ग्लेशियर की निगरानी के लिए जरूरी है प्राधिकरण

सन 2010 में उत्तारांचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने राज्य में स्नो एंड ग्लेशियर प्राधिकरण के गठन की पहल की थी। दुर्भाग्य से वे उसके बाद कुछ ही दिन मुख्यमंत्री रहे व उसके बाद इस महत्वाकांक्षी परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

-पंकज चतुर्वेदी, स्वतंत्र लेखक

यह बात सभी जानते हैं कि हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप के जल का मुख्य आधार है और यदि नीति आयोग के विज्ञान व प्रोद्योगिकी विभाग द्वारा तीन साल पहले तैयार जल संरक्षण रिपोर्ट पर भरोसा करें तो हिमालय से निकलने वाली 60 फीसदी जल धाराओं में दिनों-दिन पानी की मात्रा कम हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग या धरती का गरम होना, कार्बन उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन और इसके दुश्परिणामस्वरूप धरती के शीतलीकरण का काम कर रहे ग्लेशियरों पर आ रहे भयंकर संकट व उसके कारण समूची धरती के अस्तित्व के खतरे की बातें अब महज कुछ पर्यावरण-विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रह गई है। धीरे से कुछ ऐसे दावों के दूसरे पहलू भी सामने आने लगे कि जल्द ही हिमालय के ग्लेशियर पिघल जाएंगे, जिसके चलते नदियों में पानी बढ़ेगा और उसके परिणामस्वरूप जहां एक तरफ कई नगर-गांव जल मग्न हो जाएंगे। धरती के बढ़ते तापमान को थामने वाली छतरी के नष्ट होने से भयानक सूखा, बाढ़ व गरमी पड़ेगी और जाहिर है कि ऐसे हालात में मानव-जीवन पर भी संकट होगा। असल संकट तो धरती के बढ़ते तापमान के चलते विशाल ग्लेशियरों के टूटने, फिसलने से खड़ा हो रहा है।

सात फरवरी 2021 की सुबह कोई साढे दस बजे नंदा देवी पर्वतमाला पर चंदी के मुकुट से दमकते ग्लेशियर का एक हिस्सा टूट कर तेजी से नीचे फिसला और ऋशिगंगा नदी में गिर गया। इतने विशाल हिम खंड के गिरने से नदी के जल-स्तर में अचानल उछाल आना ही था। विश्व प्रसि़द्ध फूलों की घाटी के करीबी रैणी गांव के पास चल रहे छोटे से बिजली संयत्र में देखते ही देखते तबाही थी और उसका असर वहीं पांच किलोमीटर दायरे में बहने वाली धौली गंगा पर पड़ा व वहां निर्माणाधीन एनटीपीसी का पूरा प्रोजेक्ट तबाह हो गया। रास्ते के कई पूल टूट गए और कई गांवों का संपर्क समाप्त हो गया। सन 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद देवभूमि में एक बार फिर विकास बनाम विनाश की बहस खड़ी हो गई है। जान लें जिस रैणी गांव के करीब ग्लेशियर गिरने की पहली धमक हुई वहां के निवासी सन 2019 में हाई कोर्ट गए थे कि पर्यावरणीय दृष्टि से इतने संवेदनशील इलाके में बिजली परियोजना की आड़ में अवैध खनन हो रहा है जो तबाही ला सकता है। मामला तारीखो में उलझा रहा और हादसा हो ही गया। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हमें अभी अपने जल-प्राण कहलाने वाले ग्लेशियरों के बारे में सतत अध्ययन और नियमित आकलन की बेहद जरूरत है।

