आज़ादी तो दबे पाँव आई, लेकिन मुस्लिम लीग ने की ज़हर को खेती

आनंद मोहन माथुर

अंग्रेज़ों ने भारत को आज़ादी देने की जो रूपरेखा तय की थी, उसमें काफी हद तक लोकतान्त्रिक मूल्यों का ध्यान रखा गया था। शिमला में हुई वार्ताओं में तय किया गया था कि भारत का स्वतंत्र राज्य विधान, संघीय ढांचे के अनुरूप होगा जिसमें देशी रियासतें भी सम्मिलित होंगी। एक जैसे प्रांतीय विषयों के संबंध में प्रांत चाहें तो अपना गुट या समूह बना सकेंगे।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली चाहते थे कि भारत को सत्ता सौंपने का उनका काम शीघ्र और शांतिपूर्वक हो जाए। कांग्रेस और लीग आपस में मिल कर जो भी व्यावहारिक हल इस समस्या का निकालें, वे उसे मानने को तैयार थे। कैसा नैसर्गिक प्रजातांत्रिक सोच था, सद्भावना से भरा हुआ। कहीं कोई घमंड का निशान नहीं, कहीं कोई उपनिवेशवादी विचारों की झलक नहीं। ब्रिटिश परंपरा को कोई भी सम्मान देगा।

आज़ादी का दबे पांव से आना : जनवरी 1946 में हिन्दुस्तान और हिन्द महासागर में तूफान के पहले की शांति पसरी हुई थी, जनता हतप्रत थी कि अब क्या होगा? कांग्रेस गैरकानूनी थी सारे कांग्रेसी नेता जेलों में बंद थे, केवल गांधी बाहर थे। मुस्लिम लीग कांग्रेस के खिलाफ थी और पाकिस्तान का आंदोलन कर रही थी।

युद्ध समाप्त हो गया था और कुछ भारतीय तो मालामाल हो गए थे लेकिन माल की कमी और महॅंगाई कारण करोड़ों जनता की तबाही ने उनकी कमर तोड़ दी थी। बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था और सारा बंगाल श्मशान और कब्रस्तान बन गया था प्रकृति के प्रकोप को मुनाफाखोरों ने बढ़ा दिया था। बंगाल का गैरकांग्रेसी मंत्रिमंडल भ्रष्टाचार, निष्क्रियता और उपेक्षा से भरपूर था। सरकार से जवाब तलब करने वाला कोई नहीं था। कन्ट्रोल और राशन ने जमाखोरी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया दिया था। कमी और महॅंगाई के कारण लोगों का नैतिक स्तर गिर गया था।

सेना के जवानों की संख्या 1,89,000 से बढ़कर 22,50,000 हो गई थी। लड़ाई खत्म हो जाने से सैनिकों की छॅंटनी आवश्यक थी, पर छॅंटनी अपने आप में एक बहुत कठिन कार्य था। मोर्च से लौटा हुआ भारतीय सैनिक बदल चुका था। मलाया, बर्मा, मध्य पूर्व और इटली के मोर्चे पर लड़ा हुआ वह निडर सैनिक हो गया था। दूसरी ओर भारत की आज़ादी की और ब्रिटिश सरकार के बढ़ने का कारण तथा भारतीयों से समझौता करने का एटली सरकार का पक्का इरादा और इंग्लैंड का बदला हुआ राजनैतिक वातावरण था।

नवंबर-दिसम्बर 1945 में भारत की स्थिति के संबंध में मज़दूर मंत्रिमंडल के सदस्य और भारत को सत्ता सौंपने पर से संबंधित विचार पर एलेक्जेंडर ने 6 मार्च 1947 को कहा था। उस समय भारत सरकार बारूद के ढेर पर बैठे हुए थी, जो युद्ध के समाप्त हाने के बाद की परिस्थितियों के कारण किसी भी क्षण भभक सकता था।

फरवरी 1946 में आज़ाद हिंद फौज के एक मुसलमान अफसर को दी गई कोर्ट मार्शल के सज़ा के ख़िलाफ़ कोलकाता में मुसलमानों के जुलूस ने इतना उग्र रूप धारण किया कि दुकानें लूट ली गई, बसें तथा ट्रेन जला दी गई। वायु सेना में अनुशासनहीनता की कई घटनाएं सामने आई। मुंबई में नाविकों ने बगावत कर दी, पुलिस के सिपाहियों ने उनका असंतोष हड़ताल एवं जुलूस के द्वारा व्यक्त करने लगे। अंग्रेज़ अफसरो की संख्या निरंतर कम होती गई, नई भर्ती को रोक दिया गया और जो थोड़े बहुत यूरोपियन काम कर रहे थे उनकी सेवानिवृत्ति समीप आ गई थी।

