सिविल सेवा परीक्षा में हिंदी अनुवाद : खग ही जाने खग की भाषा

सिविल सेवा परीक्षा के दुर्लभ हिंदी अनुवाद

-देवेंद्र सिंह (राष्ट्रीय संयोजक, प्रकल्प : प्रतियोगी परीक्षा, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास)

सिविल सेवा परीक्षा में पाये जाने वाले दुर्लभतम हिंदी अनुवाद अब स्थाई परम्परा का रूप ले चुके है। हिंदी शब्दों को तोड़ मरोड़कर लौहपथगामिनी जैसे शब्दों की रचना करने वाले व्यंगकार संघ लोक सेवा आयोग के अनुवादकों के सामने बौने नजर आते हैं। इस बार सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में ऐलर्जी को प्रत्यूर्जता, लेग्यूम(फली) को शिंब, कैरक्टरस्टिक को चरित्र चित्रण, essentially कोमूलतः अनूदित किया गया है। प्रश्न पत्र में ऐसे अनुवादों की भरमार है जो राजभाषा विभाग के ई-महाशब्दकोश से मेल नहीं खाते, संभवतः इसलिए क्योंकि संघ लोक सेवा आयोग ‘‘स्वायत्त संस्था’’ है। इस बार के भ्रष्ट अनुवादों में नया कीर्तिमान रहा सिविल डिसओबिडिएन्स मूवमेंट का अनुवाद दूसरे कालखंड में हुए असहयोग आन्दोलन किया जाना।

पिछले माह आयोजित सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में वर्तनीकी अशुद्धियों और मनघडंत शब्दों की नयी परिपाटी प्रारम्भ हुई है। साम्यकोसाम्या, रबीकोरवितो “शिक्षाऐं “, “रिआयत” ,”पीड़ाओं” जैसे शब्द लिखने वाले अनुवादक दसवीं पास हैं या नहीं , संशय होताहै। शोले फिल्म के चक्की “पीसिंग ” की तर्ज पर जवाब देयता जैसे शब्द अनुवाद कोंकी मौलिकता एवं रचनात्मकता का परिचय देते हैं। अब जो छात्र प्रश्न पत्रों के हिंदी संस्करण पर दाव खेलते हैं उनकी सफलता की संभावनाएं न्यूनतम हो जाती है । प्रश्न यह उठता है कि क्या यह वास्तव में एक प्रतियोगिता है जिसमें छात्रों का एक वर्ग सिर्फ इसलिए पीछे रह जाता है क्यों की उसने परीक्षा संघ की राजभाषा में देने का विकल्प चुना है ?

ऐसी समस्या पर कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों की स्थाई टिप्पणी होती है कि ‘‘अरे इसमें क्या है? यदि हिंदी समझ नहीं आ रही तो अंग्रेजी संस्करण देख लो। इतनी भी अंग्रेजी नहीं जानते तो क्या आई-ए-एस बनोगे। ऐसे मासूम तर्क का उत्तर यह है कि प्रश्न हिंदी, अंग्रेजी जानने का नहीं वरन,यहां प्रश्न अवसर की समानता का है। 120 मिनट की समय सीमा में प्रतियोगियों का एक वर्ग (हिंदी माध्यम) पहले गलत या दुर्बोध हिंदी अनुवाद पढ़े फिर अंग्रेजी संस्करण पढ़कर आयोग की गलती सुधारे फिर निष्कर्ष तक पहुंचने में समय गंवाता रहे वहीं दूसरा वर्ग जो अंग्रेजी में सहज है, सुगम पाठ पढ़े व उत्तर दे। जिस परीक्षा में एक-एक मिनट व दशमलव अंक चयन हेतु निर्धारक है वहां छात्रों के सिर पर खराब अनुवाद का बोझ डालकर भटका देनाकहाँकीबराबरीहै? प्रश्न यह भी है कि क्या संघ लोक सेवा आयोग इतना अक्षम है कि वह कुछ प्रश्नों का सहीहिंदी अनुवाद भी नहीं कर सकता?

दूसरी बात यह है कि यदि कहा जाए कि हिंदी अनुवाद समझ न आने की स्थिति में अंग्रेजी संस्करण देख ले तों यह सीधा व स्पष्ट प्रमाण है कि अनुवाद ठीक नहीं है। यानि हिंदी अनुवाद इतना मुश्किल को हिंदी माध्यम का छात्र भी उसे न समझ सके परंतु अंग्रेजी अनुवाद इतना स्पष्ट कि कोई भी समझ ले। खास बात यह है कि यह सब तब हो रहा है जब गृह मंत्रालय के स्पष्ट निर्देश हैं कि अनुवाद में मूल पाठ का सही भाषा आना चाहिए न कि शब्दशः हिंदी विकल्पों की प्रतिस्थापना की जाए। गृह मंत्रालय के निर्देशों की ये 2 पंक्तियों शायद आयोग की समझ से परे है अथवा आयोग की दृष्टि में यह गैर वाजिब है।

वर्ष 2011 से ऐसे क्लिष्ट अनुवादों की परंपरा शुरु करने का क्या कारण हो सकता है? संभवतः आयोग सामान्य अध्ययन के साथ-साथ कार्यालयी हिंदी के उच्च स्तरीय ज्ञान, धैर्य, सहनशीलता, संयम, साहस , आपदा प्रबंधन जैसे गुणों का परीक्षण ऐसे अनुवादों के माध्यम से करना चाहता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि वर्ष 2011 से ही इन प्रश्नपत्रों को सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूड टेस्ट कहा गया है।

