तिहाड़ में बंद गर्भवती सफूरा जरगर की रिहाई की मांग

नई दिल्ली

मानवाधिकार…? 27 साल की छात्र एक्टिविस्ट सफूरा 14 सप्ताह की गर्भवती हैं, इन पर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की साजिश में शामिल होने का आरोप है

हो सकता है 27 साल की सफूरा जरगर इस बात के लिए तैयार जरूर होंगी कि एक्टिविस्ट होने के नाते उनका पुलिस से सामना तो होता रहेगा, लेकिन पुलिस उन्हें आतंकवादियों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले एक कानून के तहत आरोप लगा कर देश के सबसे ज्यादा भीड़ भाड़ वाली जेल में बंद कर देगी, वो भी कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के बीच में और ऐसे समय में जब वो गर्भवती हों, इसकी शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी।

लेकिन सफूरा जरगर के साथ इस समय यही हो रहा है। सफूरा दिल्ली के प्रतिष्ठित जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रा हैं। छात्रों के समूह जामिया कोऑर्डिनेशन समिति की सदस्य होने के नाते वो नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शनों में शामिल थीं और उन्होंने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में कई प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। लेकिन दिल्ली पुलिस मानती है कि सफूरा का फरवरी में दिल्ली में हुए दंगों को भड़काने में हाथ था।

दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने सफूरा को दंगों के पीछे साजिश में शामिल होने के आरोप में 11 अप्रैल को गिरफ्तार किया था। उनकी जमानत याचिका नामंजूर होने के बाद 21 अप्रैल को उनके खिलाफ गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत आरोप लगा दिए गए।

यूएपीए एक बेहद सख्त कानून है और इसे आतंकवाद और देश की अखंडता और संप्रभुता को खतरा पहुंचाने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए बनाया गया है। इस कानून के इतिहास में अभी तक जिन लोगों के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया गया है उनमें शामिल हैं पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का सरगना मसूद अजहर, लश्कर-ए-तैय्यबा का मुखिया हाफिज सईद, उसका साथी जकी-उर-रहमान लखवी और दाउद इब्राहिम। सफूरा इसी कानून के तहत आरोपों का सामना कर रही हैं और वो भी ऐसे समय में जब वो चार महीने की गर्भवती हैं।

सफूरा पर यूएपीए के तहत आरोप लगे हैं। इस कानून के तहत कभी हाफिज सईद और मसूद अजहर पर भी आरोप लग चुके हैं। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सफूरा का गर्भवती होना उनकी रिहाई के लिए पर्याप्त वजह है।

देश में बंदी महिलाओं की हालत चिंताजनक

जून 2018 में केंद्रीय महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने “जेलों में महिलाएं (भारत)” नाम से एक रिपोर्ट छापी थी जिसमें भारतीय जेलों में महिला कैदियों के हालात के बारे में विस्तार से बताया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, जेलों में महिला कर्मचारियों की भारी कमी थी। शौचालय और बाथरूम भी पर्याप्त संख्या में नहीं थे, पानी की आपूर्ति भी पर्याप्त नहीं थी और सेनेटरी नैपकिन इत्यादि भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे। कपड़े और अंतर्वस्त्रों की भी कमी थी और इन्हें नियमित धोने का भी प्रबंध नहीं था। महिला चिकित्साकर्मियों की भी कमी थी। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं के लिए पौष्टिक खाना चिंता का विषय था। इन हालात को देखकर ही सफूरा के परिवार वाले और मानवाधिकार एक्टिविस्ट उनकी रिहाई की अपील कर रहे हैं।

यूएन के नियमों का हवाला

यूएपीए कानून के तहत आरोपी को कम से कम सात साल की जेल हो सकती है। सफूरा इसी कानून के तहत आरोपों का सामना कर रही हैं। जामिया और जेएनयू विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के संगठनों ने और कई जाने-माने स्कॉलरों और एक्टिविस्टों ने सफूरा और जामिया के ही एक और छात्र मीरान हैदर की गिरफ्तारी का विरोध किया है और उन्हें रिहा करने की मांग की है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंडिया ने भी दोनों की गिरफ्तारी का विरोध किया है और विशेष रूप से सफूरा के बारे में कहा है कि उनका गर्भवती होना उनकी हिरासत के जारी रहने के खिलाफ पर्याप्त कारण है। यूएन के नियमों के अनुसार भी गर्भवती महिलाओं की गिरफ्तारी की जगह दूसरे विकल्प तलाशने चाहिए।

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