मायके से लेकर ससुराल में भी मैला ढोया, अब सरकार ने दिया पद्मश्री

विभव देव शुक्ला

26 जनवरी के ठीक एक दिन पहले पद्म पुरस्कारों की घोषणा हुई, ऐसे तमाम लोगों को पुरस्कार मिले जिनकी शायद ही किसी ने कल्पना की हो। ऐसा ही एक नाम है राजस्थान के अलवर से आने वाली उषा चोमर का। लोगों को जान कर हैरानी होती है कि वह मैला ढोने का काम करती थीं। लेकिन सालों मुश्किल हालातों का सामना करने के बाद सरकार ने उन्हें पद्म श्री से नवाज़ा है।

कब आया ज़िन्दगी में बदलाव
उषा जी की शादी तब हुई थी जब उनकी उम्र महज़ 10 साल थी। उनकी बदकिस्मती का आलम कुछ ऐसा था कि वह अपने मायके में मैला ढोती थीं और ससुराल में भी उन्हें मैला ही ढोना पड़ा था। लेकिन इन सब के बीच साल 2003 में उनकी मुलाक़ात सुलभ शौचायल के संस्थापक बिंदेश्वरी पाठक से हुई। यहीं से उषा चोमर की ज़िन्दगी में बड़े पैमाने पर बदलाव हुए। धीरे-धीरे उन्होंने हर उस महिला को अपने साथ जोड़ा जो आस-पास के क्षेत्र में मैला ढोने का काम करती थीं।

हर महिला को कराया मुक्त
इतना होने के कुछ समय बाद उन्होंने महिलाओं के साथ मिल कर पापड़ और जूट का काम शुरू किया। अब हालात ऐसे हैं कि उनके आस-पास किसी महिला को मैला नहीं ढोना पड़ता है। इन कामों के चलते ही वह अभी तक 5 देशों की यात्रा कर चुकी है। एक समाचार समूह से बात करते हुए उन्होंने कहा पहले लोग हमारे आस-पास रहने से भी कतराते थे लेकिन अब वही लोग हमें अपने घर बुलाते हैं। हमसे ही तमाम शुभ कार्य करवाते हैं, कभी-कभी तो पूजा तक करवाते हैं।

महिलाओं के लिए क्या होना चाहिए
उनका मानना है कि महिलाएं ऐसे कामों के लिए नहीं बनी हैं लेकिन इसके बावजूद वह ऐसे कामों में ही फंसी रहती हैं। महिलाओं को और मज़बूत करना होगा लेकिन उन्हें इस तरह के कामों में फंसा कर यह बिलकुल सम्भव नहीं होगा। और तो और महिलाओं को एक अच्छा भला दर्जा दिए बिना देश और समाज की बुनियाद को मज़बूत करना लगभग नामुमकिन है। इसलिए सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं को उनकी जगह बराबरी से मिले।

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