कचरा बिनने से लेकर बात करने का तरीका सीखने तक, कैसे बदली इन महिलाओं की ज़िन्दगी

विभव देव शुक्ला

हमारी चर्चा में अक्सर ऐसे ही नाम शामिल होते हैं जो मशहूर हैं या पहले से ही चर्चा में बने हुए हैं। देश और दुनिया की 50 या 100 प्रभावशाली महिलाओं में किसी एक महिला को चुन कर उनका ज़िक्र करना, उनके बारे में बात करना आसान है। मुश्किल उन नामों पर बात करना है जो असल मायनों में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। जिनके लिए हर दिन, हर क्षण और हर परिस्थिति अपने आप में किसी चुनौती से कम नहीं है। जिन औरतों ने अपनी ज़िन्दगी और समाज का सबसे मुश्किल चेहरा देखा है।

कचरा बिन कर शोहरत कमाई
इस तरह के तमाम नामों की सूची में ऐसा ही एक नाम है मध्य प्रदेश के इंदौर शहर की रहने वाली कौशल्या बकावले। कौशल्या जी की उम्र 54 साल है और उन्होंने अपनी ज़िन्दगी के कई दशक कचरा बिनने में गुज़ार दिए। वह बताती हैं कि उनके लिए किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहना भयानक सपने से कम नहीं है। चाहे पति हो या बेटा, वह अपने गुज़र बसर के लिए किसी व्यक्ति के भरोसे नहीं रहना चाहती हैं।
इस काम के लिए उन्हें तमाम पुरस्कार भी मिल चुके हैं। इतना ही नहीं पिछले वर्ष कचरा बिनने वालों की कार्यशाला में उन्हें अर्जेन्टीना बुलाया गया था। कौशल्या जी महज़ 5वीं तक पढ़ी हैं लेकिन उनका कहना है कि अर्जेन्टीना की तरह इंदौर में भी काम होना चाहिए। वहाँ कचरा बिनने वालों को 12 हज़ार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलते हैं लेकिन भारत में ऐसे लोगों के लिए कुछ विशेष नहीं है।

10 हज़ार छतें पूरी कराईं
ऐसा ही दूसरा नाम है 55 साल की धनु बाई का। धनु बाई ने लगभग 20 साल से ज़्यादा समय तक छत डलवाने का काम किया। धनु बाई छत डालने वालों की मदद करती थीं और अपनी ज़िन्दगी के कई साल इसमें ही गुज़ार दिए। जब हमने उनसे पूछा कि आज तक आपने कितनी छतें पूरी कराई हैं तब उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला कर कहा 10।
मौके पर मौजूद हर इंसान का अंदाज़ा था 10 छत, फिर उन्होंने कहा नहीं। दूसरा अंदाज़ा था 100 तो इस पर भी उन्होंने कहा नहीं। अंत में उन्होंने खुद कहा ’10 हज़ार, मैंने अभी तक 10 हज़ार छतें डलवाई हैं।’ लेकिन अब वह उम्र के इस पड़ाव पर पहुँच चुकी हैं जहाँ इस तरह के काम नहीं कर सकती हैं। फिर भी चलते रहना उनका स्वभाव है इसलिए आज भी कुछ न कुछ करती ही रहती हैं, खुद को व्यस्त रखती हैं।

बचपन से की मजदूरी
35 साल की सरिता वसूनिया ने लगभग 25 साल तक ईंट के भट्ठे में काम किया। इतना ही नहीं एक पोलिथीन (पन्नी) बनाने वाले समूह में भी किया। अपने बारे में बताते हुए कहती हैं कि दिन में गर्मी होने की वजह से या काम ज़्यादा होने की वजह से अक्सर उन्हें देर रात तक काम करना पड़ता था। कभी कभी तो 2-3 भी बज जाते थे, लोगों को यह देख कर बेहद हैरानी होती थी।
लोगों को यहाँ तक लगता था कि रात में जग कर काम करने के लिए वह नशा करती हैं। लेकिन हालात सुधरने के बाद उन्होंने गाड़ी चलाना सीखा, सिलाई सीखी और पार्लर का काम भी सीखा और यह सब कुछ किया भी। फिलहाल उनका मानना है कि अब ज़िन्दगी पहले से बेहतर हो चुकी है लेकिन महिलाओं के लिए काम मुश्किल होते नहीं है बल्कि बनाए जाते हैं।

