इस शक्स के चलते भारतीय फुटबॉल टीम को नसीब हुए थे पाँवों में जूते और कई ख़िताब, अब बन रही फिल्म

विभव देव शुक्ल

साल 2018 से ही अजय देवगन की एक फिल्म को लेकर काफी चर्चा थी, लिहाज़ा हर चाहने वाले के ज़ेहन में बस एक ही सवाल था कि फिल्म की कहानी क्या है? दो दिन पहले फिल्म का पोस्टर जारी हुआ है जिसमें अजय देवगन एक फुटबॉल को किक मारते हुए नज़र आ रहे हैं। पैंट और शर्ट पहने हुए अजय देवगन के हाथ में छतरी और बस्ता है। फिर भी सवाल बचा ही रह जाता है कि फिल्म की कहानी फुटबॉल के किस पहलू के इर्द-गिर्द घूमती है।

कहानी सबसे बड़े कोच की
साल 2018 में जब इस फिल्म का ज़िक्र पहली बार हुआ था तब इस फिल्म का नाम तय नहीं था। अब पोस्टर में नाम लिखा हुआ है ‘मैदान’। फिल्म की टैग लाइन है ‘बदलाव के लिए एक अकेला ही काफी होता है’, फिल्म 27 नवंबर 2020 को सुनहरे पर्दे पर होगी। 30 जनवरी को फिल्म के दो पोस्टर साझा किए गए थे और फिलहाल फिल्म की आधे से अधिक शूटिंग पूरी हो चुकी है। अजय देवगन ने फिल्म का पोस्टर अपने ट्वीटर पर साझा किया है। पोस्टर के साथ उन्होंने लिखा है,
‘यह कहानी है इंडियन फुटबॉल के गोल्डेन फेज़ की और उसके सबसे बड़े और सबसे अच्छे कोच की।’
50 से लेकर 60 के दशक को भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम दौर कहा जाता था। लेकिन ऐसा क्यों, उस दौरान ऐसा क्या हुआ जो आज तक नहीं हो पाया और उस पर फिल्म बन रही है? पचास के दशक की शुरुआत में एक नाम सामने आया, सैय्यद अब्दुल रहीम। बेहद आम तौर-तरीक़ों के साथ साधारण सी ज़िन्दगी जीने वाले सैय्यद पेशे से शिक्षक थे लेकिन फुटबॉल के लिए मन में अटूट जज़्बात रखते थे।

5 रोवर्स कप और 3 डूरण्ड कप
फुटबॉल की अच्छी भली समझ और परख रखने वाले सैय्यद साहब पढ़ाने से बचने वाला समय हैदराबाद फुटबॉल टीम को देते थे। अक्सर फुटबॉल के चलते उनका पढ़ाना टल भी जाता था लेकिन इस खेल के लिए जुनून इस कदर कि ज़रूरत के वक्त कभी मैदान नहीं छोड़ा। सैय्यद साहब के प्रशिक्षण के दौरान हैदराबाद फुटबॉल टीम ने कुल 5 रोवर्स कप जीते। 5 ही दफ़े डूरण्ड कप के फाइनल में पहुंची और 3 बार ख़िताब अपने नाम किया।
इस दौरान वह हैदराबाद सिटी पुलिस के भी कोच थे। एक बेहद आम से नज़र आने वाले फुटबॉल टीम के कोच की चर्चा खेल के मैदान से बाहर शुरू हुई। ऐसी चर्चाओं का असर और आयाम बेशक दूरगामी होता है नतीजतन ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन ने सैय्यद साहब को तलब किया। क्योंकि इसके पहले तक भारतीय फुटबॉल टीम की हालत बेहद बुरी थी, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया ने देखी थी।

मैदान में नंगे पाँव उतरी टीम
फ़िनलैंड के हेलसिंक में ओलंपिक हो रहे थे और भारतीय फुटबॉल टीम भी मैदान में उतरी थी। लेकिन बाकी देशों की फुटबॉल टीम और भारतीय फुटबॉल टीम में फर्क महज़ इतना सा था कि सारी टीम तैयारी के साथ उतर रही थीं जबकि भारतीय टीम के पास तैयारी के नाम पर जूते तक नहीं थे। पूरी दुनिया में भारत की बड़ी फजीहत हुई जब भारतीय फुटबॉल टीम बिना जूतों के नंगे पाँव फुटबॉल के मैदान में उतरी।
ठीक इस घटना के बाद सैय्यद साहब सक्रिय भूमिका में नज़र आए। उन्होंने तय किया कि इसके बाद भारतीय टीम बिना जूतों के मैदान में नहीं उतरेगी। अपने उसूलों के पक्के सैय्यद साहब ने इस बात को लेकर कभी कोई समझौता नहीं किया। अंततः साल 1950 में वह भारतीय फुटबॉल टीम के प्रबंधक और कोच नियुक्त हुए। ठीक एक साल बाद साल 1951 को उनके माथे दूसरी बड़ी ज़िम्मेदारी एशियाई खेलों की सूरत में आई। अंत सभी के लिए हैरान कर देने वाला था, भारतीय टीम ने एशियाई खेलों में सोना जीता।

