भगत सिंह ने बताया था आतंक और क्रांति का असली अर्थ

भगत सिंह ने इंकलाब जिंदाबाद के नारे की तर्क संगत व्याख्या की है। अब इस नारे के इंकलाब शब्द को लीजिए ये शब्द बताता है विद्रोह क्रांति नहीं है पर विद्रोह का परिणाम क्रांति में परिवर्तित हो जाया करता है। हमारे नजदीक प्रगति के लिए तब्दीली का नाम क्रांति है।

– आनंद मोहन माथुर, प्रसिद्ध समाजसेवी

पिछले कई सालों से जिस शब्द ने हमारे राजनैतिक जीवन में तूफान खड़ा किया है और जिसके बारे में सबसे ज्यादा गलतफहमी रही है वह शब्द है ‘‘आतंक।’’ पूरी भारतीय कौम अपने लक्ष्य को ठीक से ना समझ पाने के कारण रात दिन ठोकरें खा रही है।

जिस शब्द को सुनते ही यह विचार पैदा होता है कि यह शब्द दुख देने वाला, अत्याचारी, जोर-जबरदस्ती और अन्यायपूर्ण है। ‘आतंक’ और ‘जुल्म’ से आशय है ताकत का गलत ढंग से प्रयोग ‘ताकत’ शब्द का प्रयोग करने से एक सीमा की ध्वनि आती है लेकिन ‘आतंक’ का अर्थ बिना सीमा के है। आतंक का अर्थ है जुल्म और जबरदस्ती करना। हथौड़े से पत्थर की मूर्ति तोड़ना भी आतंक है और लाठी का प्रयोग करना भी आतंक नहीं है।

जो अपने देश-प्रदेश की आजादी के लिए लड़ रहे हैं, उन्हें सामने वाला आतंकी नजर आता है। उदाहरण के लिए 1857 के संग्राम को अंग्रेज ‘गदर’ कहते थे और आजादी के बाद अब उसे स्वतंत्रता संग्राम कहते हैं।

यदि कोई डाकू कुल्हड़ी लेकर किसी के घर में घुस जाए तो उसे ‘आतंक’ कहा जायेगा लेकिन अगर घर वालों ने छूरी का इस्तेमाल कर डाकू को मार डाला तो उसे भी आतंक की संज्ञा दी गई है, जबकि घर वालों ने रक्षा के लिए छूरी उठाई थी, तब भी उसे आतंक ही कहा गया। रावण जबरदस्ती से सीता को उठा ले गया तो वो आतंक और सीता को छुड़ाने गए राम ने रावण का सर काट दिया तो वह भी आतंक। आभूषण चुराने के लिए मासूम बच्चे की गर्दन काट देने वाला चोर भी आतंकी और उस चोर का फांसी पर लटका देने वाला सम्राट भी आतंकी, कृष्ण भी उतने ही पापी और कंस भी उतना ही पापी। शूरवीर भीम भी उतना ही गुनहगार जितना उसकी पत्नी का अपमान करने वाला दुशासन। कितनी गलतफहमी है, कितना बड़ा अन्याय है। कुछ सीधे-साधे लोगों ने यदि अच्छे उद्येश्य से बल प्रयोग किया तो क्या वे आतंकवादी कहलायेंगे। सांप डंसता है तो आदमी उसे मार डालता है लेकिन दोनों बराबर नहीं हैं, डंसना सांप की आदत है और वो इस आदत से मजबूर है लेकिन इंसान ने ये काम जानबूझकर किया। इसलिए उसे अधिक नीच समझना चाहिए। शिवाजी, राणा प्रताप, रणजीत सिंह तीनों को अंग्रेजों ने आतंकी कहा लेकिन ये पूजनीय व्यक्ति घृणा के शिकार हो गए। आतंक के दो चेहरे हैं जो जिस चेहरे को देखता है वो उसे आतंकी दिखता है। जैसे अपने देश या प्रांत की आजादी का काम करने वाला उस प्रदेश पर अधिकार जमाने वाले को आतंकी समझता है, वैसे ही जो अपने देश-प्रदेश की आजादी के लिए लड़ रहे हैं, उन्हें सामने वाला आतंकी नजर आता है। उदाहरण के लिए 1857 के संग्राम को अंग्रेज ‘गदर’ कहते थे और आजादी के बाद अब उसे स्वतंत्रता संग्राम कहते हैं।

