दिग्विजय चाहते तो मुझे फँसा सकते थे,मेरा मेयर पद जा सकता था

इंदौर। अपनी बेबाकी के लिए मशहूर प्रदेश के कद्दावर नेता, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने पहली बार ऐसे सवालों के जवाब दिए जो राजनीतिक गलियारों में घूम तो लंबे अरसे से रहे थे लेकिन सीधे पूछ कोई नहीं पा रहा था। प्रजातंत्र ने जब से सीधे सवाल किए तो विजयवर्गीय ने भी सच्चे जवाब देकर चौंकाने का काम किया। विजयवर्गीय ने माना कि उनके कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह से आत्मीय रिश्ते हैं। प्रस्तुत है विजयवर्गीय से विस्तार हुई चर्चा के प्रमुख अंश –

 

प्रजातंत्र : उमा भारती को मुख्यमंत्री बनाने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका का जिक्र होता है, उनके बाद लग रहा था कि कैलाशजी मुख्यमंत्री होंगे फिर शिवराजसिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने में आपकी भूमिका अहम मानी गई लेकिन आपके समर्थक और जो कार्यकर्ता है वे आपको उस भूमिका में देखना चाहते हैं।

कैलाश विजयवर्गीय : देखिए लोग समझते हैं, मानते हैं कि मैंने उमाजी को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन पार्टी के निर्णय है तो मैं अपने जवाबदारी का निर्वहन करते हुए काम करता हूं। मैंने उमाजी को मुख्यमंत्री बिल्कुल भी नहीं बनवाया। शिवराजजी को भी बनाने में मेरी भूमिका रही ऐसा नहीं है लेकिन उस वक्त प्रमोदजी, संजयजी सब लोग थे जिन्होंने मुझे जवाबदारी वाला काम दिया था जो मैंने किया था। शिवराजजी ने भी जो जिम्मेदारी दी उसे मैंने किया। आज भी मैं यहां पर हूं। राष्ट्रीय महामंत्री हूं। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाहजी, जेपी नड्डाजी की टीम का हिस्सा हूं। मैं इसे गौरव मानता हूं। इससे बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है।

प्रजातंत्र : बंगाल में आपकी मेहनत के कारण बेहतर रिजल्ट आए, आपने मंत्री भी बनवाए लेकिन उसके बाद कैलाशजी को जिस रूप में लोग देखना चाहते थे वे बिल्कुल नजर नहीं आ रहे हैं?

कैलाश विजयवर्गीय : आपके प्रश्न में ही उत्तर है। जो मंत्री बने हैं उन्हें मेरा सपोर्ट था। इसका मतलब है मैं जिनका नाम ले रहा हूं उन्हें मंत्री बनाया गया। मैं जिस पद पर हूं वह बहुत बड़ा पद है। मोदीजी, अमितजी और नड्डाजी के साथ काम करने का अवसर दुर्लभ लोगों को ही मिलता है, ऐसे में मैं आगे कहां जाऊं। प्रधानमंत्री को बन नहीं सकता अभी इसलिए जहां हूं मैं बहुत प्रसन्न हूं?

 

प्रजातंत्र : बंगाल में आपने खूब मेहनत की। इंदौर में भी आपने ऐसी ही मेहनत की जब आप पार्षद थे, मेयर बने। क्या आप दोनों स्थानों की मेहनत में कुछ सामंजस्य पाते हैं?

कैलाश विजयवर्गीय : देखिए बंगाल की स्थिति बहुत अलग है। हमारे यहां लोग बहुत सहज हैं, सरल हैं। वहां की राजनीति बहुत विषैली है। वहां दुश्मन की तरह देखा जाता है। आपको आश्चर्य होगा वहां मेरा और ममताजी का साढ़े पांच साल में आमना-सामना भी नहीं हुआ। कभी ऐसी स्थिती आई तो भी नजर चुराकर निकल गए यानि मिलना भी वहां की राजनीति के लिए ठीक नहीं है। जो परिचित मंत्री हैं वहां के वे भी मिलने से डरते हैं। वहां की राजनीति में हिंसा है।

प्रजातंत्र : बंगाल में संगठन भी नहीं था ऐसे में वहां आपकी शुरुआत कैसे हुई?

