रोग प्रतिरोधक क्षमता : आयुर्वेद एवं योग

– डॉ. मोक्षराज

त्र्यायुषं जमदग्ने: कश्यपस्य त्र्यायुषम्।
यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽअस्तु त्र्यायुषम्।।
-यजुर्वेद ३.६२

महर्षि दयानंद सरस्वती ने इस मंत्र का भाष्य करते हुए कहा था कि “परमेश्वर की कृपा से विद्वान् लोग विद्या, धर्म और परोपकार के अनुष्ठान से आनंदपूर्वक तीन सौ-चार सौ वर्ष पर्यन्त आयु को भोगते हैं।” इस बात का प्रमाण वो अपने जीवन से भी दे सकते थे किन्तु, विदेशी एवं देशी षड्यंत्रकारियों ने उन्हें सत्रह से भी अधिक बार विष देकर 59 वर्ष की आयु में ही हम सब के मध्य से विदा कर दिया। भारतीय परंपरागत इतिहास में ऐसे अनेक मनीषी हुए जिनकी आयु 300-400 वर्ष की रही है तथा आज भी हिमालय में समाधिस्थ कुछ योगियों की आयु 300 से 400 वर्ष के मध्य है। आयुर्वेद के विद्वान् आचार्य वात्स्यायन सत्तर वर्ष तक युवावस्था स्वीकार करते हैं, उदाहरणार्थ 175 वर्ष के भीष्म पितामह महाभारत के युद्ध में सर्वाधिक आक्रामक रूप में पराक्रम का प्रदर्शन करते हैं। कुछ वर्ष पहले वृंदावन में दो सौ वर्ष से अधिक आयु के योगी देवरा बाबा का प्रयाण हुआ।

इस लंबी आयु के पीछे उक्त सभी की रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं रसायन विद्या व योगविद्या सर्वाधिक महत्व रखती है। मनुष्य की आयु के लिए आयुर्वेद एवं योग विद्या दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण साधन हैं। यद्यपि केवल योग विद्या के आश्रय से भी 300-400 वर्ष की आयु पाई जा सकती है, किंतु वह नितान्त योग-अभ्यास के लिए जीवन समर्पित करने वालों के लिए ही संभव है । इसी प्रकार गृहस्थ में रहकर सौ से अधिक वर्ष तक स्वस्थ जीवन जीने वालों की संख्या आज भी लाखों में है। अतः मानवोचित रोग प्रतिरोधक क्षमता पाने के लिए हमें अपने आहार, व्यवहार, ऋतुचर्या तथा मानसिक एवं यौगिक क्रियाकलापों पर विचार करना होगा।

आयुर्वेदिक उपाय

यद्यपि आयुर्वेद का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है, जिसमें न केवल खानपान, औषधियों से संबंधित दिशानिर्देश हैं बल्कि जीवन से संबंधित समस्त दार्शनिक विचारों को भी इन ग्रंथों में संगृहीत किया गया है। अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, सूर्य, वनस्पति-औषधियाँ आदि कुछ ऐसे प्राकृतिक तत्व हैं जो हमारे सब ओर वैद्य व भेषज के रूप में निरंतर आरोग्यता प्रदान कर रहे हैं, किन्तु जब हम इनसे मुँह मोड़कर अपनी जीवनचर्या को अप्राकृतिक रूप प्रदान करने लगते हैं तब हमारी जीवनीशक्ति पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा ही। वस्तुत: अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय प्रकृति की गोद ही है। आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य के तीन स्तम्भ बताये गये हैं- आहार, निद्रा एवं ब्रह्मचर्य।

पहला स्तम्भ ‘आहार’- हमें ऋतु-अनुकूल, हितकारी, एवं संतुलित शाकाहार लेना चाहिए । भोजन में हल्दी, धनिया, जीरा, दालचीनी, लहसुन, दही आदि का होना तथा नैमित्तिक रूप से ऑंवला एवं गिलोय का सेवन करना हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए अत्यंत उपयोगी है। इनका निरंतर सेवन करने से भारतीयों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत अच्छी बनी हुई है। प्रत्येक व्यक्ति की आयु, कार्यप्रकृति तथा रुचि के अनुसार विभिन्न प्रकार के आहार लाभकारी होते हैं, आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका उल्लेख विस्तार से किया गया है।

