सरकारी खर्च को उच्च वर्ग से हटाकर आम वर्ग की ओर मोडऩा होगा

– डा. भरत झुनझुनवाला

एक फरवरी को देश का आम बजट पेश होना है। कोरोना की मार से कराह रही अर्थव्यवस्था के इस दौर में बजट से उम्मीदें बढऩा और भी स्वाभाविक है। ऐसे में कुछ अपेक्षाओं को लेकर सरकार को अपने सुझावों से अवगत कराना उपयोगी होगा। बजट मूल रूप से सरकार के आय एवं व्यय का ब्योरा ही होता है तो हमारे सुझावों की दिशा भी उसी प्रकार से निर्धारित होगी। पहले आमदनी की तस्वीर पर ही गौर करते हैं। चालू वित्त वर्ष का बजट अनुमान आधारित होता है तो आय-व्यय के लिए हमें पिछले वित्त वर्ष यानी 2019-20 के आंकड़ों को ही आधार बनाना होगा। वर्ष 2019-20 में केंद्र सरकार को बड़ी कॉरपोरेट इनकम टैक्स से 3.1 लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिला था। मेरा पहला सुझाव यही है कि इसमें बढ़ोतरी कर उसके माध्यम से चार लाख करोड़ रुपये के राजस्व का लक्ष्य रखा जाए।

संभव है कि इससे देसी उद्यमी कम कर वाले देशों का रुख कर सकते हैं तो हमें उन देशों के साथ दोहरे कराधान वाले समझौतों में बदलाव करना होगा। इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता कि विदेशी पूंजी को आकॢषत करने के प्रयासों के परिणाम पिछले 20 वर्षों में अपेक्षित नहीं रहे। इसमें बड़ा हिस्सा अपनी ही पूंजी की राउंड ट्रिपिंग का रहता है। बजट को लेकर दूसरा सुझाव व्यक्तिगत आयकर की दर से जुड़ा है। वर्ष 2019-20 में सरकार को इससे 2.8 लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिला। इसकी दर भी बढ़ाकर चार लाख करोड़ रुपये का राजस्व जुटाने का लक्ष्य निर्धारित किया जाए। हालांकि इससे उच्च एवं मध्यम वर्ग की आमदनी और उनके द्वारा उत्पन्न मांग प्रभावित होगी, परंतु उसकी भरपाई दूसरे विकल्पों से संभव है जिनकी चर्चा आगे की जाएगी।

तीसरा सुझाव जीएसटी की दर का है। वर्ष 2019-20 में केंद्र को इस स्त्रोत से 6.1 लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिला था। इसकी दर घटाकर इसे भी चार लाख करोड़ रुपये के संग्र्रह वाले लक्ष्य से जोड़ा जाए। इससे आम आदमी को राहत मिलेगी और मांग बढ़ेगी। चौथा सुझाव आयात कर की दर का है। वर्ष 2019-20 में सरकार को इससे 60 हजार करोड़ रुपये का राजस्व मिला था। इसकी दर तीन गुना कर देनी चाहिए जिससे कि इससे करीब 2 लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिले। आयात कर बढ़ाने से घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा, रोजगार के अवसर सृजित होंगे, बाजार में मांग बढ़ेगी और घरेलू अर्थव्यवस्था चल निकलेगी।

पांचवां सुझाव केंद्रीय एक्साइज ड्यूटी का है। वर्ष 2019-20 में केंद्र को इससे 2.5 लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिला। इसकी दर बढ़ा दी जाए जिससे कि इससे भी चार लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिले। इस मद में अधिकांश हिस्सा पेट्रोलियम पदार्थों का होता है। उनके दाम बढऩे से आम आदमी को झटका लगेगा, लेकिन इसकी भरपाई जीएसटी की दर घटाने एवं अन्य तरीकों से संभव हो सकती है। इससे पेट्रो उत्पादों की मांग घटेगी और उनके आयात में कमी आएगी। विदेशी व्यापार संतुलित होगा। रुपये का मूल्य चढ़ेगा। इनके अतिरिक्त केंद्र को अन्य मदों से 4.3 करोड़ रुपये और ऋण पर ब्याज से 7.7 लाख करोड़ रुपये मिले। इन्हें यथावत रहने दें। इस प्रकार 2019-20 में सरकार का जो बजट 27 लाख करोड़ रुपये रहा उसकी तुलना में आगामी वित्त वर्ष के लिए सरकार को 30 लाख करोड़ रुपये की रकम उपलब्ध हो जाएगी।