ब्रिटेन के स्वभाव में जो लचीलापन आया, वह केवल इन घटनाओं की बाध्यता नहीं थी, असल में प्रधानमंत्री एटली का एक आदर्शवादी वैचारिक दृष्टिकोण का परिणाम था। ब्रिटिश नीति में परिवर्तन के चाहे जो कारण रहे हो, मार्च 1946 में जो केबिनेट मिशन भारत आया उसने इस देष की जनता को ब्रिटिश सरकार की सदभावना और तत्परता का विश्वास दिलाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। सत्ता के हस्तांतरण के मूल में मूलतः ब्रिटेन और भारत के पारस्परिक संबंधों को सुधारने की ब्रिटिश सरकार की अभिलाषा से प्रेरित था। यह ब्रिटिश चरित्र था, ये प्रजातांत्रिक मूल्य जो अंग्रेजों को घुट्टी में पिलाए जाते हैं।

अफसोस यह है कि भारतीय चरित्र में ये प्रजातांत्रिक मूल्य गायब हो सकता है। सदियों के सामंतवादी शासन ने भारतीय चरित्र में गुलामी की आदतें डाल दी हो। हीरो-वर्शिप यहाॅं की परंपरा बन गई। जादूगरों की जादूगीरी भारतीयों को पसंद आ गई। इस चरित्र ने वर्तमान समय में संवैधानिक मूल्यों की धज्जियां उड़ा कर रख दी। प्रजातांत्रिक विचार, विचारों की स्वतंत्रता, आलोचना से परहेज़ ने देश को गूंगा-बहरा बना दिया। सारा देश श्मशान और कब्रिस्तान बन गया। आशा की किरण का इंतज़ार हैै। नतीजन ब्रिटिश नीति के परिवर्तन का परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश मंत्रिमंडल ने एक केबिनेट मिशन सद्भावना और तत्परता बताने के लिए ही भारत भेजा, इसमें तीन मंत्री शामिल थे, इसमें लार्ड पेथिक, लारेंस तथा सर क्रिप्स भारतीय राजनैतिक परिवेश से अच्छी तरह परिचित थे।

जिन राजनैतिक दलों का निर्णायक महत्व था वे केवल कांग्रेस और लीग का था और मुख्य प्रश्न भी भारत के 1947 की गर्मियोें में मिशन ने शिमला में वार्ताएं आयोजित की। वार्ता बंटवारे से संबंधित भी थीं। शिमला सम्मेलन में भी कांग्रेस और लीग के आपसी मतभेदों को मिटाया नहीं जा सका।

कांग्रेस तथा लीग के शीर्ष नेताओं से वार्ताओं के बाद 16 मई को केबिनेट मिशन ने अपनी समझौता योजना पेश की इस योजना के मुख्य अंश निम्न थे :-

