प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नेहरू पहले जैसे ही रहे

आनंद मोहन माथुर

मुगल बादशाह शांहजाह द्वारा बनवाए गए लाल किले से हिन्दुस्तान की आजादी के दूसरे साल 15 अगस्त 1949 को फिर नेहरू ने झण्डा फहराया और भाषण दिया नेहरू की पोशाक में कहीं कोई फर्क नहीं आया, न उनके तौर तरीकों में, न उनके हाव भाव में। नेहरू ने कहा कि ख़्वाब था जो हमने देखा और कभी-कभी किसी कदर पागलों की तरह हम उस ख़्वाब के पीछे दौड़े हमने उसको पकड़ने की कोशिश की और ए ख़्वाब था जनता की आजादी, उनका दुख और गरीबी से छुटकारा पाना इस देश के लिए बड़ा भारी सवाल था।
हमने अपने ऊपर भरोसा किया अपने दिल की ताकत, अपनी हिम्मत और अपने एक बड़े नेता पर भरोसा करके आखिर में हम आगे बढ़े।
नेहरू ने आगे कहा लेकिन वह जो पुरानी ताकत थी वह हमें आगे ले जाती थी, कभी-कभी यह ताकत मुट्ठी भर आदमियों को आगे ले जाती थी और ये मुट्ठी भर आदमी सारे मुल्क पर असर रखते थे और मुल्क की किस्मत को बदलते थे।

नेहरू ने आगे पूछा कि आजाद हिन्दुस्तान में क्या ताकत कम है जो पहले हममें थी और जिसने मुल्क में इंकलाब किए और इतनी उलट पुलट की? मैं समझता हूं वह ताकत पहले से ज्यादा है। कुछ हमारे खाली दिमाग, तबीयत और आंखे इधर उधर भटक जाती है और हम बड़ी बातों को भूल कर छोटी-छोटी बातों में पड़ जाते हैं।

एक महान प्रधानमंत्री के यही गुण हैं, छोटी-छोटी बातों को दरकिनार करना और बड़ी बातें जो गरीबों पर असर डालती है उन पर ध्यान देना। आज का माहौल वैसा ही है जो कि नेहरू को विरासत में मिला था लेकिन नेहरू ने हिन्दू-मुस्लिम भाषाई और जाति समस्याओं को बखूबी समझ कर उसका हल मोहब्बत, सदभाव, दोस्ती और शांति से निकाला और देश के विकास के लिए जो गरीबों के लिए आवश्यक था, उस पर अपना सारा ध्यान दिया। काश! हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री अपनी पार्टी में अनुशासन रखते। मंत्री, मुख्यमंत्रियों, केन्द्रीय मंत्रियों और सांसदों एवं विधायकों को डांट कर अनुशासन में रखते और अभद्र एवं गाली गलौज़ की भाषा का त्याग कर मैत्री और सद्भाव पैदा करते और इनको कहते कि देश के विकास में अपने सुझाव दो बजाए फालतू की बात करने के। शासक दल का एक भी सदस्य ऐसा नहीं है कि जिसने देश के विकास के लिए कोई रचनात्मक सुझाव दिया हो। प्रधानमंत्री देश जोड़ने वाला होना चाहिए न कि देश तोड़ने वाला।

मुझे याद है कि 1972-73 में स्व. प्रकाशचन्द सेठी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। सेठी उज्जैन के निवासी थे, नगर निगम के चुनाव हुए और सेठी वाला ग्रुप हार गया और विरोधी ग्रुप जीत गया। सेठी ने उज्जैन नगर निगम भंग कर दी, उसकी रिट मुझे लगाना थी। मेरे मित्र राजेन्द्र जैन ने सुझाव दिया कि अशोक सेन जो कि देश के पहले काँग्रेसी कानून मंत्री थे उनसे नगर निगम भंग हो सकती है या नहीं, इस गृह युद्ध पर कानूनी सलाह ली जाए।

मैं व राजेन्द्र जैन कानूनी सलाह लेने के लिए दिल्ली उनके पास गए और उन्हें अपना कानूनी नज़रिया बताया। उन्होंने उसे उचित ठहराया, लेकिन मेरी ओर रूख करते हुए उन्होंने कहा कि सेठी ये क्यों कर रहे हैं, क्या ये काफी नहीं है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेसी सरकार है, जिसके सेठी मुख्यमंत्री हैं और क्या ये ज़रूरी है कि हर नगर निगम, हर पंचायत में मुख्यमंत्री की पसंद के लोग ही रहें। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. विधान चन्द्र रॉय कांग्रेसी थे और कलकत्ते के मेयर कम्युनिस्ट पार्टी के थे, लेकिन कभी भी डॉ. रॉय ने कलकत्ता के मेयर को हराने के बारे में कोई चर्चा नहीं की, सेठी प्रदेश के मुख्यमंत्री ऐसे उच्च पद पर बैठे हुए हैं उन्हें सारी प्रजातांत्रिक संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से कार्य करने देना चाहिए। उन्होंने सेठी के इस कार्य की आलोचना की।