किए मनमुताबिक बदलाव
इतने के बावजूद ऐसा बहुत कुछ था जो सैय्यद साहब करना चाहते थे। भले भारतीय फुटबॉल टीम ने बड़ा ख़िताब जीता था लेकिन टीम उनके मनमुताबिक नहीं थी। उन्हें मालूम था कि लंबी दूरी सटीक खिलाड़ियों के साथ ही पूरी की जा सकती थी। वह मिजाज़ में बेहद तयशुदा थे और उसूलों के बिलकुल पक्के। उन्होंने फेडरेशन के सामने मांग रखी और कहा भारतीय टीम में कुछ बुनियादी बदलाव की ज़रूरत है। भारतीय टीम में हैदराबाद के खिलाड़ियों को भी जगह दी जाए।
मांग बड़ी थी इसलिए पहली बार में इसे नज़रअंदाज़ किया गया। संतोष ट्रॉफी के दौरान हैदराबाद की टीम का मुक़ाबला बॉम्बे की टीम से हुआ, मुक़ाबला अहम इसलिए था क्योंकि बॉम्बे की टीम उस समय की अच्छी फुटबॉल टीम मानी जाती थी। लेकिन सभी को चौंकाते हुए हैदराबाद की टीम ने मुक़ाबला अपने नाम किया फिर सैय्यद साहब की मांग पर विचार शुरू हुआ। हैदराबाद का मुक़ाबला बंगाल की टीम से हुआ उसमें भी हैदराबाद की टीम ने जीत दर्ज की।

फिर आया मेलबर्न ओलंपिक
अब तक फेडरेशन और भारतीय फुटबॉल से जुड़ी एक बड़ी आबादी समझ चुकी थी कि सैय्यद साहब के हिस्से आने वाली ज़िम्मेदारियों को मुकाम ज़रूर मिलता है। इन सब के कुछ साल बाद 1956 में मेलबर्न ओलंपिक हुए और सैय्यद रहीम की अगुवाई में भारतीय फुटबॉल टीम ने शुरुआत में ही सभी को आश्चर्य में डाल दिया। दुनिया को कुछ समझने का मौका मिलता,
उसके पहले ही भारतीय टीम ने नॉकआउट मुक़ाबले में ऑस्ट्रेलिया पर जीत दर्ज की। लेकिन सेमी-फाइनल मुक़ाबले में भारतीय फुटबॉल टीम युगोस्लाविया से हार गई पर यह लंबा सफर था। इतना लंबा तो था ही कि इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाए। इसके कुछ ही समय बाद ख़बर आई कि सैय्यद साहब को लंग कैंसर है जिसका सीधा असर भारतीय फुटबॉल टीम के प्रदर्शन पर पड़ा।

फिर ज़िन्दा होगी इतिहास के पन्नों में दबी कहानी
साल 1962 में एक बार फिर एशियाई खेल वापस लौट कर आए। कैंसर से जूझने के बावजूद सैय्यद साहब ने अपनी टीम के एक-एक खिलाड़ी को वापस इकट्ठा किया। भारतीय फुटबॉल टीम का फाइनल तक का सफर संतोषजनक था। फाइनल मुक़ाबला दक्षिण कोरिया से था लेकिन टीम के 3 खिलाड़ियों समेत खुद सैय्यद साहब की हालत खराब थी।
ऐसे हालातों के बावजूद सैय्यद साहब ने मुक़ाबले से ठीक पहले अपनी टीम के सामने गुज़ारिश रखी। उन्होंने कहा मुझे सभी खिलाड़ियों से ‘सोना’ चाहिए और टीम ने उन्हें निराश भी नहीं किया। भारतीय फुटबॉल टीम ने 2-1 से मुक़ाबला अपने नाम किया।
लेकिन अफसोस कि जीत के कुछ महीनों बाद सैय्यद साहब को लंग कैंसर के चलते भारतीय फुटबॉल टीम का साथ छोड़ना पड़ा। आखिरकार 11 जून साल 1963 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन अब उन पर फिल्म बन रही है। दर्शकों को इस फिल्म से बहुत उम्मीदें हैं आखिरकार इतिहास के पन्नों में दबी एक कहानी फिर से ज़िन्दा हो रही है।

admin