कैलाश विजयवर्गीय : मुझे इस बात का गर्व है कि प्रधानमंत्री की कृपा और अमित शाहजी का खुला सपोर्ट रहा। मैं आपको वहां की एक घटना बताता हूं। मैं एक मुस्लिम एरिया में षडयंत्रपूर्वक घेर लिया गया। करीब हजार-डेढ़ हजार लोग हथियार लेकर खड़े थे और हमारी सिक्यूरिटी भी उस वक्त घबरा गई। उन्होंने मुझे कहा- सर यहां से निकलना पड़ेगा, हम बहुत खतरे वाली जगह पर आ गए। इसके बाद मैंने अमितजी को फोन लगाया और स्थिति के बारे में बताया कि मैं शायद यहां से निकल नहीं पाऊंगा। 10 मिनट के अंदर उन्होंने सीएस, पीएस सभी को अपनी भाषा में समझा दिया कि कैलाशजी को खरोंच भी नहीं आना चाहिए। 10-15 मिनट में अधिकारी आए और मुझे निकालकर ले गए। जब कार्यकर्ता काम करता है तो उसके पास उसके नेता की हिम्मत रहती है। अमित शाह वैसे ही नेता हैं।

प्रजातंत्र : जब आपने राजनीति में कदम रखा तब क्षेत्र-2 में भी ऐसी स्थिति थी कि भाजपा का कार्यकर्ता पार्षद का भी चुनाव जीत सके?

कैलाश विजयवर्गीय : उस समय कांग्रेस की सत्ता थी। क्षेत्र-2 में कृपाशंकर शुक्लाजी जैसे नेता चुनाव लड़ने आए थे। जनसंपर्क में मेरे साथ लोग नहीं चलते थे क्योंकि कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं का बोलबाला था लेकिन वह चुनाव भी मैं जीता था। क्षेत्र में मेरी माताजी (काकीजी) का बड़ा प्रभाव था। पूरी कॉलोनी के अंदर भजन, रामायण मंडल के कारण घर-घर में संपर्क था। लोगों के दिलों में राज किया था इसलिए मैं बहुत भारी वोटो से जीता था। लोगों के साथ खड़े रहे, उनके दिलों पर राज किया है, अच्छे-बुरे वक्त में साथ खड़े रहते हैं। इसलिए आज भी हम कहते हैं कि क्षेत्र-2 से कोई भी आकर लड़ ले, हमें कोई नहीं हरा सकता। मैं क्षेत्र-4 से चुनाव लड़ा और जीता वहां मैंने 50 हजार लोगों को पार्टी से जोड़ा। हम क्षेत्र-2 में आजादी के बाद कभी नहीं जीते थे। मुझे टिकट मिला और जीता भी। लोगों की इतनी सेवा की कि आज यह पार्टी का गढ़ हो गया।

प्रजातंत्र : बात लोगों की सेवा की है तो अभी लॉकडाउन में इंदौर बायपास पर भी आपने सीमावर्ती राज्यों से अपने प्रदेशों को लौटने वाले मजदूरों के लिए तमाम व्यवस्थाएं जुटा दीं।