इस बात का निचोड़ यह है कि प्रधानमंत्री का पद देश का सबसे ऊंचा पद है और उन्हें अगर अपना बड़प्पन रखना है तो बाकी के प्रजातांत्रिक समस्याओं को शालीनता पूर्वक चलने देना चाहिए। धर्म और राजनीति को नहीं जोड़ना चाहिए। धर्म आदमी की व्यक्तिगत आस्था का सवाल है और राजनीति व्यवहारिक जीवन के उसूलों का सवाल है।
गांधी की मृत्यु के पहले, आधुनिक भारत की भावी योजनाओं के लिए 2 फरवरी 1948 को सेवाग्राम में कॉन्फ्रेंस की तारीख तय कर ली गई थी, जिसमें गांधी भी शिरकत करने वाले थे। अखबारों में भी यह आ गया था कि इसमें गांधी, नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, मौलाना आजाद, ड़ॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी, जय प्रकाश नारायण और विनोबा भावे भाग लेने वाले हैं, किन्तु 3 दिन पहले 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या कर दी। इस कारण फरवरी में यह कार्यक्रम नहीं हुआ बल्कि 11 से 15 मार्च 1948 के बीच सेवाग्राम में यही सम्मेलन तय किया गया। चूंकि केन्द्र में कांग्रेस सरकार थी अतएव सम्मेलन का सारा इंतजाम प्रशासनिक एवं पुलिस अफसरों द्वारा किया गया था इस पर जे.बी. कृपलानी भड़क उठे थे, उन्होंने गुस्से में कहा कि क्या इस देश में कांग्रेस संगठन समाप्त हो गया है जो इस कार्यक्रम का आयोजन सरकार द्वारा किया जा रहा है।

गांधी की हत्या, शरणार्थियों की विकराल समस्या, सांप्रदायिक उन्माद और कश्मीर को भारत के साथ रहने की ज़द्दोजहद ऐसे अनेकों सवालों से नेहरू उलझ रहे थे।
नेहरू को एक प्रश्न बार-बार परेशान कर रहा था। प्रश्न यह था? क्या हिन्दुस्तान का विकास ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित होगा अथवा औद्योगिक अर्थव्यवस्था पर।
जवाहरलाल नेहरू के सामने यहीं मुख्य प्रश्न था। नेहरू ने रूस और चीन की यात्रा की थी, इंग्लैंड में वे पढ़े हुए थे और यूरोप का पूरा भ्रमण उन्होंने किया हुआ था। अमेरिकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह पूंजीवादी थी। नेहरू ने उस महत्वपूर्ण समय में निर्णय किया कि हिन्दुस्तान के विकास का आधार औद्योगिक अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों पर हो। इस संबंध में 7 मार्च 1953 का नेहरू का भाषण सुनने योग्य है:

‘‘आपको पता है कि काफी मेहनत के बाद हमने पंच वर्षीय योजना तैयार की है जब भी ज़रूरत पड़ेगी हम उसमें बदलाव करेंगे। एक बात तो साफ है कि इस प्लान के पीछे महज़ दिमागी कवायद नहीं है ये सीधे तौर पर तथ्यों से जुड़ी हुई है। हमे जो भी बड़े काम करने है, उन्हें हम अपने संसाधन और क्षमताओं के अनुसार नियंत्रित करेंगे। आने वाले 5 या 10 साल हमारे देश और दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। सारा दारोमदार इस बात पर है कि हम इस अवधि का इस्तेमाल हमारी राजनीतिक और आर्थिक सूझबूझ की दृष्टि से किस प्रकार करते हैं। हमें सारी ताकत अपनी मज़बूत नींव तैयार करने में लगानी है।

हमे यह ख्याल रखना है कि पहले नंबर की चीज़ पहले और दूसरे नंबर की चीज़ दूसरे नंबर पर करनी होगी। हमारे सामने हजारों चुनौतियाँ है लेकिन करोड़ो लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए इसके केन्द्र में ‘उत्पादन’ ही रहेगा। हम कल्याणकारी राज्य की बात करते हैं, इसका मतलब होता है, लोगो की राज्य में भागीदारी। राज्य में वही आदमी भागीदार हो सकता है जो राज्य के फ़ायदों और जिम्मेदारियों में अपने हिस्सेदारी निभाए। अगर उसे फायदा नहीं मिलता तो वो हिस्सेदार नहीं है, यही वो उसका विरोध करता है और ठीक करता है।

