गांधी की सीख

– डॉ.ब्रह्मदीप अलूने, गांधी है तो भारत है,पुस्तक के लेखक

भारत की विविधता को समझने और उसके अनुसार चलने की गांधी की दृष्टि बेहद वृहत थी और यह वृहत भारत के बने रहने का कारण भी बना। भारत में बहुत सारे धर्म, संप्रदाय और जातियां रहती हैं। इन सबकी मूल मान्यताएं भी अलग-अलग हो सकती हैं लेकिन इन सबमें आपको गांधी मिल ही जायेंगे।

गांधी ने कहा था- राष्ट्र वैसा नहीं बन सकता जैसा हम चाहते हैं

खादी के तिरंगे झंडे को स्वयं महात्मा गांधी ने चुना था। केसरिया, हरे और सफ़ेद रंग के बीच में चरखा रखा हुआ था जो भारत की आत्मनिर्भरता और अहिंसा का प्रतीक था। कई दशकों तक जन आंदोलनों में यह भारत की अस्मिता और आज़ादी का प्रतीक बना रहा। लेकिन आज़ादी के समय कुछ लोगों द्वारा चरखे को गांधी का खिलौना कहकर इसे हटाने पर जोर दिया गया और अंततः इसे हटा भी दिया गया। इसकी जगह अशोक चक्र को रखा गया, यह चक्र सम्राट अशोक के विजेता सैनिकों का युद्द चिन्ह था। इस प्रकार सख्ती तथा साहस के प्रतीक दो शेरों के बीच शक्ति तथा सत्ता का प्रतीक अशोक का धर्म चक्र नये भारत का प्रतीक बन गया। गांधी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने साफ कहा, यह डिज़ाइन कितना ही कलात्मक क्यों न हो, मैं कभी ऐसे झंडे को सलामी नहीं दूंगा जिसके पीछे इस प्रकार का संदेश हो।

लेकिन इन घटनाओं से महात्मा गांधी विचलित भी नहीं हुए। उनके लिए राष्ट्र का मतलब कोई झंडा, धर्म, संप्रदाय, मूर्ति, नारे या भावनाओं का उभार कभी नहीं था। गांधी का राष्ट्र सभ्यता और सांस्कृतिक एकता से बनता था। वे इस देश को इतना जानते थे की शायद ही कोई ऐसा जन नेता इस राष्ट्र में जन्मा होगा। महात्मा गांधी भलीभांति समझते थे कि इस देश के लिए क्या मुफीद हो सकता है और क्या नहीं। उसके अनुसार ही वे चलते थे। इस बात से बेखबर की उनके फैसले को कोई किस तरह ले रहा है। जनता का भी उन पर खूब भरोसा होता था। यह भरोसा उस दौर में था जब संचार के कोई साधन नहीं थे, लेकिन गांधी की आवाज आकाशवाणी की तरह देश के कोने कोने तक पहुंच जाती थी। उस समय देश के कोने भी अपनी अलहदा पहचान लिए होते थे। पख्तून तो तब भारत का ही हिस्सा था। सरहदी इलाकों में रहने वाले पठानों से अंग्रेज ताउम्र लड़ते रहे वहीं लड़ाकू पठान गांधी के सामने नतमस्तक थे। खान अब्दुल गफ्फार खान का लाल कुर्ती आंदोलन गांधी पर भरोसे का ही तो प्रतीक था। भगतसिंह जब जेल में थे तो वे अंतिम समय में गांधी को ही पढ़ रहे थे। भगत सिंह की चिट्ठियों को पढ़ लीजिये उन्होंने भी कहा की देश को आज़ादी गांधी के रास्ते ही मिलेगी।

मोहम्मद अली जिन्ना को महात्मा गांधी से गहरी नफरत थी, यह बात गांधी जानते थे लेकिन वे कभी शायद ही जिन्ना से विचलित हुए हो। जिन्ना को यही तो चिढ़ थी कि वे गांधी को कभी विचलित न कर सके। अपनी पीड़ा को जिन्ना ने स्वीकार भी किया। देश के विभाजन की घोषणा के बाद जब वे कराची के हवाई अड्डे पर उतरे तो अपनी बहन से मुखातिब होते हुए बोले, अल्लाह का शुक्र है कि हमें पाकिस्तान मिल गया, जिसकी अपनी जिंदगी में मैंने कभी कल्पना नहीं की थी।