कैलाश विजयवर्गीय : मुझे जब पता चला कि बायपास से बड़ी भारी संख्या में मजदूर गुजर रहे हैं और उनके पास खाने-पीने का सामान भी नहीं है तो मैंने रमेश मेंदोलाजी को साथ लिया और बायपास पहुंच गया। इसके बाद सेंधवा से लेकर गुना तक मैंने फोन करके अपने लोगों से कहा सभी दूर भोजनालय चलाओ। मप्र में इतनी सेवा मजदूरों की हुई इतनी कहीं नहीं हुई। इंदौर को बनाने में मैंने भी कुछ सेवा की लेकिन जब इंदौर की बदनामी होती है तो पीड़ा होती है। टाटपट्टी बाखल की घटना हुई तो मेरे पास अमेरिका और कनाडा से फोन आए। मैं दूसरे ही दिन गया। डॉक्टरों से बात की। मैंने मनोबल बढ़ाने का काम किया और कहा इंदौर देखना है तो बायपास पर देखें। कैसे शहर लोगों की मदद कर रहा है।

प्रजातंत्र : कैलाशजी की टीम को लेकर कहा जाता है कि कांग्रेस के शासनकाल में हो या फिर उमाजी के बाद वाले दौर में भाजपा में यह टीम एक तरह से विपक्ष में ही रही है। उस तरह का सपोर्ट नहीं मिलना क्या एक डर है या कॉम्पिटिशन रहता है? क्या कहेंगे इसे?

कैलाश विजयवर्गीय : ऐसा होता नहीं है लेकिन कई बार अधिकारी नेताओं को मिसगाइड करते हैं। ऐसे नेताओं को भी यह समझना चाहिए। एक-दो घटना से ऐसी गलतफहमी हो जाती है कि कैलाशजी से जुड़े व्यक्ति को सीएम प्रताड़ित कर रहे हैं। यह अफसरों की गड़बड़ी से होता है। मेरे और शिवराजजी की कैमेस्ट्री जबर्दस्त है। लोग समझ नहीं पाते। उन्होंने हमेशा मेरे मान-सम्मान का पूरा ख्याल रखा। मेरी अंतरंगता है उनसे और लॉकडाउन के दौरान कोई दिन ऐसा नहीं था जब हमारी बात न हुई हो। मेरे सभी सुझाव उन्होंने माने हैं।

प्रजातंत्र : जब आप इंदौर के मेयर थे, तब माना जाता था कि शहर के कांग्रेस नेताओं से ज्यादा दिग्विजसिंह सरकार में आपकी चलती थी।

कैलाश विजयवर्गीय : उस समय मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह और नगरीय प्रशासन मंत्री सज्जन वर्मा इंदौर के हर काम में अड़ंगा लगाते थे। फिर मैंने एक दिन दिग्विजयसिंह जी से कहा मुझे काम करने में बहुत परेशानी हो रही है। उसके बाद ऑक्ट्राय (क्षति-पूर्ति) का पैसा भी इन्होंने काटना शुरू कर दिया। मैं विधायक भी था, विधानसभा में हल्ला मचाया। कहा- भूख हड़ताल पर बैठूंगा। मैं बोल के निकल गया। विधानसभा खत्म हुई। मैं लौट रहा था, बैरागढ़ तक पहुंचा था कि मुख्य सचिव एवीसिंहजी का फोन आया कि आपने आज सीएम के लिए ठीक नहीं बोला। मैंने कहा- इंदौर का विकास करना है और मुझे बहुत परेशानी आ रही है। नगरीय प्रशासन मंत्री भी काम नहीं करने दे रहे तो उन्होंने कहा एक बार आज मुख्यमंत्रीजी से मिल लो। इसके बाद मैं आष्टा तक पहुंचा तो दिग्विजयसिंहजी का फोन आ गया। बोले- यार तुम बहुत गुस्सा करते हो। बोले- वापस आओ बात करते हैं। मैं पलट के गया उनसे लंबी बात हुई। मैंने कहा- जहां आपको लगे मैं बेईमानी करूं निगम के काम में शहर के विकास में तो आप मेरी गर्दन दबा देना पर मैं ईमानदारी से काम कर रहा हूं तो आप मेरी मदद करें। मुझे कहते हुए गर्व है कि उसके बाद उन्होंने आउट ऑफ वे जाकर शहर के विकास में मेरी मदद की। हमारे संबंधों में कभी खटास नहीं आई। मैं एक किस्सा बताता हूं। उस दौरान अटलबिहारी वाजपेयीजी राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। एक दिन प्रमोद महाजनजी का फोन आया कि इंदौर में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी मुझे देखना है। 20 दिन बचे थे। मैंने पूरे शहर के चौराहों और अन्य स्थानों का रंग-रोगन करवाते हुए रातों रात सड़कें बनवा दी। नेता प्रतिपक्ष छोटू शुक्ला ने मेरी सरकार को शिकायत की कि बिना टेंडर सारे काम कर लिए। शिकायत सही थी। काम में बेईमानी नहीं थी, लेकिन तकनीकी दृष्टि से दस्तावेज ठीक नहीं थे। वे चाहते तो मुझे फंसा सकते थे, मेरा मेयर पद जा सकता था, मगर उन्होंने शिकायत फाड़ दी। दिग्विजयसिंह में प्रवाह को मोड़ने की क्षमता है। उनकी प्रशंसा की बात करूंगा तो कई लोगों को बुरा लग जाएगा, लेकिन जब बाबा रामदेव चरम पर थे तब उन्होंने उनके खिलाफ दमदारी से मोर्चा खोला। पहली बार किसी राजनेता ने बाबा रामदेव को परेशान किया।