इस एप्रोच का सबसे बड़ा सवाल बेरोज़गारी का है। यह बड़ा कठिन सवाल है, लेकिन हमारी प्लानिंग वगैरह बेरोज़गारी मिटाने के लिए है। हमें हर समय इस बात के लिए संघर्ष करना होगा कि हम तरक्की की रफ्तार को कैसे तेज़ करें। निश्चित तौर पर हमें अपने देश में ज्यादा से ज्यादा दौलत पैदा करना होगी, क्योंकि हमें दूसरे मुल्क से दौलत मिलने वाली नहीं है और दूसरी बात यह है कि हम ऐसा चाहते भी नहीं है। मुझे बाहरी सहायता से कोई परहेज़ नहीं है, लेकिन हमें अपने पांव पर खड़ा होना होगा और स्वयं पर आश्रित होना होगा। हमें अपने दिमाग पर विश्वास करना होगा और अपनी मेहनत पर भरोसा करना होगा। अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो हम कमजोर और लाचार हो जायेंगे।
अगर हमें दौलत पैदा करनी है तो हर तरह के संसाधन जुटाने होंगे जिसमें मानव शक्ति संसाधन भी शामिल है। मानव शक्ति का उपयोग इस प्रकार किया जाए कि उसे काम दिया जाए, तो हमारा उत्पादन बढ़ेगा। बेरोज़गारी खत्म होगी तो उत्पादन अपने आप बढ़ेगा।

मेरा कन्ट्रोल्ड इकॉनामी का जो विचार है, उसे स्पष्ट करना चाहता हूं इससे मेरा आशय यह है कि अर्थव्यवस्था ऐसी बनाई जाए कि उसके मुख्य मुद्दों पर सरकार का नियंत्रण हो।
अब सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र की बात ही लीजिए क्या मिश्रित अर्थव्यवस्था को हम भार को बेहतर बनाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। यह साफ कर देना चाहता हैं कि ये ना वामपंथी हैं और न दक्षिण पंथी।

हम अपनी अर्थव्यवस्था को कितना ही समाजवादी बनाएं, हम उसमें लोकतंत्र तरीके चाहते हैं। इस मिश्रित अर्थव्यवस्था का अनुपात तथ्य व समय के आधार पर तय किया जाएगा।
इस व्यवस्था में एक पब्लिक सेक्टर (सार्वजनिक क्षेत्र) होगा जो 100 फीसदी सामाजिक उद्देश्य के लिए काम करेगा और उसे सरकार चलाएगी। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र होगा। मोटे तौर पर कहें कि उसका उद्देश्य भी सामाजिक होगा लेकिन उसका काम करने का उनका अपना तरीका होगा। हम इस क्षेत्र को चाबुक से नहीं चला सकते। इसलिए हम निजी क्षेत्र पर सख्त नियंत्रण के पक्ष में नहीं है, दोनों में तालमेल बिठाएंगे।

बहरहाल, हमारा असली मकसद बेरोज़गारी खत्म करना है, बेरोज़गार लोगों के लिए उनके पास करने के लिए कुछ काम होना चाहिए। बिना काम के बैठे रहना बेहद खतरनाक है।
नेहरू ने आगे कहा आपने देखा होगा कि बेरोज़गारों की संख्या में 3 लाख की कमी आई है। अब हमारे सामने सवाल है कि कमी का यह रास्ता सही है या हमें कुछ और करना है।
हमे लोगों को रोज़गार देना है लेकिन देने के तरीके सही होने चाहिए। बेरोज़गारी रातों रात खत्म नहीं हो सकती इसके लिए पंचवर्षीय योजना जैसी योजना बनना चाहिए।
मैं आपको बताना चाहता हूं कि हमने देश में बहुत बड़ी परियोजनाएं शुरू की हैं। बुनियादी क्षेत्र से मेरा मतलब है – इस्पात – उद्योग मरीन बनाने का उद्योग। इन पर खास जोर देना होगा। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए हमने पिछले दिनों मुम्बई के पास अंबरनाथ में मशीन टूल्स की डिफेंस प्रोडक्शन फैक्ट्री लगाई है।

बड़े उद्योग और कुटीर उद्योग में तालमेल होना चाहिए। अगर हम अपने मुख्य उद्योग रेलवे, हवाई जहाज, तोप खाने विकसित नहीं करेंगे तो हमें दूसरों पर निर्भर होना पड़ेगा। हम बाहरी उद्योग पर निर्भर नहीं रहना चाहते क्योंकि विदेशी जब चाहें उन्हें बंद कर सकते हैं तो फिर हम आजाद कैसे रह सकते हैं? स्वदेशी और कुटीर उद्योग भी महत्वपूर्ण है। हमें सादगी की तरफ मुड़ना चाहिए, हम कोई भी चीज़ बाहर से तब तक न लाएं जब तक उसे हासिल करना बहुत ज़रूरी न हो जाए। हमें शादी वगैरह जैसे खास मौकों पर ज्यादा खर्च नहीं करना चाहिए। अगर आपके पास पैसा है तो शादी की जगह आप कलाओं को बढ़ावा दीजिए। नेहरू ने साफ किया कि सरकार अपने उद्योग लगाएगी, निजी उद्योगों पर कब्जा नहीं करेगी और फिर दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। उनका विचार था कि मिलीजुली अर्थव्यवस्था मिल जुलकर तरक्की करने का सबसे बढ़िया तरीका है।
नेहरू सार्वजनिक क्षेत्र के लिए राज्य के प्रथम उद्योग का ऑटोनोमस कार्पोरेशन बनाना चाहते थे जिनमें सरकार की रोज़मर्रा की दख़लअंदाज़ी नहीं हो।

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