पंजाब के चुनाव परिणामों में दिखा किसानों के असंतोष का असर

पंजाब की आठ नगर निगमों के चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी ने जो आश्चर्यजनक जीत हासिल की है उसने राज्य के तीन विपक्षी दलों भाजपा, अकाली दल और आम आदमी पार्टी को स्तब्ध कर दिया है। इन चुनावों में कांग्रेस अपनी शानदार सफलता पर फूली नहीं समा रही है।

-कृष्णमोहन झा, वरिष्ठ पत्रकार
कांग्रेस शासित राज्य पंजाब की आठ नगर निगमों के चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी ने जो आश्चर्यजनक जीत हासिल की है उसने राज्य के तीन विपक्षी दलों भाजपा, अकाली दल और आम आदमी पार्टी को स्तब्ध कर दिया है। इन चुनावों में कांग्रेस अपनी शानदार सफलता पर फूली नहीं समा रही है तो वह ऐसी खुशी मनाने का पूरा अधिकार है परंतु तीन विपक्षी दलों की उम्मीदों पर मतदाताओं ने जिस तरह पानी फेर दिया है उसके कारण ये दल अपनी इस स्तब्धकारी हार का कोई बहाना खोजने की स्थिति में भी नहीं रह गए हैं।

कांग्रेस पार्टी की शानदार जीत के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह यह दावा करने के भी अधिकारी बन गए हैं कि उनके नेतृत्व में राज्य की जनता का भरोसा पिछले तीन सालों में और मजबूत हुआ है इसीलिए नगर निगम चुनावों में अपनी पार्टी की शानदार विजय का श्रेय उन्होंने राज्य के मतदाताओं और कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं को दिया है। पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुनील जाखड़ कहते हैं कि नगर निगम चुनावों में पार्टी की इस शानदार जीत ने साबित कर दिया है कि यह जीत राज्य में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की अपार लोकप्रियता की परिचायक है इसलिए कांग्रेस पार्टी दो साल बाद होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में ही लड़ेगी । गौरतलब है कि पंजाब विधानसभा का पिछला चुनाव कांग्रेस पार्टी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में ही लड़ा था और सत्तारूढ़ भाजपा-अकाली गठबंधन को हराकर दस साल बाद भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की थी। अकाली दल-भाजपा की गठबंधन सरकार के पूर्व कैप्टन अमरिंदर सिंह ही राज्य में कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री थे।

नए कृषि कानूनों को लेकर अकाली दल ने गत वर्ष केंद्र में सत्तारूढ़ राजग से नाता तोड़ दिया था। इसलिए इस बार पंजाब के आठ नगर निगमों के इन चुनावों में भी भाजपा और अकाली दल के बीच कोई गठबंधन नहीं हुआ। दोनों के अलग-अलग चुनाव लड़ने का नुक़सान भी दोनों दलों को उठाना पड़ा। राज्य की आठ नगर निगमों में से सात पर कांग्रेस कब्जा करने में सफल रही जबकि गत चुनावों में राज्य की आठ नगर निगमों में से पांच पर अकाली दल-भाजपा का गठबंधन विजयी रहा था। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि अकाली दल के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के परिवार का गढ़ माने जाने वाले बठिंडा में भी कांग्रेस सेंध लगाने में सफल हो गई। गौरतलब है कि कांग्रेस ने 53 सालों के बाद यहां जीत दर्ज की है। सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और सांसद सनी देओल के क्षेत्र गुरुदासपुर में भाजपा को सबसे अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा जहां नगर परिषद की सभी 29सीटों पर उसके उम्मीदवार हार गए।

नए कृषि कानूनों के विरोध में राजग छोड़कर अपना राजनीतिक भविष्य दांव पर लगाने वाली क्षेत्रीय पार्टी अकाली दल को नगरीय निकाय चुनाव परिणामों में मिली हार ने यह संदेश दिया है कि किसानों के बीच अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने के लिए राजग छोड़ने का उसका फैसला उसे राज्य में किसानों का सबसे बड़ा हितैषी साबित नहीं कर सका। इन चुनावों में आम आदमी पार्टी भी यही उम्मीद लगाए बैठी थी कि नए कृषि कानूनों के विरोध में लंबे समय से आंदोलन कर रहे किसानों के असंतोष का चुनावी लाभ उसे अवश्य मिलेगा परंतु किसानों का असंतोष चुनावों में उनकी जीत सुनिश्चित करने में सहायक सिद्ध नहीं हो सका। अकाली दल को भी अब इस हकीकत का अहसास हो चुका है कि अगर उसने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा होता तो दोनों दलों को निराशा जनक हार का सामना नहीं करना पड़ता। नगरीय निकायों के चुनाव परिणामों पर भारतीय जनता पार्टी की यह प्रतिक्रिया निःसंदेह आश्चर्यजनक है कि केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों के आंदोलन का उसकी निराशाजनक हार से कोई संबंध नहीं है। असम के दौरे पर गए केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि इन चुनाव परिणामों को केंद्र सरकार के प्रति असंतोष का परिचायक नहीं माना जा सकता। केंद्रीय कृषि मंत्री का मानना है कि केंद्र सरकार ने किसानों के साथ निरंतर बातचीत का सिलसिला कभी नहीं टूटने दिया है ऐसे में पंजाब के ताजा चुनाव परिणामों को कृषि कानूनों के विरोध के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

सवाल यह उठता है कि क्या यह मान लिया जाए कि किसान आंदोलन के दौरान हुए इन चुनावों पर वर्तमान आंदोलन का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के इस तर्क की स्वीकार्यता पर भरोसा किया जाए तब तो भाजपा को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि पिछले तीन सालों में पंजाब की जनता का वर्तमान कांग्रेस सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों में भरोसा और मजबूत हुआ है। अगर ऐसा ही है तो फिर उसे अगले साल होने वाले विधानसभा सभा की तैयारी में उसे अभी से जुट जाना चाहिए। उसे यह भी ध्यान होगा कि अकाली दल अब उसके साथ नहीं है।

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