आहार के विषय में इस संदर्भ में एक कहावत है “बंदर कभी बीमार नहीं पड़ता, यदि बीमार होगा तो मर जाएगा।” इसका अभिप्राय यह भी है कि उसका बीमार होना मृत्यु का लक्षण है । बंदर का आरएच फैक्टर मानक के रूप में स्वीकार किया गया है । चिकित्सक द्वारा हमें अपने स्वास्थ्य की जाँच के लिए उसके आधार पर ही परखा जाता है। बंदर प्रातः भरपेट भोजन करता है, सूर्यास्त के बाद कुछ नहीं खाता तथा उछलकूद अर्थात् शारीरिक रूप से परिश्रम भी करता है। अतः हमारे आसपास के वातावरण में विद्यमान यह प्राणी हमें अच्छे स्वास्थ्य की सीख देता है।

दूसरा स्तम्भ ‘निद्रा’- हमें संतुलित निद्रा लेनी चाहिए। गहरी नींद रोगों से लड़ने की विशेष शक्ति प्रदान करती है। अच्छी नींद के लिए परिश्रम, शुभविचार और सत्कर्म आवश्यक हैं। हमें सूर्योदय से पहले उठ जाना चाहिए, ऐसा करने से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहती है।

तीसरा स्तंभ है ‘ब्रह्मचर्य’- मनुष्य अपने आत्मा को ब्रह्म में संयुक्त कर संसार को निस्सार तथा एक साधन मात्र समझता हुआ जीवन व्यतीत करे। ऐसा करने पर वह संसार के क्षणिक सुखों से ऊपर उठा रहेगा। यद्यपि यह योगियों की सहज अवस्था का स्वरूप है किन्तु, गृहस्थ अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी व ऋतुकाल की प्रथम चार रात्रि, ग्यारहवीं एवं तेरहवीं रात्रि का त्याग करते हुए अपनी जीवनी शक्ति का संरक्षण कर सकते हैं। युगल का दिन में शयन करना हानिकारक है। दिन में संयोग से न केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है बल्कि नेत्र ज्योति को भी क्षति पहुँचती है। महर्षि दयानंद ने परस्त्रीगमन को भी बुद्धि व स्वास्थ्य का सबसे बड़ा शत्रु बताया है। अनेक बार परस्त्री संसर्ग से उत्पन्न संक्रमण रोग-प्रतिरोधक क्षमता को केवल 8-10 वर्ष में ही समाप्त कर देता है। जिसके कारण प्राणों का शीघ्र नाश हो जाता है।

असपिंड विवाह- रोग प्रतिरोधक क्षमता को आनुवांशिकी रूप से अच्छा बनाए रखने हेतु असपिंड अर्थात् छः गोत्रों को बचाकर विवाह किया जाना चाहिए। सपिंड विवाह द्वारा मानसिक एवं शारीरिक पतन होता है, जिससे कालांतर में रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यंत दुर्बल हो जाती है।

द्वंद्वसहन- जिन देशों में ऋतु अर्थात् मौसम परिवर्तन का सहज क्रम है वहाँ थोड़ा-थोड़ा शीत और गरमी को सहन करना रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए उपयोगी है। यह भौतिक तप की श्रेणी में आता है। इसी प्रकार मानसिक तप भी आवश्यक है अर्थात् क्रोध, लोभ एवं ईर्ष्या से दूर रहकर संतोषपूर्वक जीने का स्वभाव रोग-प्रतिरोधक क्षमता को संतुलित रखता है। इसके साथ ही रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि के लिए सकारात्मक सोच तथा इच्छाशक्ति का भी विशेष महत्व है।

योगासन-प्राणायाम- जहॉं योगासनों में भुजंगासन, वक्रासन, त्रिकोणासन, मत्स्यासन, सुप्तवज्रासन, ताड़ासन, वृक्षासन, चक्रासन तथा सर्वांगासन आदि विशेष लाभप्रद हैं। वहीं प्राणायाम के अंतर्गत बाह्य कुंभक, अनुलोम-विलोम, भ्रामरी तथा उद्गीथ सर्वाधिक उपयोगी हैं। वेद में शुद्ध प्राण वायु को भेषज कहा है। ‘आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रप:।‘ इसी प्रकार जल के द्वारा भी हम अपनी जीवनीशक्ति को धारण हैं ‘आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता नऽऊर्ज्जे दधातन।’ अत: हमें उचित आहार, निद्रा, संयम, पर्याप्त जलसेवन, प्राणायाम, सद्व्यवहार, धर्माचरण तथा परोपकार द्वारा अपने जीवन को चिरंजीवी बनाना चाहिए।

(लेखक, वॉशिंगटन डीसी में भारतीय संस्कृति शिक्षक हैं।)

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