कंपनियां दोगुना तक मजदूरी देने को तैयार, पर ढूंढ़े नहीं मिल रहे मजदूर

विनोद शर्मा/शैलेंद्र वर्मा | इंदौर

रुक गया विकास… कारोबारी एसोसिएशन की सिफारिश वाले मजदूरों को ही मिल रही अपने घर जाने की परमिशन, अब मजदूरों को वापस बुलाने पर जोर दे रहे उद्योग

लॉकडाउन में काम करने की जिला प्रशासन से अनुमति ले आई कंपनियों को अब मजदूर ढूंढ़े नहीं मिल रहे। हालत यह है कि मैनेजर से लेकर मालिक तक बस्ती-बस्ती मजदूरों की तलाश में भटक रहे हैं। इसका कारण शहर में बढ़ते कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन की सख्ती के चलते उपजा खाने-पीने का संकट है, जिसके कारण यहां से बड़ी संख्या में मजदूर अपने घरों को पलायन कर गए। अब जब कंपनियों ने गुहार लगाई तो जिला प्रशासन ने मजदूरों का पलायन रोकने के उद्देश्य से थोकबंद दी जा रही परमिशन रोक दी और सिर्फ उन्हीं को परमिशन दी जा रही है, जिनकी सिफारिश कारोबारी एसोसिएशन से की गई हो।

लॉकडाउन-2 से ही जिला प्रशासन ने विभिन्न कंपनियों को काम करने की इजाजत देना शुरू कर दी थी। अब तक शहरसीमा से लगे औद्योगिक क्षेत्रों में भी छूट मिल चुकी है। 50-60 दिन के बाद कंपनियों के ताले खुले, लेकिन प्रोडक्शन शुरू हुआ कुछ ही कंपनियों में। ज्यादातर कंपनियां अब भी मजदूरों को मनाने या फिर नए मजदूर ढूंढ़ने में ही लगी है। इसके लिए दोगुना मजदूरी के लुभावने ऑफर भी दिए जा रहे हैं, लेकिन मजदूर नहीं मिल रहे हैं।

इंदौर और पीथमपुर की जितनी भी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट हैं उनमें ज्यादातर मजदूर यूपी-बिहार-राजस्थान-झारखंड के थे, जो कारखाने बंद होने के बाद अपने मुकाम पर लौट गए। कंपनियों की दिक्कत यह है कि जो मजदूर गए, वे ट्रेंड थे। बार-बार संपर्क करने और तमाम सुविधाएं गिनाने के बावजूद इंदौर के कोरोना संक्रमितों की संख्या देख वे दोबारा आने को तैयार नहीं हैं। स्थानीय श्रमिक दोगुना मजदूरी में भी काम करने को तैयार नहीं, जबकि उन्हें ज्यादा पैसा देने के बावजूद एक-दो महीने काम सिखाने में ही लग जाएंगे। कंपनियों का कहना है कि सीखते वक्त मजदूर कच्चे माल का नुकसान करेगा सो अलग। ऐसे में मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट बढ़ेगी और बढ़ी लागत से सामान बेचना मुश्किल होगा।

मजदूरों का पलायन रोकना जरूरी

उद्योग-धंधे, कारोबार बंद होने से कई दिन से मजदूर गृह राज्यों में पलायन कर रहे हैं, लेकिन अब इसे रोकने की जरुरत है, तभी शहर का विकास गति पकड़ सकेगा। साथ ही उन्हें अब वापस लाने के भी इंतजाम करना होंगे। चित्र बायपास का।

40 प्रतिशत मजदूर बचे, 100 प्रतिशत काम कैसे करें?

यूपी-बिहार-राजस्थान-झारखंड के मजदूर लॉकडाउन पीरियड में इंदौर छोड़कर अपने घरों को चले गए। इसके चलते हालत यह है कि जहां 100 लोग काम करते थे वहां अब 40 बचे हैं। प्रशासन ने 12 घंटे काम लेने की छूट दी है। इतना काम कराते हैं तो भी 60 प्रतिशत से ज्यादा काम नहीं होता। मुनाफा तो दूर कंपनियों की लागत नहीं निकलेगी। स्थिति अभी और बिगड़ेगी। मैंने पता किया है जो लोग पैदल या अपने वाहनों से नहीं जा पाए जिस दिन रेल सेवा शुरू होगी, वह भी चले जाएंगे। इसीलिए कई कंपनियों ने काम ही शुरू नहीं किया।
-गौतम कोठारी, अध्यक्ष, पीथमपुर औद्योगिक संगठन

तालाबंदी का खतरा मंडराया

परमिशन लेकर बैठे कई उद्योगों की हालत ऐसी है कि मजदूर न मिलने से दोबारा स्थिति तालाबंदी की बन रही है। इन उद्योगों ने कलेक्टर से मदद मांगी और मजदूरों का पलायन रोकने की मांग की। इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और मजदूरों की थोकबंद परमिशन रद्द की।

रियल एस्टेट : वहां का मजदूर यहां

रेरा के अनुसार इंदौर में 335 प्रोजेक्ट पर काम जारी है, जबकि 273 नए प्रोजेक्ट पंजीबद्ध हुए हैं। इनकी औसत लागत 10 करोड़ भी आंकें तो कुल लागत 6 हजार करोड़ से ज्यादा है। करीब 100 ऐसी कॉलोनियां हैं जिनकी टीएनसी और डेवलपमेंट परमिशन हो चुकी है और काम शुरू होना है। इनकी कुल कॉस्ट 1000 करोड़ है। 1500 करोड़ के 150 प्रोजेक्ट शुरू करने की बिल्डरों ने परमिशन तो ले ली, लेकिन ठेकेदारों के पास पर्याप्त लेबर नहीं है। ऐसे में कॉर्पोरेट कंपनियों की हैडहंटिंग की तरह मजदूर हंटिंग चल रही है। किसी एक साइट पर काम करने वाले मजदूर को ज्यादा मजदूरी का लालच देकर तोड़ा जा रहा है।

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