 

प्रजातंत्र : आखिर ऐसा क्यों हुआ, आपको क्या लगता है?

कैलाश विजयवर्गीय : मुझे लगता है सलाहकार गलत होंगे। मेरे उनसे पुराने संबंध हैं। वे इस प्रकार के व्यक्ति नहीं हैं लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद मप्र में उन्होंने जिस तरह से चुन-चुन के भाजपा कार्यकर्ताओं को टार्गेट किया। घर-दुकान, गुमटियां तुड़वाने का काम कभी किसी ने नहीं किया, इसी सरकार ने किया। मेरे मकान की नप्ती को लेकर एक निगम इंजीनियर मेरे पास आ गया, मैं कहा- शौक से करो लेकिन ऐसी राजनीत पहले कभी नहीं हुई। ये घिनौना काम किया और इसी नेगेटिविटी के कारण सरकार गिरी। ज्योतिरादित्य सिंधिया तक का सार्वजनिक रूप से अपमान किया जबकि उन्होंने चुनाव में सबसे ज्यादा सभाएं उनकी हुई और परिणाम लाए थे।

प्रजातंत्र : ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने के बाद आपकी उनसे बात हुई?

कैलाश विजयवर्गीय : मैं आज इस पर भी बोलता हूं। ज्योतिरादित्य सिंधिया जी से मेरे अच्छे संबंध हैं। मुझे अरुण जेटलीजी ने मेरी मित्रता करवाई थी। क्रिकेट से जुड़े इंदौर के लोगों ने मुझे इंदौर डिविजन का चुनाव लड़ने का आग्रह किया। बाद में उन्होंने एमपीसीए का चुनाव लड़ने को कहा। मैंने चुनाव लड़ा और वे सब लोग गायब हो गए। इस दौर में सिंधियाजी और मेरे संबंध वैसे नहीं रहे लेकिन पार्टी में आने के बाद उनसे बेहतर माहौल में अच्छी बात हुई।

प्रजातंत्र| जब शीर्ष पर होते हैं या जा रहे होते है तभी कोई ऐसी घटना घटती है जिससे लगता है कि कैलाश विजयवर्गीय के हाथ से फिर कोई बड़ी चीज आने से रह गई?
कैलाश विजयवर्गीय| मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ। मैं मानता हूं कि मेरे हिस्से में जो है उसे मैं संभाल के चलूं, अच्छा काम करूं और बेहतर परिणाम दूं। मेरा सपना और संकल्प यही रहा। ऐसा लोगों को जरूर लगता है कि मुझे कुछ मिलने वाला है और कोई घटना घट गई।

