रोया सादत को भी सता रहा है तालिबान के लौटने का डर

काबुल

रोया सादत दुनिया के सबसे हिंसाग्रस्त देशों में से एक अफगानिस्तान में महिलाओं की आवाज रही हैं, लेकिन तालिबान का शासन फिर से लौटने का डर उन्हें भी सता रहा है। साल 2001 में तालिबान के कमजोर पड़ने के बाद पहली महिला फिल्म निर्माता ने अपनी ‘ए लेटर टू द प्रेजिडेंट’, ‘थ्री डॉट्स’ और ‘प्लेइंग द तार’ जैसी फिल्मों के लिए देश और विदेश में शाबाशी पाई।

सादत ने ऐसे दौर में जिंदगी जी जब उनके परिवार को जान बचाकर भागना पड़ा, गृह युद्ध की वीभत्सता को झेलना पड़ा और फिर तालिबान के दमनकारी शासन को बर्दाश्त किया जहां महिलाओं को खौफ के साए में रहना पड़ा और उनकी मूल आजादी तक छीन ली गई। अब सादत का सबसे बड़ा डर तालिबान के उसी शासन के फिर से लौट आने का है। गौरतलब है कि अमेरिका और तालिबान ने दोहा में 29 फरवरी को शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके मुताबिक अमेरिका अगले 130 दिनों में अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या 13,000 से घटाकर 8,600 करेगा और 14 महीनों में अपने सभी सैनिकों को वापस बुलाएगा। साथ ही इसमें ओस्लो में इस महीने अंतर-अफगान वार्ता शुरू होने की भी बात है। यह समझौता अफगानिस्तान में दशकों से चल रहे युद्ध को खत्म करके शांति कायम करने पर है लेकिन इसमें महिलाओं के अधिकारों की कोई गारंटी नहीं दी गई है।

37 वर्षीय फिल्म निर्माता ने कहा, ‘मुझे चिंता होती है जब याद आता है कि 9/11 होने से पहले तक कैसे हम तालिबान के पांच साल के शासन को भूल गए थे। अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय हमें फिर से छोड़ देता है तो निस्संदेह इसके गंभीर नतीजे होंगे।’ वह अकेली नहीं हैं जिन्हें अपने लिए हासिल की गई छोटी-छोटी आजादी छीनने का डर है। शहरी इलाकों में युवा संगीत सुनते हुए, टेलिविजन देखते हुए और हाल ही में इंटरनेट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए बड़े हो रहे हैं। कई लोगों ने तालिबान को सिर्फ खबरों में देखा है।

20 वर्ष की आयु में उन्होंने रोया फिल्म हाउस कंपनी बनाई

सादत को नर्स के तौर पर काम करने की अनुमति दी गई थी क्योंकि महिलाएं केवल महिला नर्स से ही इलाज करा सकती थी और उन्होंने अस्पताल में गुपचुप तरीके से अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी जबकि अस्पताल के प्रमुख का संबंध तालिबान से था। उन्होंने कहा, ‘यह बहुत खतरनाक था। मुझे अब भी भरोसा नहीं होता कि हम वह कर पाए।’ 20 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी बहन अल्का के साथ रोया फिल्म हाउस कंपनी बनाई और उन्हें दक्षिण कोरिया में फिल्म की पढ़ाई करने के लिए वजीफा दिया गया। उन्होंने कहा, ‘सिनेमा गैर बराबरी और अन्याय को चुनौती दे सकता है, यह सामाजिक वर्जनाओं को विमर्श में बदल सकता है और लोगों को संवाद के लिए आमंत्रित कर सकता है।’

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