2021में लौट पाएगी सराफा व 56 की रौनक,10,000 परिवारों की रोजी रोटी पर संकट

विनोद पाठक, इंदौर।

कोरोना वायरस संक्रमण ने न केवल मजदूर किसान वर्ग की रोजी-रोटी पर संकट खड़ा किया है अपितु मध्यमवर्ग भी अब परेशान होने लगा है। विश्व प्रसिद्ध इंदौर की चाट चौपाटियों के ऊपर आगामी 6 माह तक इस वायरस का संक्रमण बादल मंडराता रहेगा । शहर को विश्वप्रसिद्  बनाने वाले लगभग 10000 परिवार की रोजी-रोटी पर संकट छाया हुआ है। आने वाले समय में खानपान के इस बाजार का कैसा स्वरूप होगा, क्या इंदौर के शौकीन इन बाजारों की रंगत फिर से लौटाएँगे? कुछ इस प्रकार के प्रश्न आम है।इंदौर की विश्व प्रसिद्ध सराफा चौपाटी की रंगत उड़ चुकी है।

भविष्य में यह रोनक कब लौटेगी इसका संशय बना हुआ है ।शहर की प्रसिद्धि में शुमार सराफा चाट चौपाटी के साथ-साथ शहर में 56 दुकान भी प्रसिद्ध है ।इसके अलावा जैसे जैसे शहर बढ़ता गया शहर के विभिन्न क्षेत्रों में छोटी-छोटी चाट चौपटिया बनती गई । प्रमुख रूप से विजय नगर ,मेघदूत, बापट चौराहा, एलआईजी, तिलक नगर ,पलासिया, छावनी ,भवरकुआ, सपना संगीता, रीजनल पार्क ,गोपुर चौराहा,अन्नपूर्णा,रंजीत हनुमान, बंगाली चौराहा, कपड़ा मार्केट ,मल्हारगंज शामिल है। इन सभी चाट चौपाटी मे देश भर की विभिन्न प्रकार की खानपान की संस्कृति का समावेश हो चुका है ।एक अनुमान के अनुसार पूरे शहर में 10,000 से अधिक चाट चौपाटी दुकानदार अपने परिवार को पाल पोस रहे थे । अब इनकी रोजी-रोटी पर संकट खड़ा हो गया है।

अंतर्राष्ट्रीय सर्राफाजितना पुराना इंदौर है, लगभग उतना पुराना ही सराफा बाजार और उसकी चाट चौपाटी है ।सराफा की प्रसिद्धि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गई है ।शहर में आने वाला हर नामी-गिरामी व्यक्ति एक बार सराफा चाट चौपाटी जरूर आता रहा है । डिजिटल क्रांति के इस युग में सराफा चौपाटी पर सैकड़ों डॉक्यूमेंट्री बन गई है  वहीं विश्व के खान-पान का हिसाब किताब रखने वाली पत्र-पत्रिकाओं में भी सराफा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।नाश्ते से लेकर पेट भरने तकसमोसा कॉर्नर से लेकर छोटा सराफा और शकर बाजार तक फैले खानपान के बाजार में नाश्ते से लेकर पेट भरने तक की व्यवस्था है। विजय के पेटीस हो या समोसा कार्नर की कचोरी या हो जोशी के दही बड़े। घंटेवाले की छोले टिकिया हो या भुट्टे का किस या हो लालू के पराठे ।नमकीन की बहार के साथ मीठे के शौकीनों के लिए नागौरी की शिकंजी भैरवनाथ की रबड़ी ,मालपुआ ,बड़ी जलेबी,गुलाब जामुन, रसमलाई ,श्रीखंड या हो नीमा-अग्रवाल की कुल्फी। ऐसे सैकड़ों दुकानदार है जिन्होंने पीढ़ियों से इंदौर और इंदौर में आने वाले स्वाद के शौकीनों को भरपेट खिलाया है। और सराफ़ा की चौपाटी का नाम ऊंचा किया है ।

56 भी कम नहीं शहर के पूर्वी क्षेत्र में पलासिया चौराहे के समीप 56 दुकान नाम का बाजार भी कमोबेश सराफा की तर्ज पर बना है । पहले यहां काफी खुलापन होता था किंतु हाल ही के दिनों में नगर निगम ने इसे नव श्रंगारित कर दिया है। इसके बाद यहां पर पार्किंग की व्यवस्था खत्म हो गई और जगह भी सीमित हो गई है।क्या होगा आगे यही प्रश्न दुकानदारों के मन में भी बढ़ रहा है कैसे इस प्रकार की खाने पीने की दुकानों पर फिर से रंगत आएगी कैसे सोशल डिस्टेंसिंग का पालन होगा बनाने की व्यवस्था में किन-किन निर्देशों का पालन करना होगा। सबसे बड़ी बात तो क्या ग्राहक फिर से इन खाउ ठियों पर उमड़ेंगे ? इन प्रश्नों का जवाब तो भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है।


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