प्रजातंत्र| क्या कैलाशजी ने आकाश विजयवर्गीय को टिकट के लिए अपने वीटो पॉवर का इस्तेमाल किया?
कैलाश विजयवर्गीय| मैं इसे स्पष्ट कर देता हूं। मैंने सिर्फ अमित शाहजी से आकाश के टिकट की बात की थी और उन्हें कहा भी था कि मैं और किसी से यह बात नहीं कहूंगा। उन्होंने मुझे कहा- तुम लड़ो। मैंने कहा- मेरी प्राथमिकता अभी बंगाल के साथ है मैं वहां कि जनता के साथ न्याय नहीं कर पाउंगा। वीटो पॉवर जैसी कोई बात नहीं और न ही वीटो पॉवर जैसा मेरे पास कोई अधिकार है। आकाश के टिकट को लेकर मोदीजी मुझपर नाराज हुए वाली बात कहां से आई मुझे पता नहीं क्योंकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। प्रधानमंत्रीजी की सहमति से ही टिकट मिला। हां, आकाश को महू या क्षेत्र-3 से टिकट मिले इस पर बात जरूर हुई थी। एक बात मैं बड़ी जिम्मेदारी से कह रहा हूं कि जो क्षेत्र-3 का सर्वे था उसमें उषा ठाकुरजी की स्थिति ठीक नहीं थी इसलिए उन्हें महू से लड़ाए जाने की बात मैंने कही थी। किसी को पता भी नहीं मैंने वहां के चुनाव में अच्छा पैसा भी खर्च किया।

प्रजातंत्र|आपको मालवा की जिम्मेदारी थी लेकिन गड़बड़ आखिर कहां हुई कि हाथ से सरकार फिसल गई?
कैलाश विजयवर्गीय| कुछ ऐसे टिकट थे जिन्हें हमें बदलना थे। मैंने शिवराजजी से भी कहा था। चार-पांच सीटे थीं जहां के टिकट बदलना थे। व्यक्तिगत मोहमाया को छोड़कर जीतने वाले को टिकट देना चाहिए। हर जिले में एक टिकट ऐसा था जिसके कारण माहौल बिगड़ा और नतीजे गड़बड़ा गए।

प्रजातंत्र| आकाश विजयवर्गीय के बल्लाकांड के कारण कैलाश विजयवर्गीय के राजनीतिक कद पर कोई असर पड़ा?
कैलाश विजयवर्गीय| बिल्कुल भी नहीं। प्रधानमंत्रीजी ने नाराजगी व्यक्त की। तात्कालिक नाराजगी थी वे उस वक्त विदेश से आए थे। उन्हें सही बात की जानकारी नहीं थी लेकिन बाद में अमितजी ने उन्हें बता दिया था और विषय खत्म हो गया।

प्रजातंत्र| दिग्विजयसिंह और आपकी दोस्ती की तरह अगली पीढ़ी में आप आकाश विजयवर्गीय और जयवर्धनसिंह के बीच ऐसी ही दोस्ती चाहते हैं, ?
कैलाश विजयवर्गीय| हां, मैं तो चाहता हूं। देखिए- राजनीति में सौजन्यता बनी रहना चाहिए, व्यक्तिगत सबंध अच्छे होने चाहिए। मौजूदा समय में यानी कमलनाथजी की सरकार आने के बाद जरूर माहौल प्रदूषित हुआ है। कमलनाथजी ने बड़ा टार्गेट करके लोगों को हिट किया कि ये बीजेपी का कार्यकर्ता है, ये विरोधी पार्टी से जुड़ा है। उससे राजनीतिक द्वेषता नीचे तक पहुंची है। यह बहुत खतरनाक है। जहर डालने का काम किया उन्होंने।
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