  1. भारत का स्वतंत्र राज्य विधान, संघीय ढांचे के अनुरूप होगा जिसमें देशी रियासतें भी सम्मिलित होंगी।
  2. संघीय सरकार विदेशी मामले, सुरक्षा, यातायात, आदि को संभालेगी, बाकी के अधिकार प्रांतों और देशी रियासतों के हाथ में होंगे।
  3. एक जैसे प्रांतीय विषयों के संबंध में प्रांत चाहें तो अपना गुट या समूह बना सकेंगे।
  4. प्रांतों और रियासतों के प्रतिनिधियों से निर्मित विधान परिषद प्रारंभिक कार्यवाही के बाद तीन समूहों में बंट जायेगी :-
    (क). पहले समूह में मद्रास, बम्बई, यू.पी., बिहार और उड़िसा।
    (ख). दूसरे समूह में पंजाब, सिंध और पश्चिम उत्तर सीमा प्रांत।
    (ग). तीसरे समूह में बंगाल और अ सम रहेंगे। यह तीनों समूह अपने अपने प्रांतों का गुट बनाने और यदि गुट बन गया तो उसकी कार्यपालिका और विधान मंडल को सौंपे जाने वाले विषयों पर फैसला करेंगे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली चाहते थे कि भारत को सत्ता सौंपने का उनका काम शीघ्र और शांतिपूर्वक हो जाए। कांग्रेस और लीग आपस में मिल कर जो भी व्यावहारिक हल इस समस्या का निकालें, वे उसे मानने को तैयार थे। कैसा नैसर्गिक प्रजातांत्रिक सोच था, सद्भावना से भरा हुआ। कहीं कोई घमंड का निशान नहीं, कहीं कोई उपनिवेशवादी विचारों की झलक नहीं। ब्रिटिश परंपरा को कोई भी सम्मान देगा। युद्ध में चर्चिल जैसा प्रधानमंत्री दिया जिसका काम युद्ध ख़त्म होने पर समाप्त हो गया था, युद्धोत्तर ब्रिटिश जनता ने उसी चर्चिल को हरा दिया और शांतिप्रिय प्रजातांत्रिक मूल्यों को समर्पित एटली को प्रधानमंत्री चुनाफरवरी 1946 में गांधी ने उस परिस्थिति के विषय में ‘हरिजन’ के संपादकीय काॅलम में लिखा था ‘‘चारों ओर घृणा छा गई है और अगर हिंसा से आज़ादी को समीप लाया जा सके तो उतावले देशभक्त ख़ुशी से घृणा का फायदा उठाने को तैयार हो जाएंगे। वास्तविकता यह है कि बड़े शहरो में बार-बार दंगे हो रहे हैं और दोनों राजनैतिक दल इन गुण्डो को इसके लिए दोषी ठहराते हैं, लेकिन ये गुण्डे कौन है – ये सवाल गांधी ने पूछा और स्वयं ही उत्तर दिया- हम ही तो उन्हें बनाते हैं। जब पढ़े लिखे शरीफ लोग ज़हर उगलते हैं और उत्तेजना फैलाते हैं तभी गुण्डों को अपना खेल खुलकर खेलने का मौका मिलता है।’’

केबिनेट मिशन से लंबी चर्चाओं के दौरान यह साफ हो गया था कि कांग्रेस और मज़दूर सरकार दोनों पाकिस्तान के विरूद्ध थी। अब तो गृह युद्ध या उसकी धमकी देकर ही, कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार को बंटवारे के लिए मंजूर किया जा सकता था। 27 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग की केन्द्रीय समिति ने केबिनेट मिशन से अपना समर्थन वापस ले लिया, विधान परिषद का बहिष्कार किया और पाकिस्तान बनाने के लिए ‘सीधी कार्यवाही’ की घोषणा कर दी। जिन्ना ने कहा कि मुसलमानों ने अब वैधानिक उपायों को छोड़ दिया है लेकिन जब उनसे पूछा गया कि आपका आंदोलन हिंसात्मक या अहिंसात्मक होगा? तो जिन्ना ने बहस में पड़ने से इंकार कर दिया लेकिन कुछ लीगी नेताओं ने खुलासा किया कि आंदोलन का शांतिपूर्ण होना महज एक सपना है।

लार्ड वेवल ने अंतरिम सरकार बनाने के लिए प्रयत्न शुरू किए और जवाहरलाल को उस सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। नेहरू ने जिन्ना को भी अंतरिम सरकार में सम्मिलित करना चाहा किन्तु उसने सहयोग करने से इंकार कर दिया, उल्टे उसने जहर उगला – ‘‘सवर्ण हिन्दुओं की फासिस्ट कांग्रेस और उसके पिट्ठू अंग्रेज़ी संगीनों की मदद से मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों पर हावी होकर उन्हें दबाना और उन पर हुुकूमत करना चाहते हैं।

यह समय संकट का था और संयम से काम लेने की ज़रूरत थी। इस तरह की कटुता और विशवमन अनिष्टकारी हो सकता है। 16 अगस्त को मुस्लिम लीग ने जो ‘सीधी कार्यवाहीं दिवस’ मनाया उससे एक के बाद एक बारूद की ढेरियां इस तरह सुलगती गई कि सालभर तक देश में धमाके के बाद धमाके होते रहे और जनधन की अपार हानि होती रही। मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को ‘सीधी कार्यवाहीं दिवस’ मनाया। उस दिन कोलकाता में अकल्पनीय भीषण दंगा, खून खच्चर और मारकाट हुई। 4 दिन तक गुंडों का आतंक छाया रहा। खुले आम शातिर गुंडों की टोलियां बल्लम, भालों, फरसों, तलवारों, बंदूक-पिस्तौलों तथा लाठियों से लेस होकर शहर में मारधाड़ और लूट खसोट करती रहीं। इस नरसंहार में करीब 5000 लोग मारे गए और 15000 घायल हुए।

