कोरोना भी कर रहा है रंग व नस्लभेद !

वाशिंगटन/लंदन/नई दिल्ली

कोविड-19 ने ज़ात-धर्म, रंग-रूप, देश-भाषा जैसी तमाम सरहदों को तोड़कर पूरी दुनिया में लोगों को अपना शिकार बनाया है, लेकिन अगर हम कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों को देखें, तो ऐसा लगता है कि ये वायरस भी नस्लवादी भेदभाव कर रहा है क्योंकि इसके शिकार लोगों में कई तरह की असमानताएं दिख रही हैं। इन में नस्ल और जातीयताओं का फ़र्क़ भी शामिल है।

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के शिकागो में अप्रैल 2020 के शुरू में कोरोना से मरने वालों में 72 फ़ीसद लोग अश्वेत अमरीकी थे। इसी तरह, जॉर्जिया में 17 अप्रैल 2020 तक कोरोना वायरस से मरने वालों में 40 फीसद गोरे लोग थे। जबकि जॉर्जिया की कुल आबादी में गोरों की जनसंख्या 58 फ़ीसद है। ब्रिटेन में शुरुआती 2,249 कोरोना संक्रमित लोगों में से 35 फ़ीसद अश्वेत थे। हालिया जनगणना के मुताबिक़ ये आंकड़ा इंग्लैंड और वेल्स में अश्वेत लोगों की कुल आबादी के अनुपात से कहीं ज़्यादा है। लोगों की सेहत को लेकर जिस तरह की ग़ैर बराबरी हमेशा से रही हैं, उसमें ये आंकड़े हैरान करने वाले नहीं हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इस महामारी ने स्वास्थ्य सेवाओं में होने वाले नस्लवाद की गंदी तस्वीर को सामने रख दिया है।

गोरी नस्ल की आबादी वाले देशों में आर्थिक संसाधनों तक अन्य नस्लों के लोगों की पहुंच बहुत कम है। कोविड-19 महामारी से पहले दक्षिण अफ्रीका में ऐसे क़रीब 91 फ़ीसद अश्वेत परिवार थे, जिनके भुखमरी के शिकार हो जाने की आशंका थी। इनकी तुलना में दक्षिण अफ्रीका के केवल 1.3 प्रतिशत गोरे परिवारों के कुपोषण के शिकार होने की आशंका थी। कनाडा में भी कोविड-19 से पहले 48 फीसद मूल निवासियों के परिवारों के पास खाने के पर्याप्त संसाधन नहीं थे। कोरोना महामारी के बाद उनकी हालत और ख़राब हो गई है। अमेरिका में भी कोरोना के बाद अश्वेतों के खाद्य असुरक्षा के हालात और भी ख़राब हो गए हैं।

धर्म के आधार पर बनाया जा रहा निशाना

कोरोना वायरस के संकट काल में कुछ समूहों को उनके धर्म के आधार पर भी निशाना बनाया जा रहा है। भारत में कहा जा रहा है कि मुसलमान कोरोना फैलाने के लिए फल सब्ज़ियों पर थूक रहे हैं। बहुत से लोग उन्हें कोरोना जिहादी कहकर बुलाने से भी परहेज़ नहीं करते। इसी तरह अमेरिका में भी अफवाह फैलाई जा रही है कि अश्वेत लोग कोरोना वायरस से लड़ने की क्षमता रखते हैं।

मास्क पहनने के मामले में भी अश्वेत लोग पीछे हैं। मास्क पहनने पर उनकी तुलना अपराधियों से की जा रही है। अमेरिका में तो एशियाई मूल के अमरीकियों को, खास तौर से महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है, उन पर थूका जा रहा है। कोरोना वायरस के संकट की वजह से दक्षिण अफ्रीका के डरबन और अन्य बड़े शहरों में झुग्गी झोपड़ियां तोड़ी जा रही हैं।

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