समन्वय व सहिष्णुता हिन्दू धर्म के प्राण

समन्वय व सहिष्णुता हिन्दू धर्म का प्राण है। यही वह शक्ति है जिसके कारण वह हजारों वर्षों से जीवंत है। बात-बात पर आहत होती भावनाएं और उस पर मचते उपद्रव हिन्दू धर्म के स्वतंत्र चिन्तन को आहत कर रहे हैं। हिन्दू धर्म में बढ़ती उग्रता इसी मूल तत्व पर चोट कर रही है।

-ओमप्रकाश श्रीवास्तव आईएएस अधिकारी और धर्म, दर्शन और साहित्य के अध्येता

अनुयायियों की संख्या के आधार पर संसार के सबसे बड़े तीन धर्म ईसाई, इस्लाम और हिंदू हैं। इतिहास गवाह है कि सबसे ज्यादा रक्तपात धर्म के नाम पर हुआ है, चाहे वह धर्म-प्रचार के नाम पर हुआ हो या धर्म-सुधार के नाम पर। येरुशलम को मुसलमानों के अधिपत्य से मुक्त कराने के लिए 12वीं और 13वीं सदी में ईसाइयों और मुसलमानों के बीच 200 वर्षों से अधिक तक युद्ध चला। 17 वीं सदी में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट ईसाइयों के बीच 30 वर्ष तक रक्तरंजित संघर्ष हुआ। 11 वीं सदी में मोहम्मद गजनवी और 12 वीं सदी में मोहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमण का उद्देश्य लूटपाट, राज्य विस्तार के साथ ही साथ धर्म प्रचार भी था। धर्म प्रचार के नाम पर आक्रमण, युद्ध और अत्याचारों की कहानियों से इतिहास भरा पड़ा है।

परंतु हिन्दू धर्म के साथ स्थिति अलग है। ईसा से 2 हजार वर्ष पूर्व वेदों की रचना हुई। उसके बाद 600 ईसा पूर्व तक उपनिषदों का दर्शन पूर्णत: विकसित हो चुका था। जनसामान्य को सरल भाषा में समझाने के लिये पुराणों की रचना हुई। इस विकास के साथ ही रीति-रिवाज और देवता भी बदलते गये। वैदिक काल में इंद्र, अग्नि, वरुण आदि देवताओं के स्थान पर पाँच संप्रदाय अस्तित्व में आये– गाणपत्य, शैवदेव, वैष्णव, शाक्त और सौर जो क्रमश: गणेश, शिव, विष्णु, शक्ति और सूर्य की आराधना करते थे। बाद में इन्हें भी समान माना जाने लगा और शिव, विष्णु और शक्ति प्रधान देवता हो गये जो आज भी हैं। यह आपस में भी एक-दूसरे के भक्त हैं। हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी देवता माने जाते हैं। पर वह इतने से ही संतुष्ट नहीं है। अपनी आस्था के अनुसार किसी भी नये देवता की आराधना कर सकता है।

ऐसा नहीं है कि हिन् धर्म में समय-समय पर कोई उथल-पुथल या मतभेद न हुए हों। इसकी पहली क्रांति कृष्ण की गीता थी जिसने सांसारिक कार्यों को ही ईश्वर प्राप्ति का साधन बताकर आम जनता को विशाल यज्ञों से मुक्ति दे दी। वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध बौद्ध धर्म का उदय बड़ी क्रांति थी। शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में 4 धाम स्थापित कर हिन्दू धर्म को संगठित स्वरूप देने का प्रयास किया। शैवों, वैष्णवों व शाक्तों के बीच संघर्ष हुए हैं परंतु यह संघर्ष कभी भी धर्म की मुख्य धारा नहीं बन सके। हर संघर्ष के बाद समन्वय की बात सामने आई। 15 और 16 वीं सदी में हुए भक्ति आंदोलन ने देश भर में सांस्कृतिक जागरण किया। कर्मकांड, जातिवाद, भेदभाव के विरुद्ध आवाजें उठीं। संत कबीर ने तो हिन्दुओं की मूर्तिपूजा और मुसलमानों की अजान की रीति का खुलकर उपहास किया। उन्हें भी ध्यान से सुना गया, देश निकाला नहीं दे दिया गया। इन आंदोलनों और क्रांतियों की विशेषता यह रही कि इनमें रक्तपात, अत्याचार, अनाचार नहीं हुआ। नए विचारों को समझा गया और पुराने विचारों में परिष्कार किया गया। हिन् धर्म ने बुद्ध के संदेश में निहित सत्य को स्वीकारा और उन्हें विष्णु का अवतार घोषित करके ‘भगवान बुद्ध’ कहना शुरु कर दिया। इस्लाम जैसे एकेश्वरवादी धर्म में से पीरों की मजारों पर जाकर इबादत करने की सूफी परंपरा की शुरूआत इसी समन्वय का परिणाम था।

