अनुबंध खेती में एमएसपी की आशंका

– प्रमोद भार्गव

राजग सरकार ने कृषि सुधार के बहाने तीन विधेयक संसद से बिना किसी बहस के पारित करा लिए हैं। बहस नहीं होने के कारण विधेयकों की इबारत के गुण-दोष स्पष्ट रूप में सामने नहीं आ पाए हैं। इन विधेयकों को लेकर हरियाणा और पंजाब में किसान संगठन जबरदस्त एवं उग्र विरोध पर उतर आए हैं। अन्य राज्यों में भी विरोध दिखाई दे रहा है। विधेयकों के जरिए सरकार ने किसानों को देश में कहीं भी फसल बेचने के लिए स्वतंत्रता दे दी है। अबतक किसान अपनी फसल को राज्य द्वारा अधिसूचित कृषि उपज मंडी में बेचने के लिए बाध्य थे। किसानों को अनुबंध खेती की कानूनी सुविधा भी मिल गई है। किसान अब कृषि-व्यापार से जुड़ी कंपनियों व थोक-व्यापारियों के साथ अपनी उपज की बिक्री का करार खेत में फसल बोने से पहले ही कर सकते हैं। मसलन किसान अपने खेत को एक निश्चित अवधि के लिए किराए पर देने को स्वतंत्र हैं। लेकिन इन कानूनों के अमल में आने के बाद किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलेगा अथवा नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं दी गई है। गोया, किसानों का आक्रोश स्वाभाविक है।

ये विधेयक ‘कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य’ (संवर्धन एवं सुविधा), ‘मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता’ और ‘कृषि सेवा विधेयक-2020’ नाम से हैं। ये कानून किसान को इलेक्ट्रोनिक व्यापार की अनुमति भी देते हैं। साथ ही निजी क्षेत्र के लोग, किसान उत्पादक संगठन या कृषि सहकारी समिति ऐसे उपाय कर सकते हैं, जिससे इन प्लेटफार्मों पर हुए सौदे में किसानों को उसी दिन या तीन दिन के भीतर धनराशि का भुगतान प्राप्त हो जाए। विधेयकों की भाषा को परिभाषित नहीं किए जाने के कारण किसानों के मन-मस्तिष्क में डर बैठ गया है। किसानों को डर है कि इन कानूनों के लागू होने के बाद फसल की एमएसपी पर खरीद नहीं होगी। मंडी के बाहर जो खरीद होगी, वह एमएसपी से नीचे की दर पर होगी। क्योंकि अभी भी केवल मंडियों और भारतीय खाद्य निगम द्वारा खरीदी दी जाने वाली उपज पर ही एमएसपी दर मिलती है। इसका लाभ केवल छह फीसदी किसानों को मिलता है। बाकी उपज निचली दरों पर ही किसान को बेचने पड़ती हैं। जो एमएसपी दर से 500 से लेकर 1000 रुपए तक कम होती हैं। सीधी सी बात है कि सरकारें जो उपज खरीदती हैं, उसी पर एमएसपी के भाव मिलते है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एमएसपी दर पर उपज खरीद का भरोसा दिया है, लेकिन विधेयक में इसका उल्लेख नहीं होने के कारण प्रधानमंत्री के मौखिक आश्वासन पर किसानों को भरोसा नहीं हो रहा है।

