज़ उतना ही नज़र आता है जितना सामने होता है। न तो एक पग आगे और न ही एक पग पीछे, न ही ज़्यादा और न ही कम। सब कुछ लगभग औसत के इर्द-गिर्द ही घूमता है। पिछले हफ्ते एक ऐसा ही वाकया हुआ, सोशल मीडिया पर एक वीडियो आया। जिसमें भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान गंगा किनारे खड़े होकर गंगा जामुनी तहज़ीब पर अपने ख़याल पेश कर रहे थे।

ऐसा आनंद कहीं और नहीं
वीडियो को महज़ कुछ दिनों के भीतर अनगिनत लोगों ने देखा और प्यार दिया। वीडियो में बिस्मिल्लाह खान साहब कहते हैं ‘वही जगह है, वही घाट है, वही मंदिर है। तमाम दुनिया घूमता हूँ, मज़ा लेता हूँ, बड़ी-बड़ी सड़कें हैं, बड़ी-बड़ी इमारतें हैं लेकिन जब बनारस में रहता हूँ तो यही जगह (गंगा घाट) निगाह में रहती है। यही जगह खींच कर ले आती है हमें, सच पूछिये तो आनंद भी यहीं मिलता है, यह जगह ही ऐसी है।’
दोनों बातें हैं गंगा जी सामने हैं इसमें नहाइये, पास में मस्जिद है दौड़ कर जाइए, नमाज़ पढ़िये। फिर पास के बाला जी मंदिर गए वहाँ रियाज़ किया, बिलकुल फ़कीर तरीके का हिसाब किताब रहता था हम लोगों का। मालिक की मेहरबानी से इतने ज़माने बाद आज फिर यहाँ आए हैं। आप खुद देखिये कि यहाँ कितना भला मालूम होता है। हिंदुस्तान तो क्या हम पूरी दुनिया में घूम रहे हैं लेकिन ऐसा आनंद हमें कहीं और नहीं दिखाई देता है।

कोई भांग खाए है, कोई बोतल पिए है
इसके बाद वीडियो में बिस्मिल्लाह खान से एक सवाल किया जाता है, ‘बुढ़वा मंगल भी तो यहीं मनाया जाता था?’ जवाब देते हुए बिस्मिल्लाह खान साहब कहते हैं ‘बुढ़वा मंगल! अब क्या बतावें? फिर गंगा के घाट की तरफ इशारा करते हुए वह कहते हैं यहाँ पर बजड़े सजते थे, तमाम फ़नकार अपने साज़ लेकर दूर-दूर से आते थे। बनारस के बहुत से रईस दुग्गड़ बनाते थे, उस पर नाच गाना होता था। बड़े-बड़े कलाकार उस पर अपनी कला पेश करते थे।’
हमारी हालत उस समय ऐसी होती थी जैसे हम कभी इधर जा रहे हैं तो कभी उधर जा रहे हैं और तमाम कार्यक्रम देख रहे हैं। उस जगह पर “कोई चैती गा रहा है, कोई घाटौ गा रहा है, कोई भांग पिये हुए है, कोई बोतल पिये हुए है। सब हा-हा, ही-ही, वाह भईया क्या कहना हौ? चिल्लहट हो रही है, हज़ारों लोगों की भीड़ लगी हुई है लेकिन अब वह ज़माना नहीं है। हम चाहते हैं कि फिर एक दफ़े बुढ़वा मंगल हो जाए यहाँ।”

अभी के हालातों के लिए कैसे बेहतर
फिलहाल देश में जिस तरह के हालात हैं, देश के सामने जिस तरह का माहौल है। ऐसे में बिस्मिल्लाह खान का यह वीडियो किसी नज़ीर से कम नहीं है। वीडियो के दौरान बिस्मिल्लाह खान कितनी सहजता से कहते हैं दोनों बातें हैं गंगा जी सामने हैं इसमें नहाइये, पास में मस्जिद है दौड़ कर जाइए, नमाज़ पढ़िये। फिर पास के बाला जी मंदिर गए वहाँ रियाज़ किया। देश की मिट्टी में फिलहाल ऐसी रवायत की खाद की ज़रूरत है। सोशल मीडिया पर मचे अंतर्द्वंद में ऐसे वीडियो का नज़र आना हर इंसान के लिए चेतना से कम नहीं है।

जिस बजड़े पर बड़े-बड़े कलाकार बैठते थे
इस पूरी बात में एक शब्द का ज़िक्र कई बार हुआ, ‘बुढ़वा मंगल’। बिस्मिल्लाह खान ने कहा ‘बुढ़वा मंगल! अब क्या बतावें? फिर गंगा के घाट की तरफ इशारा करते हुए वह कहते हैं ‘यहाँ पर बजड़े सजते थे, तमाम फ़नकार अपने साज़ लेकर दूर-दूर से आते थे। बनारस के बहुत से रईस दुग्गड़ बनाते थे, उस पर नाच गाना होता था। बड़े-बड़े कलाकार उस पर अपनी कला पेश करते थे।’
लेकिन बुढ़वा मंगल का चित्र महज़ इतने रंगों में सीमित नहीं किया जा सकता है। काशी के तीरे का ऐसा आयोजन में जिसमें ज़माने भर के बड़े से बड़े फ़नकार और तालसाज़ शामिल होते थे। काशी की प्रचिलित कहावत है ‘फ़नकारों में टनकमिजाज़ी ज़रूरी है’। लिहाज़ा बुढ़वा मंगल के बजड़े पर अपना कौशल प्रस्तुत करने वाले हर फ़नकार में खूब अल्हड़ता होती थी। देखने वाले कहते थे ऐसा मंच हाथ में चिराग लिए तलाशने पर नहीं दिखता।

