बाल मिठाई यानी बरफी के ऊपर पोश्त की चाशनी वाले दाने

मनोज बिनवाल

बाल मिठाई नेपाल से आई। सूर्य पूजा में भोग के लिए इसका उपयोग होता था। अल्मोड़ा में बाल मिठाई का निर्माण और व्यापार के जनक हलवाई स्व. जोगालाल शाह माने जाते हैं। अल्मोड़ा, चंपावत, हल्द्वानी, नैनीताल और दिल्ली तक में बाल मिठाई की दुकानें हैं लेकिन जो स्वाद अल्मोड़ा की बाल मिठाई में है वो कहीं और नहीं।

देवभूमि उत्तराचंल विशिष्ट खान-पान के लिए प्रसिद्ध है। इसमें चंसु, झोई, कपिलु, मंडुवे की रोटी, पिंडालू की सब्जी, झंगोरा की खीर, गहत की दाल और अल्मोड़े की मिठाई बाल यानी बाल मिठाई। बाल मिठाई मूलत: कुमाऊनी व्यंजन है इसे घर में बनाना बड़ा ही मुश्किल है। बाल मिठाई को एकबारगी देखने पर लगेगा की ये तो चाकलेट की बरफी है पर ऐसा है नहीं।

किंवदती यह भी है कि बाल मिठाई नेपाल से आई। सूर्य पूजा में भोग के लिए इसका उपयोग होता था। अल्मोड़ा में बाल मिठाई का निर्माण और व्यापार के जनक हलवाई स्व.जोगालाल शाह माने जाते हैं। उन्होंने ब्रिटिश शासनकाल में 1865 में इसके उत्पादन का श्रीगणेश किया। अल्मोड़ा, चंपावत, हल्द्वानी, नैनीताल, जागेश्वर, रानीखेत, देहरादून और दिल्ली तक में बाल मिठाई की दुकानें हैं लेकिन जो स्वाद अल्मोड़ा की बाल मिठाई में है वो कहीं और नहीं। अल्मोड़ा में ही बाल मिठाई की 50 से अधिक दुकानें हैं पर जोगा शाह और खीम सिंह मोहन सिंह की बाल मिठाई में जो स्वाद है वो कहीं और नहीं।

बाल मिठाई के दो हिस्से होते हैं। एक चाकलेटी रंग की बर्फी और दूसरा उसके ऊपर चिपके हुए दाने। इन दानों को बालदाना कहते हैं और इसी के कारण इसका नामकरण बाल मिठाई पड़ा। बाल मिठाई को शुद्ध खोये से तैयार किया जाता है। मिठाई बनाने के लिए खोये और चीनी को तब तक पकाया जाता है, जबतक कि उसका रंग चाकलेटी न हो जाए। ठंडा होने पर इसे आयताकार टुकड़ों में काटकर उन पर बालदाना लगाया जाता है। यह बालदाना खसखस और चीनी को मिलाकर बनाया जाता है। कुछ लोग बिना बालदाने वाली मिठाई भी खाते हैं।

स्व. जोगा लाल शाह की लाला बाजार स्थित दुकान को उनकी चौथी पीढ़ी चला रही है। उनके पौत्र हरीशलाल शाह बताते हैं कि सबसे पहले अल्मोड़ा में बाल मिठाई के निर्माता उनके परदादा ही थे। उन दिनों ब्रिटिश भी यहां की मिठाई को पसंद करते थे। वे यहां से बाल मिठाई को इंग्लैंड ले जाते थे। अमेरिका, जर्मनी, आस्ट्रेलिया समेत कई देशों से बाल मिठाई मंगवाई जाती है। स्वाद के अलावा इस मिठाई की खासियत है इसका लंबे समय तक खराब नहीं होना। मिठाई को एक से डेढ़ महीने तक आसानी से खाया जा सकता है। फिलहाल लॉकडाउन के कारण मिठाई का धंधा मंदा है।

बाल मिठाई का खोया जागेश्वर, शीतलाखेत, लाट, चौँसली, रानीखेत के आस-पास के गांवों से तैयार होकर आता है। बाल दाने के बारे में बागेश्वर के पत्रकार और मिठाई विक्रेता केशव भट्ट, बताते हैं कि -पहले बाल दाना भी पहाड़ में ही बनता था। चीनी की चाशनी जिसे बक्खर कहते हैं, में पोस्तदाना मिलाकर बाल दाने देशी भट्‌टी में तैयार किए जाते थे लेकिन अब धीरे-धीरे बिजली की मशीनें आ गई और बालदाना बनाने का कारोबार हल्द्वानी और काशीपुर चला गया। अब वहां से ये बालदाना आता है। बारीक बालदाना मोटे की अपेक्षाकृत महंगा होता है।

बाल मिठाई का डिब्बा हल्के लाल रंग का होता है जिस पर लिखा होता है अल्मोड़ा की प्रसिद्ध बाल मिठाई। इसे फ्रिज में रखकर वापस खाना यानी पत्थर चबाने जैसा है। दांत हिलने या किनारे टूटने का खतरा भी बना रहता है।

 

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