अब खर्च की तरफ ध्यान दें। रक्षा बजट 2019-20 में 4 लाख करोड़ रुपये था। इसे बढ़ाकर 7 लाख करोड़ रुपये कर देना चाहिए, क्योंकि देश की सीमाओं पर संकट विद्यमान है। 2019-20 में संचार एवं विज्ञान के क्षेत्रों में 60 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए जिसे पांच गुना बढ़ाकर तीन लाख करोड़ रुपये कर देना चाहिए ताकि देश में नई तकनीकों के आविष्कार को प्रोत्साहन मिले। गृह मंत्रालय का खर्च 2019-20 में 1.4 लाख करोड़ रुपये था। इसे पूर्ववत बनाए रखा जाए, क्योंकि आंतरिक सुरक्षा महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य पर सरकार ने 60 हजार करोड रुपये खर्च किए जिसे कायम रखा जाए। इसमें परिवर्तन यही करना चाहिए कि एंप्लाई स्टेट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन और सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम जैसे व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं को समाप्त करके इस रकम को कोविड तथा अन्य बीमारियों पर शोध में लगा देना चाहिए।

इनके बाद 2 प्रकार के अन्य मंत्रालय आते हैं। पहले बुनियादी संरचना वाले मंत्रालय जैसे सड़क, बिजली, रेलवे इत्यादि। इनके खर्चों को आधा कर देना चाहिए और हाईवे आदि के निर्माण को एक वर्ष के लिए स्थगित कर देना चाहिए। फिलहाल देश के लिए सबसे अधिक आवश्यक बाजार में मांग उत्पन्न करना है। मंत्रालयों की श्रेणी में दूसरे मंत्रालय कल्याणकारी उद्देश्य से जुड़े हैं। जैसे खाद्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास इत्यादि। उनके खर्चो को भी आधा कर देना चाहिए। इन मंत्रालयों का काम केवल सार्वजनिक कार्यों को संपादित करने का रह जाना चाहिए जैसे शिक्षा के क्षेत्र में केंद्रीय विद्यालयों का निजीकरण करके रकम की बचत की जा सकती है। इन दोनों प्रकार के सभी अन्य मंत्रालयों पर 2019-20 में 20 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए थे जिसे घटाकर 10 लाख करोड़ कर देना चाहिए।

उपरोक्त सभी खर्चों का योग 22 लाख करोड़ होता है। वहीं सरकार की आय हमने 30 लाख करोड़ आंकी थी। ऐसे में शेष आठ लाख करोड़ की जो रकम बचती है उसे देश के प्रत्येक नागरिक के बैंक खाते में सीधे प्रति माह हस्तांतरित कर देनी चाहिए। इस रकम से 140 करोड़ लोगों को प्रतिमाह करीब 500 रुपये दिए जा सकते हैं जो पांच व्यक्तियों में परिवार में 2,500 रुपये तक हो सकते हैं। इसे ‘हेलीकॉप्टर मनीÓ कहा जाता है। मानों किसी हेलीकॉप्टर से आपके घर में रकम पहुंचा दी जाए। आठ लाख करोड़ की इस विशाल राशि के सीधे लोगों के हाथ में पहुंचने से मांग में तेजी आएगी। इसके साथ ही यदि आयात कर भी बढ़ा दिया जाए तो बढ़ी मांग की पूर्ति के लिए घरेलू उत्पादन में स्वत: बढ़ोतरी होगी। इससे रोजगार भी बढ़ेंगे। वहीं आम लोगों को कल्याणकारी योजनाओं की बंदी से हुए नुकसान की भरपाई प्रत्यक्ष मदद से पूरी हो जाएगी।

मूल बात यही है कि सरकारी खर्च को उच्च वर्ग से हटाकर आम वर्ग की ओर मोडऩा चाहिए। इससे विदेशी वस्तुओं के उपभोग में कमी आएगी। इसका प्रभाव यही होगा कि बाजार में घरेलू वस्तुओं की मांग बढ़ेगी जिससे घरेलू उत्पादन, रोजगार सृजन और मांग का सुचक्र स्थापित होगा। इन कदमों से हम 10 से 12 प्रतिशत तक आर्थिक विकास दर हासिल कर सकते हैं। सरकार को तय करना होगा कि राजनीतिक दृष्टि से उसके लिए उच्च वर्ग का वित्तीय समर्थन अधिक लाभप्रद है या आम जनता के वोट।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

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