सफ़ेद झक्क कुर्ता और गुलाबी गमछा
इस आयोजन की खास बात थी कि शामिल होने वाले हर व्यक्ति पर बुढ़वा मंगल की छाप ज़रूर मिलती थी। सफ़ेद कुर्ता, लखनवी कढ़ाई की टोपी, गुलाबी गमछा, भांग, ठंढई और काशी का अस्सी (घाट)। बुढ़वा मंगल की आयोजन समिति के माथे यह ज़िम्मा होता था कि हर व्यक्ति इस लिबास में नज़र आए। कभी-कभी तो आयोजन समिति के लोग खुद लोगों को गमछा बांटते थे। आयोजन समिति के एक व्यक्ति ने बात करते हुए बताया कि लोग इसमें सफ़ेद कुर्ता नहीं बल्कि ‘सफ़ेद झक्क कुर्ता’ पहन कर आते हैं।
मान्यता के मुताबिक बुढ़वा मंगल होली के ठीक बाद आने वाले पहले मंगलवार को मनाया जाता है। करीब 300 साल से होने रहे इस आयोजन में काशी के घरानों समेत मुल्क के तमाम घरानों के फ़नकार अपने हुनर की पेशकश करते हैं। ठुमरी से लेकर चैती तक और बिरहा से लेकर ठुमरी तक, इस आयोजन में काशी के लोगों को लगभग हर लोककला का आनंद मिलता था। काशी में तो मान्यता इस कदर है कि जब तक होली के बाद पहला मंगलवार नहीं आता तब तक होली मनाई जाती है।

समय के साथ कितना बदलाव
गंगा नदी के अस्सी घाट पर बजड़ा लगाया जाता था, एक तरह का आसन जिस पर विराजमान होकर कलाकारों की कला परवान चढ़ती थी। राजे रजवाड़ों के दौर से होने वाले इस आयोजन का मिजाज़ ही खुद में अलहदा है। सुनने वाला अमूमन हर इंसान साज़ के सुरूर में जाने से पहले भांग और बोतल के सुरूर में होता था। सुरूर में होने के बावजूद महफ़िल के माहौल पर असर नहीं पड़ता था।
लेकिन कुछ सालों तक यह आयोजन बंद हो गया था। लोगों का कहना था कि बजड़े के आसन पर फूहड़ता विराजमान हो गई थी। उस दौरान इसे अस्सी घाट से उठा कर बनारस के टाउन हॉल (मैदागिन) में कर दिया गया था। बिस्मिल्लाह खान साहब ने वीडियो में खुद कहा कि ‘अब वह ज़माना नहीं है। हम चाहते हैं कि फिर एक दफ़े बुढ़वा मंगल हो जाए यहाँ।’

शहनाई से संगीत और संगीत से खुदा
वाकई देश की महफ़िल को किसी ऐसे बुढ़वा मंगल की ज़रूरत है जिसमें हर पंथ, हर सम्प्रदाय और हर घराने का फ़नकार ठुमरी, चैती, राग, बिरहा और भजन पेश करे। सफ़ेद झक्क कुर्ते और कढ़ाई वाली लखनवी टोपी पहले गले पर गुलाबी गमछा लटकाए किसी हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख या ईसाई को माहौल का लुफ़्त लेने में कोई परेशानी न हो।
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने “शहनाई से संगीत और संगीत से खुदा तक का सफर तय किया ।” चाहे काशीविश्वनाथ के मंदिर में कोई बड़ी पूजा हो या मोहर्रम के मौके पर करबला के शहीदों को याद करना हो । उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई हर मौके पर उतनी ही गर्मजोशी के साथ फिज़ा में घुलती थी ।

मंदिर वाला पत्थर ही तो मज़ार में भी लगा है
बिस्मिल्लाह खान ने अपने एक साक्षात्कार में कहा कि मंदिरों के दरवाजे पर जो पत्थर लगा हुआ है, जिस पर हम गंगा जल छिड़कते हैं, फूल चढ़ाते हैं। वही पत्थर तो मजार में भी लगा होता है न, मैं कहीं भी हाथ रखूँ, एक जैसा ही है। वह अक्सर भिखारियों को देख कर रोने लगते थे और उन्हें बनारस का दूसरा कबीर भी कहा जाता था। बनारस के घाट पर रियाज़ करते हुए उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अक्सर कहा करते थे,
‘एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।’ यानि मेहनत करनी है तो किसी एक विधा में करनी चाहिए और आखिर तक करनी चाहिए। जब उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का देहांत हुआ तो हिंदू और मुसलमानों का हुजूम उमड़ पड़ा। शहनाई की धुनों के बीच एक तरफ मुसलमान फातिहा पढ़ रहे थे तो दूसरी तरफ हिंदू सुंदरकांड का पाठ कर रहे थे।

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