राम जी की गाड़ी को धकाओ
ऐसी चुनौतियाँ झेलने वाला तीसरा नाम है 60 साल की सावित्री बाई। पिछले कुछ सालों से उनकी सेहत अच्छी नहीं रहती है लेकिन फिर भी उनसे बैठा नहीं जाता। स्वास्थ्य ठीक रहने के दौरान व छोटे बच्चों की मालिश करती थीं और हर मालिश के 150 से 200 रुपए तक मिल जाते थे। उनके पति को लकवा मार गया था लिहाज़ा उनके पति का जिम्मा भी उन पर है। वह बताती हैं कि महीने भर में 1000 से 1500 रुपए की दवाई ही लग जाती है वही सबसे बड़ी मुश्किल है। अंत में इस समस्या का हल भी उन्होंने खुद ही दिया, सावित्री बाई ने कहा ‘ये राम जी की गाड़ी है, इसे पूरे दम से धकाओ।’

अगरबत्ती घिस कर कमाई रोटी
51 साल की लक्ष्मी बाई गुंडिया ने भी ज़िन्दगी चलाने के लिए ज़िन्दगी के सबसे कठिन पहलुओं का सामना किया। वह बताती हैं कि 8 साल की उम्र से अगरबत्ती घिसना शुरू कर दिया था और जब तक 3-4 किलो अगरबत्ती नहीं घिस लेती थीं तब तक एक वक्त का खाना नसीब नहीं होता था। इसके बाद उन्होंने ईंट के भट्ठे में भी काम किया।
आज से 30-35 साल पहले उन्हें इस काम के 10 से 15 रुपए मिलते थे। इतना ही नहीं इसके बाद उन्होंने मजदूरी का काम भी किया, एक ठेकेदार के साथ मिल कर लगभग 20 सालों तक घर बनवाने का काम किया। यानी लक्ष्मी बाई ने अपनी ज़िन्दगी के लगभग 45 साल काम करते हुए गुज़ार दिए। फिलहाल उनके घर के हालात बेहतर हैं, उनके बच्चे उन्हें कोई काम नहीं करने देते हैं।

हाथ पर एसिड के निशान
इसके बाद आती हैं मीनू जिनका काम दूसरे किसी भी व्यक्ति से कहीं अलग और कहीं मुश्किल है। 31 साल की मीनू काँच की बोतलों की सफाई करने वाले कारखाने में काम करती हैं। इन बोतलों की सफाई एसिड से होती है इसलिए अक्सर उनके हाथ भी जलते हैं लेकिन इस बात पर बेफिक्री के साथ कहती हैं काम करने पर इतना तो झेलना ही पड़ेगा। मीनू जी को यह काम करते हुए लगभग 7 से 8 साल हो गए लेकिन हाथ जलने से बिलकुल नहीं घबराती हैं।

लकवे के कारण धीमी हुई ज़िन्दगी
सुमन बाई ने 25 साल की उम्र से फल बेचना शुरू कर दिया था और साल 2004 तक उन्होंने यह काम किया। जब हमने उनकी उम्र पूछी तब उन्होंने कहा ‘जब लकवा आया था तब से भूलने की परेशानी है, घर में किसी से पूछना पड़ेगा।’
सुमन बाई बताती हैं कि लकवा की परेशानी होने के पहले तक उनकी ज़िन्दगी में सब कुछ बहुत रफ्तार से चल रहा था। लकवे की दिक्कत होने के बाद काफी कुछ धीमा हुआ है और काफी बदलाव आए हैं। अंत में उन्होंने कहा ‘हर महीने मेरी 1500 रुपए की दवाई आती है, अभी सबसे बड़ा खर्चा यही है, धीमे ही सही लेकिन ज़िन्दगी चल रही है।’

बात करने का तरीका आ गया
इन महिलाओं का अतीत कैसा भी रहा हो, फिलहाल इनके साथ सबसे अच्छी बात है कि सभी इंदौर की एक सहकारी संस्था में काम करती हैं। संस्था का नाम है ‘सर्वोदय श्रमिक महिला सहकारी संस्था’ जहाँ इन्हें कई तरह की जिम्मेदारियाँ मिली हुई हैं। जिनमें सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी तो यही है कि इन्हें ऐसी महिलाओं को अपने साथ जोड़ना है जिन्हें मदद की ज़रूरत होती है। सारी महिलाएं असंगठित मजदूर की श्रेणी में आती हैं।
इसका मतलब यह भी है कि इनके पास कोई दूसरा काम करने का हुनर भी नहीं था। लेकिन इस संस्था से जुड़ कर महिलाओं की ज़िन्दगी में बड़े पैमाने पर बदलाव आए। कई महिलाओं का कहना था, अगर कोई व्यक्ति हमसे मिलने उस समय आता जब हम मजदूरी करते थे तब हम बात ही नहीं कर पाते। अब हम लोगों से बात कर सकते हैं, लोगों के बीच उठने-बैठने के तौर तरीके समझते हैं, ज़रूरतमंदों को खुद से जोड़ना समझ गए हैं। इस तरह के बदलाव कीमती हैं, हर पड़ाव पर इन बदलावों की अहमियत समझ आती है।

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