सिविल सेवा परीक्षा में बैठने वाले अभ्यथियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे विद्यालय एवं महाविद्यालय के स्तर पर पढ़े पाठ्यक्रम पर अच्छी पकड़ रखते हों। यह शिक्षण प्रक्रिया मानक पुस्तकों, समाचार पत्रों, सरकारी, प्रकाशनों तथा समाज के लोगों से अन्तर्क्रिया के माध्यम से होती है और इन्हीं सब चीजों से विद्यार्थियों में समझ व ज्ञान का निर्माण होता है। विद्यार्थियों का शब्दकोश भी इन्हीं सबसे निर्मित होता है। अभ्यर्थी से ऐसे शब्दों से बने प्रश्न पूछे जाएं जो उसने 20-22 वर्ष की शिक्षण प्रक्रिया में कभी सुने तक न हो क्योंकि वे एक विशिष्ट शब्दकोश के अतिरिक्त कहीं उपलब्ध नहीं है और इस आधार पर उसे अंग्रेजी माध्यम की तुलना में अलाभदायक स्थिति में ढकेल दिया जाए तो क्या यह घोर अन्याय नहीं है। देश की राजभाषा का ऐसा प्रयोग हो कि वो पुल के स्थान पर अवरोध का काम करने लगे , ऐसी विचित्र परिस्थिति दुनिया में शायद और कहीं नहीं होगी।

हिंदी अनुवाद की यह स्थिति अभ्यर्थियों के लिए असफलता एवं विद्वानों हेतु दुःख का कारण है, परन्तु यह और भी कई समस्याओं की और हमारा ध्यान आकर्षित करती है। । क्या ये अनुवाद पुरूषोत्तम अग्रवाल समिति की सिफारिशों के अनुरूप वरिष्ठ विद्वानों द्वारा परीक्षित किये जाते हैं? क्या कोई विद्वान रबी को रवि लिखा देखकर अपनी सहमति दे सकता है?आखिर क्यों संघ लोक सेवा आयोग में राजभाषा में चंद पंक्तियों का ठीक – ठीक अनुवाद करने की क्षमता नहीं है जबकि विभिन्न विभागों व निदेशालयों का पूरा तंत्र इस कार्य में लगा है। चिंता इस बात की है कि जब सिविल सेवा परीक्षा में हिंदी अनुवाद की यह स्थिति है तो सभी भारतीय भाषाओं में प्रश्नपत्रों की उपलब्धता कैसे हो पाएगी। अनुवाद पर ये प्रश्नचिन्ह राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षा पर नहीं लगते एवं वर्ष 2011 से पूर्व सिविल सेवा परीक्षा पर ऐसे सवाल नहीं खड़े हुए। आखिर वर्ष 2011 के बाद से ही अनुवाद का मुद्दा क्यों उठा, इस पर भी आयोग को चिंतन करना चाहिए। किसी परीक्षा प्रणाली के लिए सबसे शर्म की बात है छात्रों के मन में उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगना। ऐसे अनुवादों की पुनरावृत्ति से यह विश्वसनीयता कितनी रह जाएगी, इस पर भी आयोग को विचार करना चाहिए।

एक ओर सर्वोच्च न्यायालय का सरकार से अपेक्षा करता है कि राजभाषा अधिनियम में संशोधन कर सरकारी अधिसूचनाएं भारतीय भाषाओं में जारी करनी चाहिए वहीं दूसरी ओर विभिन्न आन्दोलनों, समितियों की अनुशंसाओं, लाखों छात्रों की मासूम उम्मीदों के बावजूद भी परीक्षा में दुर्बोध अनुवादों का सिलसिला थम नहीं रहा। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी प्रतियोगी परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात करती है, ऐसे अनुवादों के रहते लगता है कि शायद ये कभी न पूरा हो सकने वाला सपना है।

एक दशक से उठ रहे इन प्रश्नों पर देश के विद्वानों तथा वर्तमान एवं पूर्व लोक सेवकों द्वारा भी गंभीर मंथन की आवश्यकता है। यह भी सोचना चाहिए कि रेलवे भर्ती बोर्ड व नवसृजित एन-टी-ए- जैसी संस्थाएं कई भारतीय भाषाओं में प्रश्नपत्र उपलब्ध करवा रही है तो संघ लोक सेवा आयोग ठीक-ठाक हिंदी अनुवाद क्यों नहीं उपलब्ध करवा सकता। आयोग को भी इन प्रश्नपत्रों में तकनीकी जटिलता से मुक्तहोकर,अनुवाद की प्रक्रिया पर पुनर्विचार कर सहजता के उसी पायदान पर खड़ा होना होगा जहां वह वर्ष 2011 के पूर्व था। जब तक हिंदी अनुवाद की स्थिति नहीं सुधरती तब तक अन्य भारतीय भाषाओं में सुबोध अनुवाद उपलब्ध हो पाना एवं छात्रों को संविधान प्रदत्त अवसर की समानता मिल पाना दूर की कौड़ी जान पड़ता है।

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