वर्तमान समय में सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जिसमें समन्वय व सहिष्णुता को कायरता का पर्याय मान लिया गया है। यदि आप समन्वय और सहिष्णुता के पक्ष में लिखते हैं तो ट्रोल हो जाएँगे। आपके राष्ट्रद्रोही घोषित होने तक का खतरा हो सकता है। लेकिन यही अवसर है जब हिन्दू धर्म की इस विशेषता को बच्चे-बच्चे को बताया जाये, जिसके कारण, जब संसार की मिस्र और मेसोपोटामिया जैसी प्राचीन सभ्यताएँ विलुप्त हो गईं तब भी, हिन्दू धर्म और प्रकारांतर से भारतीय सभ्यता और संस्कृति अनेक झंझावातों के बाद भी जीवंत है। आज भारत का अस्तित्व इसी सांस्कृतिक एकता के ताने-बाने से संरक्षित है।

सबसे पहले हमें अब्राहमिक धर्मों और हिन्दू धर्म का अंतर समझना होगा । इस्लाम, यहूदी और ईसाई तीनों धर्मों के मूल संस्थापक हजरत अब्राहम थे इसलिए इन्हें अब्राहमिक धर्म कहा जाता है। यह एक ईश्वर को मानते हैं तथा नबी या पैगम्बर उस ईश्वर का संदेश लाते हैं। इनकी एक मार्गदर्शी पवित्र पुस्तक है। इस्लाम के लिए यह कुरान, यहूदियों के लिए तनख और ईसाइयों के लिए बाइबल है। इन पुस्तकों में लिखी बातें उनके अनुयायियों के लिए अंतिम सत्य है। उन पर कोई शंका नहीं की जा सकती न ही उनमें कोई संशोधन हो सकता है। यह मानते हैं कि उनका मार्ग ही ईश्वर तक जाने का एकमात्र मार्ग है। जो इस मार्ग को नहीं मानते वे काफिर या विधर्मी हैं। उनको इस एकमात्र मार्ग पर लाना ईश्वर की प्रसन्नता के लिए आवश्यक है। इसलिए यह धर्म अपना प्रचार करते हैं और अनुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं।

इसके विपरीत हिन्दू धर्म में श्रुति ग्रंथ अर्थात् वेद, उपनिषद आदि अनुभूति के चरम सत्य का वर्णन करते हैं। इसे हम उपनिषदों के पॉंच महावाक्यों में कह सकते हैं जो स्वरूप में लघु है, परन्तु बहुत गहन विचार समाये हुए है – अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ), तत्त्वमसि (वह ब्रह्म तू है), अयम् आत्मा ब्रह्म (यह आत्मा ब्रह्म है), प्रज्ञानं ब्रह्म (प्रकट ज्ञान ही ब्रह्म है) और सर्वं खल्विदं ब्रह्म (सर्वत्र ब्रह्म ही है) । उपनिषद के यह महावाक्य निराकार ब्रह्म और उसकी सर्वव्यापकता का परिचय देते हैं और कहते हैं कि मनुष्य देह, इंद्रिय और मन का संघटन मात्र नहीं है, बल्कि वह सुख-दुख, जन्म-मरण से परे दिव्यस्वरूप है, आत्मस्वरूप है। आप सोचेंगे कहां मैं वेद, उपनिषदों की बातें ले बैठा जबकि आप तो राम, कृष्ण या अन्य अवतारों की लीलाओं में श्रद्धा रखते हैं तो मैं बता दूँ आपके आराध्य की लीलाएं परोक्ष रूप से मार्ग इंगित करती हैं और उसी लक्ष्य को प्राप्त करने को प्रोत्साहित करती हैं जो वेदों मे वर्णित है। वहीं स्मृति ग्रंथ समाज संचालन के कानून हैं जो ऐसी जीवनचर्या बताते हैं जिससे सत्य की अनुभूति का मार्ग प्रशस्त हो सके। समय के साथ स्मृतियों में संशोधन होता रहता है परंतु वह मूल नैतिक नियमों के विपरीत नहीं होना चाहिए। आज हमारी प्रमुख स्मृति भारत का संविधान है।

