बचपन में किया फैसला इसकी वजह से आज तक अदालत के भीतर संस्कृत में जिरह करते हैं आचार्य श्याम

विभव देव शुक्ला

देश की जनता आम तौर पर हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा में कहती और सुनती है। इसके अलावा कुछ बोलियाँ हैं जो देश के अलग-अलग इलाकों में बोली जाती हैं, शायद इसलिए किसी ने लिखा है ‘कोस-कोस में पानी बदले, पाँच कोस पर वाणी।’ अदालत ऐसी जगह है जहाँ अमूमन अंग्रेज़ी या हिन्दी बोली जाती है, दलीलों से लेकर जिरह तक हिन्दी और अंग्रेज़ी के इर्द-गिर्द घूमता है। लेकिन कभी ऐसा सोचा जा सकता है क्या कि अदालत के भीतर किसी मामले की पैरवी संस्कृत में हो रही है?

38 सालों से संस्कृत में दलीलें
उत्तर प्रदेश के बनारस शहर में रहते हैं आचार्य श्याम उपाध्याय। अदालत के भीतर इन्हें हिन्दी से भरपूर परहेज़ है, इनका बस चले तो हिन्दी में बातें कहना बंद कर दें। आचार्य श्याम मामले की सुनवाई के दौरान हर दलील संस्कृत में परोसते हैं तर्क-वितर्क, जिरह-विमर्श सब संस्कृत में करते हैं। शपथपत्र पत्रावली संस्कृत में ही तैयार करके पढ़ते हैं।
किसी मुवक्किल को उनकी बात समझ नहीं आती है तो उसे बाकायदे दलीलें समझाते हैं। पिछले 38 सालों से अदालत के भीतर का हर काम संस्कृत में करने वाले आचार्य श्याम विधि में स्नातक हैं और संस्कृत में आचार्य हैं। माथे पर त्रिपुंड भी लगाते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनके बाद भी कोई इस परम्परा का निर्वहन करे।

बचपन में किया फैसला
आचार्य श्याम की हठधर्मिता के पीछे वजह भी बेहद दिलचस्प है। एक समाचार समूह से बात करते हुए उनके पिता जी ने कहा संस्कृत को लेकर ऐसा नज़रिया कक्षा सातवीं में ही बन गया था। वह अक्सर इस बात को लेकर चिंता में रहते थे कि संस्कृत का उपयोग कितना सीमित है। अदालत में तो इस भाषा का स्तर लगभग न के बराबर है लिहाज़ा इसका प्रचार होना चाहिए। तब से उन्होंने निर्णय किया कि वह भविष्य में वकील बनेंगे और सारे काम संस्कृत में ही करेंगे।

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