इस घटना पर वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलोजी के वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि सर्दियों में आमतौर पर ग्लेशियर टूटने की घटना कम होती है। विदित हो हाल के दिनों में यहां अच्छी बर्फबारी हुई थी और इससे हिमालय के उपरी हिस्सों में खासी बर्फ जमा हो गई थी। तापमान कम हुआ तो ग्लेशियर सख्त हो गए। इससे ग्लेशियर टूट गया। यह भी संभावना है कि ग्लेशियर की सबसे अंदरूनी परत व बाहरी के तापमान में बड़ा अंतर आने पर भी यह खिसक सकते हैं। हमारे यहां अल्पाईन किस्म के ग्लेशियर हैं । जब ज्यादा बरसात या बर्फबारी हो तो इनके टूटने की संभावना ज्यादा होती है।

ऐसा नहीं है कि पहाड़ पर ग्लेशियर का खतरा टल गया है। नंदाकिनी नदी के किनारे सदियों से डेरा जमाए शिला समुद्र ग्लेशियर की तलहटी में जिस तरह दो बड़े सुराख देखे जा रहे हैं वह एक बड़ी आपदा की चेतावनी है। कोई आठ किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस ग्लेशियर के पीछे विशाल चट्टानों व मलवे का भंडार है। यदि यह ग्लेशियर किसी आपदा का शिकार होता है तो हरिद्वार तक इसके कारण तबाही होगी। ऐसे ही गढवाल में उत्तरकाशी स्थित यमुनोत्री, गंगोत्री, डोकरियानी, बंदरपुंछ ग्लेशियर पर खतरे मंडरा रहे है। इसके अलावा चमोली के द्रोणगिरी, हमपरावमक, बद्रीनाथ, संतोपंथ और भागीरथी ग्लेशियर, रूद्रप्रयोग के केदारनाथ धाम के पीछे चोराबाड़ी, खतलिंग व केदार ग्लेश्यिर , पिथौरागढ़ के हीरपामणि, रालम आदि भी किसी दिन अपना रौद्र रूप दिखा सकते हैं।

यह बात चिंता की है कि लगातार बढ़ते धरती के तापमान के चलते ग्लेशियर पिघलने से समूचे हिमालय में कई सौ झीलें बन गई हैं। रिमोट सेंसिंग के जरियो पता चला है कि भागीरथी नदी घाटी में 306 तो अलकनंदा घाटी में 635, धौलीगंगा घाटी ( जहां यह हादसा हुआ है) में 75, गौरी गंगा में 92, मंदाकिनी घाटी में नौ व यमुना घाटी में 13 जलकुंड बन गए हैं। इनका क्षेत्रफल 500 मीटर से ज्यादा है। वहीं सन 2012 से 2020 के बीच उत्तराखंड में ग्लेशियर पिघलने के कारण कोई पांच बड़ी झील बन गई है और यदि ये फटती है तो भारी तबाही होगा। ये सभी झीलें 0.88 वर्ग किलोमीटर से 3.36 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल की हैं। ये झीलें कितनी तेजी से आकार लेती हैं , इसकी बानगी है ऋषिगंगा की वह झील जिसके कारण सात फरवरी 2021 वाला हादसा हुआ।

अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के रिमोट सेंसिंग के आंकड़े बताते हैं कि ऋषिगंगा के केचमेंट क्षेत्र में सात दिन पहले तक कोई भी झील नहीं थी। यहां कुल 14 ग्लेशियर हैं इनका पानी पिघल कर नंदा देवी पर्वतमाला के बहता हुआ ऋषिगंगा नदी में मिलता है। चूंकि हिमालय बहुत युवा और जिंदा पहाड़ है व इसमें भूगर्भीय हरकतें तेजी से होती हैं सो इसमें भूस्खलन व मलबा निकलना आम बात है और यही भौगोलिक घटना कुछ ही देर में गहरी झील निर्मित कर देती है। विदित हो विकास योजनाओं के नाम पर पहाड़ों की अंधाधुध कटाई, खासकर जल विद्युत परियोजनाओं के लिए भारी मशीनों से गहरी सुरंगों के निर्माण से पहाड़ बहुत नाराज है और जब तब अपने गुस्से का इजहार कर देता हैं। ग्लेशियर के करीब बन रही जल विद्युत परियोजना के लिए हो रहे धमाकों व तोड़ फोड़ से शांत- धीर गंभीर रहने वाले जीवित हिम- पर्वत नाखुश है। हिमालय भू विज्ञान संस्थान का एक अध्ययन बताता है कि गंगा नदी का मुख्य स्त्रोत गंगोत्री हिंम खंड भी औसतन 10 मीटर के बनिस्पत 22 मीटर सालाना की गति से पीछे खिसका है।

