मध्यप्रदेश की ‘नारायण कथा’ का पूरा किस्सा।

धर्मेद्र पैगवार | भोपाल

मान्धाता विधायक नारायण पटेल ने गुरुवार को इस्तीफा दे दिया। एक सप्ताह में कांग्रेस के ये तीसरे विधायक का इस्तीफा है। पटेल को भाजपा में लाने की पूरी कहानी को सहकारिता मंत्री अरविन्द भदौरिया ने कोरोना संक्रमित होने से पहले बखूबी अंजाम दिया…

कांग्रेस के मान्धाता से विधायक नारायण पटेल के इस्तीफा देकर भाजपा में जाने की पटकथा एक पखवाड़े पहले ही लिख ली गई थी। सही समय आने पर अंजाम देने की रणनीति बनाई गई थी। पटेल के लगातार बयानों से उनकी उपेक्षा को पकड़ा प्रदेश की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले अरविन्द भदौरिया ने। पहले नारायण के मन को टटोला फिर भाजपा के वरिष्ठों को बताया। फिर इस काम का जिम्मा भी भरोसे से पार्टी ने उनको ही सौंपा। पटेल ने खुद इस बात को प्रदेश भाजपा कार्यालय में पत्रकारों के सामने स्वीकारा।
पूरी पटकथा बेहद बारीकी से बुनी गई। नारायण पटेल कांग्रेस के बड़े झंडाबरदार रहे हैं। पूर्व मंत्री अरुण यादव के बेहद करीबी भी। ऐसे में कोई भी चूक पलटवार बन सकती थी। भदौरिया के पास बस एक सिरा था-वो ये कि पटेल कांग्रेस में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

उनको भरोसे में लेने के लिए भिंड क्षेत्र के एक गुर्जर नेता की भी मदद ली गई। पटेल गुर्जर जाति के हैं। फिर इसी लाइन पर आगे उनकी मुख्यमंत्री से मुलाकात करवाई गई। भदौरिया ने अपने मिज़ाज़ के मुताबिक बिना हड़बड़ी के अभियान पूरा किया। पटेल नेपानगर की विधायक रहीं सुमित्रा देवी के साथ ही भाजपा में शामिल होना चाहते थे। पर उन्हें जानबूझकर बाद में शामिल करवाया गया। दरअसल, पटेल को इस्तीफा दिलवाने की तारीख 30 जुलाई तय थी। पर भदौरिया के 22 जुलाई की रात को संक्रमित होने के बाद इसे गुरुवार को ही पूरा कर लिया गया।

कोरोना संक्रमित होने के बाद भी भदौरिया ने पूरी कमान अपने हाथ में रखी। वे बुधवार की रात मोबाइल पर ही सक्रिय रहे। नारायण पटेल ने इस्तीफे की जानकारी खुद फ़ोन करके दोपहर में भदौरिया को दी। ऑपरेशन नारायण के पूरा होते ही भदौरिया ने अपना मोबाइल बंद करके थोड़ी देर आराम किया।

                           गेम चेंजर…

सहकारिता मंत्री अरविन्द भदौरिया इस वक्त भाजपा के सबसे बड़े गेम चेंजर बनकर उभरे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों के साथ पूरे वक्त बेंगलुरु में वे सक्रिय रहे। उनकी रणनीति के चलते ही दिग्विजय सिंह जैसे नेता को बेंगलुरु से खाली हाथ लौटना पड़ा था।

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