पूरी गलतफहमी की जड़ ‘आतंक’ शब्द की गलत व्याख्या है, क्योंकि आतंक और जुल्म में बल प्रयोग होता है, बल प्रयोग अच्छे और बुरे कामों में हो सकते हैं, जुल्म जिनमें से एक है। इसी तरह अपने देश की रक्षा के लिए या आजादी के लिए शस्त्र लेकर मैदान में उतरने वाला देशभक्त जब जालिम और बलशाली को तलवार से मौत के घाट उतार देता है या जालिम किसी मजलूम का बदला लेते हुए फांसी पर चढ़ जाता है, वह बलप्रयोग तो जरूर करता है लेकिन आतंक नहीं फैलाता है।

वह बल प्रयोग जिससे निर्दोषों को बिना कारण सताया जाए या दूसरों को किसी नीच इच्छा से नुकसान पहुंचाया जाए केवल ऐसे ही कामों को आतंक कहा जा सकता है। किसी गरीब को उसकी रक्षा के लिए मदद की जाए तो वो आतंक नहीं पुण्य है। इन सब बातों से सिद्ध होता है कि बल प्रयोग करना कोई जुल्म, अत्याचार या आतंक नहीं है बल्कि वो बलप्रयोग करने वाले की नीयत पर निर्भर करता है।

इसलिए इतना जान लीजिए कि ताकत का गलत इस्तेमाल अर्थात गरीबों, अनाथों को सताना आतंक है और इन सबको रोकना अच्छा काम है। राजनीति की बात लीजिए इटली पर उस देश की इच्छा के विरूद्ध आस्ट्रिया तलवार की जोर पर राज करता था, इसलिए इटली को जबरदस्ती अधीन रखने का काम ‘आतंक’ करता था लेकिन जब गैरी बार्डी और मेजनिंग ने आस्ट्रिया के खिलाफ तलवार उठाई और उस जालिम बादशाह के तख्ते को पलट दिया तब उनका काम घृणा लायक नहीं बल्कि पूज्यनीय माना गया।

लीजी सम्पत्ति
सम्पत्ति बनाने का विचार मनुष्य को लालची बना देता है, वह पत्थर दिल हो जाता है। दयालुता और मानवता उसके मन से मिट जाती है। सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए राज सत्ता की आवश्यकता होती है, इससे फिर लालच बढ़ता है, अंत में पहले साम्रज्यवाद आता है फिर युद्ध होता है। खून खराबा और अन्य बहुत से नुकसान होते हैं। अगर सब एकजुट हो जायें और कोई लालच ना करे मिल जुलकर सभी काम करें, चोरी डाके की कोई चिंता ना रहे तो फिर पुलिस, जेल, कचहरी और फौज की जरूरत ना पड़े। थोड़ा समय काम करके अधिक पैदावार होने लगे। सभी लोग आराम से पढ़ें लिखें, शांति और खुशहाली से रहें।

किसी को क्या अधिकार है कि वो केक खाते हुए मौज उड़ाये जबकि दूसरे को सूखे टुकड़े भी ना मिले ऐसा क्यों?
इस प्रश्न पर कार्ल मेनिंग ने कहा है:
‘‘काम ही ना मिले और रोटी भी ना मिले तो रोटी छिन कर खा लो’’ मुनष्य को स्वर्ग का लालच, नरक का भय दिखाकर काम की प्रेरणा देना गलत है जब मनुष्य ज्ञानवान हो गया तो वो दुनिया में सम्पर्क स्थापित करने के लिए स्वतंत्र है और वो अपने विचार रख सकता है।