हिमालय पर्वत के उत्तराखंड वाले हिस्से में छोटे-बड़े कोई 1439 ग्लेशियर हैं। राज्य के कुल क्षेत्रफल का बीस फीसदी इन बर्फ-शिलाओं से आच्छादित है। इन ग्लेशियर से निकलने वाला जल पूरे देश की खेती, पेय, उद्योग, बिजली, पर्यटन आदि के लिए जीवनदायी व एकमात्र स्त्रोत है। जाहिर है कि ग्लेशियर के साथ हुई कोई भी छेड़छाड़ पूरे देश के पर्यावरणीय, सामाजिक , आर्थिक और सामरिक संकट का कारक बन सकता है। इसीलिए सन 2010 में उत्तारांचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने राज्य में स्नो एंड ग्लैशियर प्राधिकरण के गठन की पहल की थी। उन्होंने इसरो यानी इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेशन के निर्देशन में स्नो एंड अवलांच स्टडीज इस्टेबलिशमेंट, चंडीगढ़ व देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालय स्टडीज के सहयोग से ऐसे प्राधिकरण के गठन की प्रक्रिया भी प्रारंभ कर दी थी। दुर्भाग्य से वे उसके बाद कुछ ही दिन मुख्यमंत्री रहे व उसके बाद इस महत्वाकांक्षी परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
इससे पहले सन 2006 में आरएस टोलिया की अध्यक्षता में बनी माउंटेन टास्क फोर्स ने ऊपरी हिमालय के बारे में कम जानकारी होने के कारण उसे अंधकार युग निरूपित किया था। इस कमेटी ने ग्लेशियर के बारे में सतत निरीक्षण की संस्तुति की थी। सन 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद उत्तराखंड अंतरिक्ष केंद्र और आईसीआईमोड के जरिए कुछ जानकारियां जुटाने के उपक्रम शुरू हुए लेकिन कारगर नहीं हो रहे। सन 2018 में आई रिपोर्ट ‘ओशियन एंड क्रायोस्पेयर इन द चैंजिंग क्लाइमेंट’ में चेतावनी दे दी गई थी कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन तक ग्लेशियर पिघलने से भारत में जल संकट तो होगा ही, पहाड़ के लेागों का जीवन प्राकृतिक आपदाओं से परेशान होगा। इस रिपोर्ट में ग्लेशियर मॉनिटरिंग की ठोस व्यव्स्था का सुझाव दिया गया था।

ग्लेशियर असल में एक छोटे बच्चे की तरह होते हैं, उनके साथ थोड़ी भी छेड़छाड़ की जाए तो वे खुद को समेट लेते हैं। असल में अभी तक ग्लेशियर के विस्तार, गलन, गति आदि पर नए तरीके से विचार ही नहीं किया गया है और हम उत्तरी घ्रुव पर पश्चिम देशों के सिद्धांत को ही हिमालय पर लागू कर अध्ययन कर रहे हैं। आज आवश्यकता है कि ग्लेशियरों की हर दिन की गतिविधयों के अवलोकन, संभावना, खतरों, चेतावनी आदि के लिए एक प्राधिकरण का गठन हो जो ग्लेशियर से अवतरित होने वाली जल धाराओं की घाटियों में विकास व पर्यावरण का संतुलन भी स्थापित कर सके।

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