मैं अपने पिता से जीवन में सिर्फ़ एक बार मिली-विद्या रानी

निखिल दवे।

हाल ही में भाजपा में शामिल हुईं कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन की बेटी और शिक्षिका विद्या रानी से निखिल दवे की खास बातचीत

आपके ज़ेहन में पिता की कैसी छवि है?

पिता के एनकाउंटर के समय मैं महज़ 14 साल की थी। नाना-नानी ने मुझे पाला और मुझे मेरे पिता के बारे में नहीं बताया। मुझे यह तक नहीं बताया गया कि असल में मेरे पिता कौन हैं। मैं हमेशा यही समझती रही कि नाना ही मेरे पिता हैं, कुछ समय बाद मेरे गांव वालों ने मुझे पिता के बारे में बताया। मैं पिता से बस एक बार मिली। मैं नहीं जानती थी कि क्या सही है और क्या गलत। उस दौरान मैं महज़ 6 या 7 साल की थी। लोगों को मेरे पिता की वजह से मेरे बारे में भ्रम हो सकते हैं, लेकिन मुझे इंसानियत और शान्ति से प्रेम है। मुझे सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहना पसंद है। मेरे पिता का रास्ता भले गलत था, लेकिन उनकी सोच गलत नहीं थी, लेकिन मैं सही रास्ते पर चल लोगों की सेवा करना चाहती हूं।

स्कूल में लोगों का व्यवहार कैसा था?

मेरी पढ़ाई छात्रावास में हुई। नाना-नानी के पास ज़्यादा पैसे नहीं थे, न ही मेरे पिता कभी कुछ भेजते थे। इसलिए मुझे लोगों के सहयोग से पढ़ना पड़ा। साफ कहूं तो मेरी पढ़ाई दान से हुई इसलिए हमेशा से यह कर्ज़ उतारने की इच्छा थी। मैं आईएएस अफसर बनना चाहती थी। जब स्कूल के दिनों को याद करती हूं तो मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे मेरे शिक्षकों ने मेरा इतना ख़याल रखा और मुझे कभी माता-पिता की कमी महसूस नहीं होने दी।

पिता की मौत के पहले और बाद में लोगों का बर्ताव कैसा रहा?

जहां भी मैं रही, वहां लोगों ने मुझे बहुत प्यार दिया। मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनके बीच मुझे परिवार की कमी महसूस नहीं हुई, वहीं कुछ लोग अब ऐसे भी मिलते हैं जिन्हें सिर्फ इस बात से दिक्कत है कि मैं वीरप्पन की बेटी हूं। मैं उन्हें यह समझाने की कोशिश करती हूं कि वे पिता नहीं बेटी को देखें।

मां ने आपको पिता के बारे में क्या बताया क्योंकि उनकी छवि ‘एंग्री मैन’ जैसी थी?

ऐसा बिलकुल नहीं है मेरी माता के मन में उनकी छवि एक प्यार करने वाले पति की थी। मां बताती हैं कि वह उनका बहुत ध्यान रखते थे और अक्सर अपने बच्चों को भी याद करते थे।
आपके पिता की तीसरी संतान (बेटी) की चर्चा होती है? कहा जाता है कि पुलिस से बचने के लिए पिता ने ही अपनी अबोध बालिका की हत्या कर दी थी। इस बारे में मैंने अपने मां से कई बार पूछा था। वह कहती हैं कि यह सच नहीं है, यह महज़ एक संयोग था और कुछ नहीं।

आपके पिता ने अपराध का रास्ता क्यों चुना, आप इसकी वजह क्या मानती हैं?

मैंने लोगों से सुना था कि उनके जीवन में हालात ऐसे बन गए थे जिसकी वजह से उन्हें यह रास्ता चुनना पड़ा। फिर भी उनके किए को सही नहीं ठहराया जा सकता है। उनका रास्ता गलत था।

मां से आपके संबंध कैसे हैं? कहा जाता है कि आपकी शादी में थोड़ी समस्या हुई थी?

मां से संबंध अच्छे हैं और वह मुझसे प्यार करती हैं। शादी के समय जो हुआ उस समय के हालात बदल चुके हैं। एक समय मेरा ख़याल रखने वाला कोई नहीं था। मां जेल में थीं। हमें अपनी सुरक्षा के लिए फैसला लेना पड़ा था। कुछ समय बाद मां को यह बात समझ में आई और तब उन्होंने सब कुछ स्वीकार कर लिया।

आपने प्रेम विवाह किया, क्या पति के परिवार ने आसानी से स्वीकार कर लिया?
हमें कभी कोई परेशानी नहीं आई बल्कि वह मुझे अपने परिवार में शामिल करके खुश हैं।

आप एक शिक्षण संस्थान चलाती हैं, लोगों का क्या कहना है?

लोग अपने बच्चों को मेरे पास भेज कर खुश हैं। जब इन्हें देखती हूं तो सोचती हूं कि मेरे पास आने के बाद लोगों के जीवन में कुछ तो अलग और नया होना ही चाहिए। वह चाहे उनकी सोच में हो, चरित्र में हो, रवैये में हो और ज़िन्दगी के प्रति नज़रिये में हो। बच्चों के माता-पिता मुझ पर भरोसा करते हैं। यह मेरे लिए बहुत गर्व की बात है।

भाजपा ही क्यों जबकि भाजपा और एआईएडीएमके सहयोगी दल हैं। एआईएडीएमके कार्यकाल में ही आपके पिता वीरप्पन का एनकाउंटर हुआ?

मुझे लगता है कि मैं यहां सक्रियता से काम कर सकती हूं। मैं सिर्फ अपने पिता की पहचान लेकर भाजपा का हिस्सा नहीं बनी हूं, मैं बिलकुल नहीं चाहती कि लोग मुझे इसलिए वोट दें क्योंकि मैं वीरप्पन की बेटी हूं। मैं देख रही हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं। इससे लोगों के जीवन में कई अहम बदलाव आए हैं। रही बात मेरे पिता के एनकाउंटर के समय की तो तब से लेकर अब तक समय बहुत बदल चुका है।

आने वाले समय के लिए क्या योजना है?

बतौर एक नागरिक मैंने अभी तक ऐसा कुछ हासिल नहीं किया है जैसा मैंने सोचा था। मैं अपने गांव और आसपास के इलाके में साफ पानी और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के सुधार के लिए काम शुरू कर चुकी हूं।

मैं अपने पिता की मौत के पहले अपनी मां से मिल चुकी थी, उनकी मौत के पहले ही मेरी दादी ने मुझे मेरी मां को सौंप दिया था लेकिन हमारी मुलाक़ात साल में एक या दो बार चंद दिनों के लिए ही होती थी, जब मैं छुट्टियों के दौरान नानी के घर जाती थी।

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