भगवान और धर्म
यूरोप में 19वीं सदी में भगवान और धर्म पर विचार किया गया और उनके विरूद्ध विद्रोह भी उठ खड़ा हुआ। यह तो उस समय से होता आ रहा है जबकि जनता का ज्ञान बहुत कम था, उस समय प्रत्येक चीज से विशेषकर देवी शक्तियों से डरते थे, उनमें आत्मविश्वास नहीं था, वे स्वयं को खाक का पुतला कहते थे। बच्चों को यही सिखाया जाता है कि सब कुछ भगवान है मनुष्य तो कुछ भी नहीं, इस तरह के विचार मन में आने से आत्मविश्वास मर जाता है। मनुष्य अपने को निर्बल समझता है और हमेशा भयभीत रहता है। जितने समय वो भय में रहता है, उतनी देर उसे पूर्ण सुख और शांति नहीं मिल सकती।

ईश्वर ने ये दुखभरी दुनिया क्यों बनाई? क्या तमाशा देखने के लिए? तब तो वो रोम के क्रूर शहंशाह निरो से भी अधिक जालिम हुआ, फिर इस चमत्कारी ईश्वर की क्या आवश्यकता है, ॉ हमेशा से स्वार्थियों ने धर्म को अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए इस्तेमाल किया है, इतिहास इसका साक्षी है। धैर्य धारण करो अपने कर्मों को देखो ऐसे दर्शन ने जो यातनाएं मनुष्य को दी हैं, वह सभी को मालूम है। वास्तव में बात ये है कि हिन्दुस्तान में श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म का उपदेश दिया है लेकिन श्रीकृष्ण भी अर्जुन को मृत्योपरांत स्वर्ग और विजय का लालच देने से पीछे नहीं रहे। ना हमारा ईश्वर को प्रसन्न करने का कोई लालच है और ना स्वर्ग में जाकर मौज मारने का लोभ, ना पुर्नजन्म में ही सुख मिलने की आशा हम रखते हैं।

इंकलाब जिंदाबाद का अर्थ
भगत सिंह ने इंकलाब जिंदाबाद के नारे की तर्क संगत व्याख्या की है, अब इस नारे के इंकलाब शब्द को लीजिए ये शब्द बताता है विद्रोह क्रांति नहीं है पर विद्रोह का परिणाम क्रांति में परिवर्तित हो जाया करता है। हमारे नजदीक प्रगति के लिए तब्दीली का नाम क्रांति है। प्रायः गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में कस लेती है और वे किसी भी प्रकार की तब्दीली से हिचकिचाने लगते हैं। इस गतिरोध को भंग करने के लिए क्रांति की आवश्यकता होती है नहीं तो निराशा का वातावरण बन जाता है और प्रतिगामी शक्तियां गलत रास्ते पर ले जाती हैं। इससे मानवीय प्रगति रूक जाती है और गतिरोध आ जाता है। इस स्थिति को बदलने के लिए आवश्यक है कि क्रांतिकारी भावना को जगाया जाए ताकि प्रतिगामी शक्तियां मानव उन्नति की राह में रोड़ा ना बन सकें। मानव उन्नति का ये एक अनिवार्य सिद्धांत है कि पुरानी चीज नई चीज में परिवर्तित होना चाहिए।

‘इंकलाब जिंदाबाद’ से हमारा ये उद्येश्य नहीं है कि जो आमतौर पर गलत धारणा है कि पिस्तौल और बम इंकलाब लाते हैं, हमारा कहना है बेशक पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की शान पर तेज होती है। हमारे इंकलाब का अर्थ है पूंजीवाद और उससे उपजी हुई मुसीबतों का अंत करना।

राष्ट्रवाद
राष्ट्रवाद जब संकीर्णता की ओर बढ़ता है तो वो फासिस्टवाद बन जाता है। फासिस्टवाद में स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व बुरजवा वर्ग यानी पूंजीपति, जमींदार या उच्च मध्यमवर्ग के हाथ में आता है, लेकिन जब स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व क्रांतिकारी संगठन करता है तो राष्ट्रीयता तो उसमें होती ही है लेकिन राष्ट्रवाद समाजवाद में रूपांतरण होता है। फासिस्टवाद में रूपांतरण राष्ट्रवाद का नहीं बल्कि पूंजीवाद का होता है। राष्ट्रवाद और समाजवाद मे कोई अंतर विरोध नहीं है। जिन देशों में साम्राज्यवाद और सामंतवाद फैला हुआ है, उन्हें सर्वहारा की राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय झण्डे को अपनाना चाहिए।