दरअसल जिन्ना पाकिस्तान बनने को लेकर इसलिए आश्वस्त नहीं थे क्योंकि वे गांधी के प्रभाव से डरते थे। उनका डरना लाजिमी भी था। गांधी का राष्ट्र सभी की साझी संस्कृति से बनता था जो जिन्ना की मूल मान्यता के ही खिलाफ था। मोहनदास करमचन्द गांधी से महात्मा गांधी तक के सफर में बापू दृढ निश्चयी होते चले गए। भारत माता की तस्वीर को लेकर तो आप सबने सुना ही होगा। फ़टी साड़ी में लिपटी एक आकृति को भारत माता का प्रतिरूप बताते हुए कहा था कि उन्होंने तो ऐसी ही भारत माता देखी है। यकीनन यह साहस गांधी का हो सकता था जो भारत की वास्तविकता को स्वीकार करने का साहस रखते थे और आम जनता इसीलिए तो उन पर अटूट विश्वास करती थी। 1920 में खिलाफत आंदोलन की अध्यक्षता करने जब बापू ने स्वीकार किया तो यह सबके लिए अप्रत्याशित था। सबके मन में एक ही सवाल था कि मुसलमानों के आंदोलन से बापू का क्या वास्ता, लेकिन इसका जवाब गांधी ही दे सकते थे, पर गांधी ने शब्दों से कभी किसी का जवाब कहां दिया। वे तो बस छोटे छोटे रास्ते पार करना चाहते थे। उनकी नजर में आज़ादी से ज्यादा महत्वपूर्ण भारत की गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, सामाजिक और आर्थिक असमानता का खाई को पाटना और साम्प्रदायिक एकता को बनाए रखना था। गांधी ने कभी ऊंचे लक्ष्यों की बात ही नहीं की। एक बार गांधी गुजरात में एक स्थान पर आये तो वल्लभ भाई पटेल के दोस्त उनसे मिलने को बहुत उत्सुक हो गये। इस पर वल्लभ भाई ने कहा कि गांधी में क्या है, अभी वह बोलेगा की गेंहू के दाने से और क्या निकाल सकते हैं और आज़ादी हमें इससे कैसे मिलेगी। लेकिन जब वल्लभभाई ने गांधी के कामों को देखा तो वे भी उनके मुरीद हो गए।

नौआखली में गांधी पागलों की तरह बेखौफ घूम रहे थे। उन्हें वहां भी मरने से डर नही लग रहा था। उनके इस साहस को अंग्रेज भी जानते थे इसलिए अंग्रेजों ने पुलिस और सेना से ज्यादा गांधी पर भरोसा किया और इसके परिणाम भी सामने आये। 15 अगस्त 1947 को पंजाब समेत कई सरहदी इलाके दंगों से जल रहे थे तब बंगाल में हिन्दू मुसलमान मिलकर तिरंगा फहरा रहे थे।

जार्ज बर्नाड शा ने कहा कि गांधी का तरीका बराबर सही बना रहा। जबकि लोगों को दूर की चीजों में दिलचस्पी नहीं होती, उनकी खास नजर वक्ती फ़ायदे पर होती है। गांधी खिलाफत आंदोलन में क्यों गए थे, इसका जवाब आगे मिल ही गया। मुस्लिम लीग जिस आधार पर पाकिस्तान को मुसलमानों के लिए अलग देश के रूप में मांग रही थी, वह एक मध्ययुगीन विचार था। गांधी ने मुस्लिम लीग की इस धारणा को ही ध्वस्त कर दिया की मुसलमानों का वजूद हिंदुस्तान से अलग है। गांधी जानते थे कि मुसलामन तो भारत के हर गांव में बसते हैं अत: मुसलमानों की किसी भी समस्या को हिंदुस्तान से अलग करके नहीं देखा जा सकता। गांधी का ही यह विश्वास था की जितने लोग मुस्लिम लीग के साथ नहीं थे उससे ज्यादा मुसलमान गांधी के साथ थे। गांधी लोकतांत्रिक अधिकारों के बड़े समर्थक थे लेकिन उन्होंने कभी किसी का विरोध नहीं किया। उन्होंने साफ कहा कि वे राजाओं के विरोधी नहीं हैं और न ही रियासतों को जबरदस्ती मिलाने के पक्षधर है। यह वहां की जनता को तय करने दीजिये। गांधी के इन्हीं विचारों के कारण आज़ादी का आंदोलन अपनी गति से चलता रहा और उससे देश के सभी भागों के लोग जुड़ते चले गये। गांधी का कभी किसी राजा ने भी विरोध नहीं किया,यहां तक कि उन हरिसिंह ने भी नहीं जो कश्मीर को अपनी जागीर समझते थे।

