मंडला जिले के मोहन टोला गांव में मिले डायनासोर के अंडे

प्रकाश जायसवाल | मंडला

जिले के मोहन टोला में करोड़ों वर्ष पुराने जीवाश्म मिले हैं। जीवाश्व विज्ञान में रुचि रखने वाले एक शिक्षक प्रशांत श्रीवास्तव ने प्रथम दृष्टया इन्हें डायनासोर के अंडे बताया है। नागपुर के सीनियर साइंटिस्ट धनंजय महोबे ने भी इसकी पुष्टि की है। उल्लेखनीय है कि मंडला का संबंध करोड़ों वर्ष पूर्व प्रागैतिहासिक काल से रहा है। यहां पर खुदाई करने पर समय-समय पर इसके प्रमाण मिलते रहे हैं। जिले के घुघुआ फॉसिल पार्क के अलावा धनगांव, पालासुंदर, देवरी, सर्रा पिपरिया सहित अन्य ग्रामों में मिलने वाले फॉसिल्स इस बात का प्रमाण हैं कि यहां पर करोड़ों वर्ष पूर्व जीवन रहा है और समंदर लहराता था। कालांतर में भौगोलिक परिवर्तन होने से यह क्षेत्र उलट-पलट हुआ और लाखों की संख्या में जीव एवं वनस्पति जमीदोज हो गए। कालांतर में करीब 6.30 करोड़ साल बाद यह फॉसिल्स के रूप में यदा-कदा मिलते हैं और जानकारी के अभाव में लोग इन्हें बच्चों का खिलौना समझ खेलते रहते हैं। इसी कड़ी में हाल ही में मोहन टोला में डायनासोर के अंडे पाए जाने की जानकारी लोगों को तब मिली, जब इस विषय पर रुचि रखने वाले एक शिक्षक प्रशांत श्रीवास्तव ने प्रथम दृष्टया इन करोड़ों वर्ष पुराने जीवाश्म को देखकर बताया कि यह डायनासोर के अंडे हैं। इसकी पुष्टि नागपुर के सीनियर साइंटिस्ट धनंजय महोबे द्वारा भी की गई है। उन्होंने बताया कि उक्त जीवाश्म डायनासोर के अंडे का ही है। यह भी बताया कि यह शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों प्रकार के अंडे हैं, जिनकी पुष्टि वैज्ञानिक परीक्षण के द्वारा की जा सकेगी।

निर्माण कार्य में गिट्‌टी, मुरम की जगह किया जा रहा जीवाश्म का उपयोग

इस विषय का दिलचस्प पहलू यह है कि जानकारी के अभाव में यह प्राकृतिक धरोहर खुदाई के दौरान सड़कों एवं तालाब की बाउंड्री के कार्य में हो रही है और गिट्टी, बोल्डर, मुरम की तरह इसका उपयोग किया जा रहा है। दुर्भाग्य है कि जिस डायनासोर को लेकर दुनिया के वैज्ञानिक अति संवेदनशील हैं और उसे संरक्षित करवाने वहां की सरकारें कटिबद्ध हैं, वहीं विडंबना यह है कि मंडला की इन धरोहर को संरक्षित करने में हम असमर्थ महसूस कर रहे हैं। जबकि तत्काल इनका संरक्षण आवश्यक है। शासन-प्रशासन से अपेक्षा है कि इन्हें संरक्षित करने के प्रयास किए जाने चाहिए।

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