भगत सिंह एवं उसके क्रांतिकारी साथी संघर्ष की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले सच्चे राष्ट्रवादी थे। भगत सिंह का प्यारा गीत था:
‘‘दिल से जायेगी ना मरकर भी उल्फत,
मेरी मिट्टी से भी खुशबू ए वतन आएगी।

अछूत समस्या
इस 30 करोड़ जनसंख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जायेगा, उनके मंदिरों में प्रवेश से देवता नाराज हो जायेंगे, कुंए से उनके द्वारा पानी निकालने से कुंआ अपवित्र हो जाएगा। यह है अछूत समस्या।

1926 में बम्बई म्युनिसिपल काउंसिल के सदस्य नूर मोहम्मद ने क्या स्पष्ट कहा है:
‘‘जब तुम एक इंसान को पीने के लिए पानी देने से इंकार करते हो, जब तुम स्कूल में पढ़ने नहीं देते तो तुम्हें क्या अधिकार है कि तुम अपने लिए और अधिकारों की मांग करो।

जब तुम उन्हें पशुओं से गया बीता समझोगे तो वो दूसरे धर्मो में शामिल हो जायेंगे, जहां उनसे इंसानों जैसा व्यवहार किया जायेगा। फिर ये कहते हो कि ईसाई और मुसलमान हिन्दू कौम को नुकसान पहुंचा रहे हैं क्या मतलब रखता है। सवाल ये पैदा होता है कि अछूतों को जनेऊ धारण करने का हक है या नहीं? क्या उन्हें वेद शास्त्रों का अध्ययन करने का अधिकार है या नहीं? जरा सोचो कितने शर्म की बात है, कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है, हमारी रसोई में घुस सकता है लेकिन एक इंसान का हमसे स्पर्श हो जाये तो धर्म भ्रष्ट हो जाता है। सबको प्यार करने वाले भगवान की पूजा करने के लिए मंदिर बना है लेकिन वहां अछूत चला जाये तो वो मंदिर अपवित्र हो जाता है, भगवान रूष्ट हो जाता है। पशुओं को हम गोद में खिला सकते हैं लेकिन इंसान को अपने पास नहीं बैठा सकते।

अछूत समस्या और निदान
इस समस्या का सही निदान क्या हो? इस सवाल का जवाब बड़ा अहम है। पहले ये निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इंसान समान हैं तथा ना तो जन्म से अलग अलग पैदा हुए हैं और ना कार्य विभाजन से। एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है इसलिए जीवनभर मैला साफ करेगा और उसे किसी तरह के विकास करने का हक नहीं है, ये बाते फिजूल है। इस तरह हमारे पूर्वजों ने उनके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया और नीच कहकर निम्न कोटी के कार्य करवाने लगे। फिर ये चिंता हुई कि कहीं ये विद्रोह ना कर दे तब पुर्नजन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया और कहा ये तुम्हारे पुर्नजन्म के पापों का फल है, अब क्या हो सकता है चुपचाप दिन गुजारो।

हमने पिछड़ी जातियों के साथ भी अन्याय किया है, हमने जुलाहे को दुत्कारा है, आज कपड़ा बुनने वाला अछूत समझा जाता है। इन सब बातों को अपने समक्ष रखते हुए हमें चाहिए हम ना इन्हें अछूत कहें ना समझें, बस समस्या हल हो जाती है।

अछूत अपने जनप्रतिनिधि से अधिक अधिकार मांगें, संगठनबद्ध हो जाएं तथा अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दें। तब देखना तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने वाला इंकार करने की हिम्मत नहीं कर सकेगा। दूसरे की मुंह की ओर ना ताको, नौकरशाही का मोहरा मत बनो, पूंजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है, तुम असली सर्वहारा हो, तुम संगठनबद्ध हुए तो तुम्हारी गुलामी की जंजीरे कट जाएंगी।

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