अनुबंध या करार खेती की सुविधा को किसान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कानून बताया जा रहा है। इस कानून के तहत किसान को सुविधा दी गई है कि वह निजी कंपनियों के साथ अनुबंध कर अपने खेत को फसल बोने से पहले किराए पर दे सकता है। इसे किसान की आमदनी दोगुनी करने और आर्थिक सुरक्षा का बड़ा पहलू बताया जा रहा है। इसमें भी एमएसपी का कोई उल्लेख नहीं है। इसमें यह भी साफ नहीं है कि किसान को कंपनी करार के साथ धनराशि देगी अथवा उपज बाजार में बेच दिए जाने के बाद ? चूंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना काम प्रबंधकों के जरिए कराती हैं। उनके द्वारा किए अनुबंध अंग्रेजी में होते हैं। इसलिए करार खेती के प्रारूप में यह स्पष्ट हो कि करार हिंदी अथवा राज्य की मातृभाषा में हो और किसान को संपूर्ण धनराशि अनुबंध के साथ ही मिले। क्योंकि सूखे या अतिवृष्टि के चलते फसल को नुकसान होता है तो इसकी भरपाई कौन करेगा ? फसल का बीमा लगभग पूरे देश में होने लगा है, लेकिन अक्सर देखने में आता है कि किसान को बीमा धनराशि के रूप में 50 से लेकर 100 रुपए तक का भुगतान बमुश्किल हो पाता है, ऐसे में किसान के पास ठगी का शिकार हो जाने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता है। कंपनियां अपनी लूट को प्रबंधक की नसमझी बताकर सच्चाई से मुंह फेर लेती हैं। इसलिए यह साफ होना चाहिए कि प्रकृति के प्रकोप के चलते यदि फसल बर्बाद होती है तो एमएसपी एवं सरकारों द्वारा दी जाने वाली मुआवजे की राहत राशि किसे मिलेगी?

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर सफाई दे रहे है कि राज्यों के कानून के जरिए चलाई जा रही कृषि उपज मंडियां बंद नहीं होंगी। परंतु कंपनियों को करार-खेती और उपज खरीद की सुविधा नए कानूनों के अनुसार बरकारार रहती है तो धीरे-धीरे कंपनियां मंडियों पर हावी हो जाएंगी और पूरी मंडी प्रणाली उनकी मुट्ठी में होगी। इससे किसान कंपनियों के पंजे में जकड़ जाएंगे और उनका आर्थिक शोषण भी बढ़ जाएगा। फिलहाल राज्य सरकारों के नियंत्रण में होने के बावजूद किसान न केवल बिचौलियों और आढ़तियों का शिकार होने को मजबूर है, बल्कि मंडी प्रशासन भी किसान का आर्थिक शोषण करते हैं।

लिहाजा, किसानों को डर है कि कुछ साल बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियां मंडियों पर पूरी तरह काबिज हो जाएंगी और फिर मनमानी पर उतर आएंगी। इसे हम रिलायंस के जिओ मोबाइल के विस्तार से समझ सकते हैं। शुरुआत में जिओ ने सस्ती दरों पर इंटरनेट की सुविधा देकर होड़ में शामिल सभी प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़ दिया और फिर कीमतें बढ़ा दी। कंपनियों का यह खेल किसान के साथ भी देखने में आ सकता है। इस तरह अनुबंध खेती कुछ ही साल में किसान को बर्बाद कर देगी। इससे अच्छा सरकार ने किसान को मंडी के बाहर उपज बेचने पर मंडी-कर की छूट दी है, उसे मंडी के भीतर फसल बेचने पर दे तो किसान ज्यादा फायदे में रहेंगे।

जहां तक मंडी के बाहर उपज बेचने का सवाल है तो किसान आज भी देश में कहीं भी उपज बेचने को और व्यापारी खरीदने को स्वतंत्र हैं। मध्य-प्रदेश के मालवा क्षेत्र में इस समय पंजाब-हरियाणा के कई किसान अनाज खरीदने आए हुए हैं और वे किसान को खेत या गांव में ही प्रति क्विंटल 300 से 500 रुपए ज्यादा कीमत नगद रूप में दे रहे हैं। तब इन कानूनों के लागू होने से किसान को फायदा कहां हुआ? इसके उलट यदि वह लिखा-पढ़ी के जरिए अनुबंध खेती के फेर में पड़ गया तो फसल तो फसल खेत भी बचाने के लाले पड़ सकते हैं?

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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