पहले मुज़फ़्फ़रपुर केस में बच्चियों की अस्थियां मिलती हैं, फिर उन्हीं 11 लड़कियों के जीवित होने का दावा किया जाता है

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। भारत की राजनीति में महिलाओं की उपस्थिति केवल उनके चुनावी मुद्दों में ही दिखाई देती है। चुनावी मुद्दों के रथ से उतरने के बाद ज़मीनी हकीक़त तो बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में स्थित बालिका गृह के रिपोर्ट बदलकर अपने नेताओं को बचाने की जुगत भर है।

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में स्थित एक बालिका गृह में बच्चियों के साथ यौन शोषण और प्रताड़ना के मामले में 14 जनवरी को दिल्ली के साकेत कोर्ट से फ़ैसला आने वाला है लेकिन उससे पहले ही सीबीआई की ओर से अदालत में दाखिल की गई चार्ज़शीट पर सवाल उठने लगे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने चार्जशीट पर उठे सवालों को लेकर जो हलफ़नामा अथवा स्टेटस रिपोर्ट जमा की है, उसमें कहा गया है कि मुजफ़्फ़रपुर आश्रय गृह में किसी लड़की की हत्या नहीं हुई। सभी 35 लड़कियां जीवित हैं।

हलफनामे में कहा गया है कि सीबीआई ने बिहार सरकार से अनुरोध किया है कि उन एनजीओ के पदाधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की जाए जिनका नाम सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में लिया है। मुख्य मामले में पूर्व विधायक बृजेश ठाकुर समेत अन्य आरोपी हैं। बृजेश ठाकुर द्वारा चलाए जा रहे आश्रय गृह बालिका गृह में 40 से अधिक नाबालिग लड़कियों का कथित तौर पर यौन उत्पीड़न किया गया था।

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक एनजीओ की ओर से संचालित आश्रय गृह में कई लड़कियों का यौन उत्पीड़न किया गया था और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) की रिपोर्ट के बाद यह मामला सामने आया था।

आख़िर क्यों उठाये जा रहे सीबीआई पर सवाल

इस मामले की जांच के लिए सीबीआइ को तीन महीने का समय दिया गया था। जबकि, जांच जल्द पूरी कर रिपोर्ट समर्पित करने का आदेश दिया गया था। जांच में सीबीआइ को चार बच्चियों की मौत का साक्ष्य मिलने की बात सामने आई थी। लेकिन, अधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं हो सकी थी।

सीबीआई के अनुसार मामले की जांच के दौरान मिले दोनों कंकालों में से कोई बच्चियों का नहीं है। फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट कहती है कि इनमें से एक कंकाल महिला का और एक पुरुष का है।

केंद्रीय जांच एजेंसी के इस हलफ़नामे पर मामले के याचिकाकर्ताओं ने कड़ा ऐतराज़ जताया है। उनका कहना है कि सवाल यह था ही नहीं कि सभी बच्चियां ज़िंदा है या नहीं। सवाल तो ये था कि मामले की ग़वाह और पीड़िताओं के बयानों के अनुसार बालिका गृह से कुछ बच्चियों की हत्या हुई है और कुछ ग़ायब हुई हैं। वो बच्चियां कहां हैं?

उन्हीं बयानों और गवाहों के आधार पर सीबीआई ने खुदाई करके कंकाल बरामद किया था। उस वक़्त सीबीआई की ओर से बयान जारी किया गया था कि बरामद कंकाल बच्चियों के ही हैं।

मुज़फ़्फ़रपुर बालिकागृह मामले में सीबीआई की चार्जशीट के ख़िलाफ़ याचिका दायर करने वाली निवेदिता झा बीबीसी को बताती हैं, “सीबीआई ने जो जांच रिपोर्ट पेश की है वो संदेहास्पद है। जिन बातों का हमें डर था वही हुआ, तीन महीने पहले सीबीआई के ख़िलाफ़ याचिका दायर की गई थी कि सीबीआई की जांच सही दिशा में नहीं चल रही है। मुख्य अपराधियों को बचाया जा रहा है। जो बयान बच्चियों ने दिया है, उसे ध्यान में रखते हुए जांच नहीं की जा रही है।”

निवेदिता झा आगे कहती हैं कि अभी भी दोषियों को बचाया जा रहा है। सीबीआई ने तब पटना में प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर ख़ुद कहा था कि अस्थियां बच्चियों की थीं। तब तो 11 बच्चियों की हत्या के सुराग उनको मिले थे। अगर हम यह मान भी लें कि फ़ॉरेंसिक जांच में अस्थियां वयस्कों की हैं तो भी सीबीआई यह क्यों नहीं बता रही है कि ये वयस्क कौन थे? अगर ग़वाहों की निशानदेही पर ख़ुदाई करके अस्थियां बरामद की गई हैं तो इसका मतलब भी यही हुआ ना कि किसी न किसी की हत्या करके उसे दफ़ना दिया गया था?

वहीं सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को देख रहीं वक़ील फ़ौजिया शकील बताती हैं, “बच्चियों ने अपने बयान में स्पष्ट कहा है कि कौन-कौन सी बच्चियां ग़ायब हुईं और किनको मारा गया। यहां तक कि उन्होंने ये भी कहा है कि मारने में कौन-कौन लोग शामिल थे और बोरियों में किसने भरा।“

कथित रूप से जिस गाड़ी से शवों को बोरियों में भरकर ले जाया गया था उसके ड्राइवर की निशानदेही पर ख़ुदाई करके शव बरामद किए गए थे। इसके बाद भी अब सीबीआई कह रही है कि किसी की हत्या नहीं हुई। ऐसे में या तो पहले सीबीआई ने झूठ बोला था या फिर सीबीआई के अनुसार बच्चियां झूठ बोल रही हैं।

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