भारत की विविधता को समझने और उसके अनुसार चलने की गांधी की दृष्टि बेहद वृहत थी और यह वृहत भारत के बने रहने का कारण भी बना। भारत में बहुत सारें धर्म, संप्रदाय और जातियां रहती हैं। इन सबकी मूल मान्यताएं भी अलग अलग हो सकती है लेकिन इन सबमें आपको गांधी मिल ही जायेंगे। गांधी का भारत की जनता पर इतना अटूट विश्वास था कि उन्होंने कभी किसी को अपने राष्ट्र के लिए अप्रासंगिक समझा ही नहीं। गांधी भारत के हर नागरिक में संभावनाएं ढूंढते रहे। किसानों से कहा कि आप जैसे है वैसे ही रहें, आप अपने खेतों में खूब काम करते रहें। गांधी स्वयं गांव में जाकर रहने लगे और उन्होंने ग्राम वासियों से कहा कि असल भारत तो गांवों में ही रहता है। वे आदिवासियों के बीच गए तो पर्यावरण के लिए आदिवासियों की प्रतिबद्धता के वे कायल हो गए। आज़ादी मिलने से ठीक पहले महात्मा गांधी कश्मीर गए तो वहां की जनता भी इससे अभिभूत हो गई। गांधी अपने आश्रम में तमाम विरोधों को दरकिनार कर समरसता का महत्व समझाने और इसे अपनाने का संदेश देने में कामयाब रहे।

गांधी के जीवन और कार्यों पर नजर दौड़ाइये, उन्होंने भारत के बने रहने के लिए अपनी दृष्टि को सदैव सम रखा, चाहे उनका कितना ही विरोध हुआ हो या कितनी भी विपरीत परिस्थितियां क्यों न बनी हो। गांधी बार बार यह संदेश देते हैं कि राष्ट्र वैसा नहीं बन सकता जैसा हम चाहते हैं, बल्कि राष्ट्र को वैसा ही रहने दीजिये, जैसा वह है। यहां के लोगों को पता है कि उन्हें कैसे बनना है। लोगों के बीच रहिये और कार्य करते रहिये। यदि यह कार्य समाज और देश के हित में है तो जनता अवश्य उस रास्ते पर चल पड़ेगी। गांधी बुनियादी शिक्षा के पक्षधर थे लेकिन अंग्रेजी शिक्षा के घोर विरोधी नहीं थे। गांधी गुलामी के विरोधी थे लेकिन अंग्रेजों से उन्होंने कभी नफरत नहीं की। गांधी को अपनी भारतीय संस्कृति पर गर्व था लेकिन उन्होंने कभी किसी अन्य संस्कृति का विरोध नहीं किया। गांधी बस जीवन भर चलते रहे और अनंत अपेक्षाएं उनके साथ एक-एक कर जुड़ती चली गईं। ब्रिटेन के विश्वविख्यात लेखक राबर्ट पेन ने महात्मा गांधी, लाइफ एंड डेथ लिखी थी। उन्होंने गांधी के जीवन को बहुत नजदीक से देखा था, पेन ने गांधी के जीवन संदेश को इस प्रकार बताया,“त्याग के बिना देशक्ति नहीं हो सकती क्योंकि जहां स्वार्थ ग्रहण की भावना आई, वहां मनुष्य ऊपर चढ़ ही नहीं सकता।” महात्मा गांधी कहते भी थे कि यदि तुमने अपना कर्तव्य नहीं निभाया तो मरने के बाद भी मैं तुम्हें सजा दूंगा।

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