हिन्दू दर्शन मानता है कि जैसे सभी मनुष्य शारीरिक रंग-रूप में परस्पर भिन्न होते हैं वैसे ही उनका आंतरिक विकास, प्रकृति, चेतना और ज्ञान का स्तर भी भिन्न-भिन्न होता है। इसलिए सत्य की अनुभूति का उनका तरीका भी अलग-अलग होगा। कोई मूर्तिपूजा करेगा, कोई भक्ति करेगा, कोई प्रार्थना करेगा, कोई योग तो कोई ध्यान या अन्य क्रियाएँ करेगा। यह जन्म-जन्मांतरों की श्रृंखला है, तब जाकर वह सत्य या ईश्वर की अनुभूति करके मुक्त हो सकेगा। हिन्दू धर्म व्यक्ति को स्वयं ही ईश्वर की अनुभूति करने पर जोर देता है। कोई धारणा नहीं थोपी जाती। इस अनुभूति पर केवल हिन्दू धर्म मानने वालों का अधिकार नहीं है। भौतिकी के आधुनिक प्रयोगों और पूर्वीय धर्मों में वर्णित विश्व के एकत्व और सत्य की अनुभूतियों की समानता बताने वाली विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘द ताओ ऑफ फिजिक्स’ के लेखक फ्रित्जॉफ काप्रा लिखते हैं ‘मैं सागर के तट पर बैठा लहरों के उत्थान पतन को निहारता हुआ अपनी सांसों की लय को अनुभूत कर रहा था। अचानक मुझे प्रतीत हुआ कि मेरा सारा परिवेश एक विराट ब्रह्माण्डीय नृत्य में रत है। भौतिकविद् होने के कारण मैं जानता था कि सभी भौतिक वस्तुएँ परमाणुओं और उन शूक्ष्म कणों से बनी हैं जो निरंतर कंपन करते हैं और उनकी अंतर्कियाओं से निरंतर नए कणों का सृजन और विसृजन होता रहता है। अभी तक यह मैं सैद्धांतिक रूप से जानता था। आज मैंने अनुभूत किया कि इस ब्रह्माण्डीय नृत्य में मेरी देह का कण-कण सहभागिता कर रहा है। मुझे जीवंत अनुभूति हुई कि यही हिंदुओं के आराध्य नटराज का नृत्य है।‘

हम जो पढ़ते, सुनते, देखते हैं वह हमारी बौद्धिक जानकारी होती है। संसार के धर्मों में सारी लड़ाई इसी बौद्धिक जानकारी को लेकर है। परंतु हिन्दू धर्म स्वयं की अनुभूति पर जोर देता है जो हर व्यक्ति की अलग-अलग हो सकती है। इसलिए हम सभी मार्गों और अनुभूतियों को उसी ईश्वर तक जाने का मार्ग मानते हैं। जब शिकागो में विवेकानंद कहते हैं कि ‘जैसे सारी नदियां सागर में मिलती हैं वैसे ही भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिनन रास्तों से जाने वाले लोग अंत में तुझ (ईश्वर) में ही मिलते हैं‘ तो इसका यह अर्थ नहीं कि हिन्दू कायर हैं और इसलिए ‘तुम्हारी भी जै-जै हमारी भी जै-जै’ कहकर बच निकलना चाहते हों। यह तो हिन्दू दर्शन का मूल तत्व है। इसीलिए हिन्दुओं में विधर्मी या काफिर और ईशनिन्दा की कोई अवधारणा ही नहीं है। इसीलिए हिन्दू ग्रंथों में धर्म प्रचार का कोई निर्देश नहीं है। गीता में यहां तक कहा गया है कि जो पूर्वाग्रही और शंकालु हैं उनके सामने उपदेश नहीं देना चाहिए। इतिहास में धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने और प्राण देने के असंख्य उदाहरण हैं। कृष्ण ने भी अर्जुन से महाभारत का युद्ध लड़वाया परंतु यह अन्याय के प्रतिकार के लिए था। हिन्दुओं ने अपने धार्मिक विश्वासों को थोपने के लिए कोई युद्ध नहीं लड़ा।

इसलिए समन्वय व सहिष्णुता हिन्दू धर्म का प्राण है। यही वह शक्ति है जिसके कारण वह हजारों वर्षों से जीवंत है। बात-बात पर आहत होती भावनाएं और उस पर मचते उपद्रव हिन्दू धर्म के स्वतंत्र चिन्तन को आहत कर रहे हैं। हिन्दू धर्म में बढ़ती उग्रता इसी मूल तत्व पर चोट कर रही है। गीता के शब्दों में कहें तो सहिष्णुता और समन्वय ‘यत्तदग्रे विषमिव परिणामेsमृतोपमम्’ अभी भले ही विष जैसा लगे परंतु परिणाम में अमृत की तरह है। उग्रता और असहिष्णुता से भले ही क्षणभंगुर साम्राज्य स्थापित हो जाए परंतु इससे हिन्दू धर्म सम्प्रदाय बन जाएगा पर धर्म नहीं रह पायेगा, सनातन नहीं रह पाएगा। निर्णय हमारी पीढ़ी को करना है।

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