यह वो समय था जब बंगाल में मुस्लिम लीगी मंत्रिमंडल का शासन था और एच.एस. सोहरावर्दी बंगाल के प्रधानमंत्री थे। अखबारों के अनुसार मंत्रिमंडल में दंगा रोकने के संबंध में मदभेद था। दंगा शुरू होते ही उसको रोकने का कोई आदेश नहीं दिया गया, बल्कि पुलिस को तत्परता और निष्पक्षता से अपने विवेक के आधार पर काम करने को कहा गया। इसका मतलब तटस्थता थी, दंगा रोकने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

यह दंगा इस उद्देश्य से करवाया गया था कि भारतीय मुसलमान पाकिस्तान बनाने के लिए कृति संकल्प है। चूंकि कोलकाता में गैर-मुस्लिम आबादी बहुमत में है, इसलिए उसने मुस्लिम लीग की चालों का निर्ममता से जवाबी हमला करके दिया। शक्ति परीक्षण में बाजी हिन्दुओं के हाथ रही। कोलकाता का बदला पूर्वी बंगाल की एक मुस्लिम प्रधान जिले नवाखाली में चुकाया गया। नवाखाली में संचार सुविधाएॅं बराबर नहीं थी, इस कारण धर्मांध मौलवियांे और मौकापरस्त नेताओं ने नवाखाली मे ऐसी आग लगाई कि गुण्डों को खुलकर हमला करने का मौका मिल गया। हिन्दूओं के घर जला दिए गए, उनकी फसलें लूट ली गई, मंदिर तहस नहस कर दिए गए, हजारों की संख्या में हिन्दू औरतें अपहृत कर ली गईं और कइयों को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया गया। हिन्दू अपने पुस्तैनी घर और गांव छोड़कर भागने लगे। नवाखाली में जो कुछ हुआ, वह कोलकाता से कई गुना ज़्यादा भीषण हुआ, जघन्यता और पशुता की पराकाष्टा थी।

गांधी अपने सारे प्रोग्राम कैंसल करते हुए नवाखाली पहुॅंच गए। पूर्वी बंगाल में भय, घृणा और हिंसा का बोलबाला था। पारस्परिक अविश्वास की कोई सीमा नहीं थी। पुराने रिश्ते और दोस्तियां सब खत्म हो गई थी। ऐसा लगता था कि गांधी की सत्य -हिंसा समाप्त हो गई थी। हिन्दू-मुस्लिम समप्रदाय में पारस्परिक विश्वास फिर से पैदा करना बहुत ही कठिन काम था।

जनवरी और फरवरी 1947 में गांधी पूर्वी बंगाल में रहे और उनके शांति प्रयत्नों के खिलाफ धुंआधार विषैला प्रचार इस आधार पर किया गया कि यह गांधी है कि मुसलमानों को पाकिस्तान न मिले।
2 जनवरी 1947 को वे श्रीरामपुर गए और आसपास के गाँवों का दौरा करने के लिए चल पडे़। चंडीपुर गांव में उन्होनें अपनी चप्पल भी उतार ली और नंगे पांव आगे बढ़े । गांव के ऊबड़ खाबड़ रास्ते, फिसलन भरे होते हुए और कांटे से भरे हुए। इस विनाशलीला के बीच गांधी ऊबड़ खाबड़ पगडंडी एवं रास्तों पर चलते रहें, रहवासियों की टूटी दीवारें, खण्डहर, मकान, नीचे गिरी हुई छतें, जलते हुए खिड़की दरवाजे, दहकते हुए मलबे, नंगी और विकृत लाशें उन्हें देखने को मिली।

धर्मोन्माद के इस तांडव के बीच आँखों में भरे, ह्रदय में हाहाकार लिए, सब कुछ देखते रहे। बिहार में बदला लेने के लिए भीषण नरसंहार की खबर आई और तत्काल 2 मार्च 1947 को गांधी बिहार के लिए रवाना हो गए। वहाॅं के हिन्दू किसानों ने मुस्लिम अल्पसंख्यको के साथ बदले में वहीं किया जो पूर्वी बंगाल में वहाॅं के मुसलमानों ने हिन्दू लोगों के साथ किया था। गांधी ने घोषणा की कि यदि तुरंत शांति स्थापना नहीं हुई तो वो आमरण अनशन कर देंगे। इस घोषणा का प्रभाव बिहार सरकार पर पड़ा और उसने सख्ती से काम लिया, जिससे बिहार में तुरंत शांति स्थापित हो गई। गांधी का कहना था कि सभ्यता का व्यवहार हर व्यक्ति और समुदाय का फर्ज़ है। स्थिति काबू में आ गई थी।

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