नेहरु के हर फैसले में देशहित सर्वोपरि

 

नेहरू प्रजातंत्र के महान समर्थक थे, उन्होंने इस देश में स्ववित व्यवस्थाएं और मशीनों का इतना मजबूत इंजन बनाया की गाड़ी में अगर ड्रायवर को कुछ हो जाये तो केवल ड्राइवर बदलने की जरूरत है गाड़ी बदलने की नहीं। उन्होंने मूलभूत ढांचे को बड़ी मजबूती दी।

नेहरु ने 5 जनवरी 1948 को मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता अब कमजोर हो गई है और सिर उठाने की हिम्मत नहीं कर सकती। वह पाकिस्तान के रूप में राष्ट्र स्वरूप काम कर रही है इसलिए भारत में जिस समस्या से हमे निपटना है, वह हिन्दू और सिख साम्प्रदायिकता है। इस घटनाक्रम में हिन्दू महासभा और आर.एस.एस दोनों शामिल हैं। आर.एस.एस साम्प्रदायिक है और यह हिंसक गतिविधियों पर आधारित है, उन पर लगाम लगाना जरूरी है।
28 जनवरी 1948 को नेहरू ने पटेल को लिखे पत्र में कहा था कि हिन्दू महासभा के मंच से बेहद अश्लील और असभ्य भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। हाल ही में हिन्दू महासभा के एक प्रमुख ने यह कहा कि नेहरू पटेल और आजाद को फांसी पर टांगने का लक्ष्य रखना चाहिए। हिन्दू महासभा के आव्हान पर पूणे, अहमद नगर और दिल्ली में सभाएं की गई जिसमें हिन्दू महासभा ने निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया। 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या हो गई। बापू के विदा होते ही नेहरू साम्प्रदायिक संगठन से आर पार की लड़ाई के मूड में थे और उनके साथ पटेल और आजाद खड़े थे।

5 फरवरी 1948 को नेहरू ने पटेल को पत्र लिखा-
‘‘आरएसएस के प्रमुख लोग भरतपुर और अलवर जैसी रियासतों में चले गए और अपने साथ प्रचुर मात्रा में सामान और हथियार ले गए। हमें इस विषय पर विचार करना चाहिए कि मुस्लिम नेशनल गार्ड, खाकसार तो निजी सेनाओं वाले आर.एस.एस के रूप से है। पटेल की तरफ से 6 फरवरी 1948 को जवाब आया। जिसमें पटेल ने कहा, मैं आपसे सहमत हूं कि मुस्लिम तथा हिन्दू हिंसक संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। सरदार पटेल गृहमंत्री थे अतएव उन्होंने कवायद, परेड और सैनिक तथा अर्धसैनिक वर्दी पहनने पर रोक लगाने का आदेश दे दिया है और ऐसी संस्थाओं पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस प्रकार नेहरू और पटेल दोनों इस विचार के थे के मुस्लिम एवं हिन्दू सैनिक संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।

चीन के हमले से पहले की स्थिति : नेहरू प्रजातंत्र के महान समर्थक थे, उन्होंने इस देश में इतनी विशाल स्ववित व्यवस्थाएं और मशीनों का इतना मजबूत इंजन बनाया की गाड़ी में अगर ड्रायवर को कुछ हो जाये तो केवल ड्राइवर बदलने की जरूरत है गाड़ी बदलने की नहीं। अतएव मूलभूत ढांचे को बड़ी मजबूती दी।

मुल्क में तानाशाही न हो इसलिए विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका संविधान के तीनों अंगों के बीच ताकत का ऐसा बंटवारा किया कि तीनों में से कोई अपने को सर्वोच्च नहीं समझ सका। मुल्क में सैनिक तानाशाही न आ सके इसलिए उन्होनें सेना को सरहद तक ही सीमित रखा। आबादी के बीच काम करने के लिए उन्होंने पुलिस से काम लिया। उन्होंने यह भी आवश्यक समझा कि सेना की रचना इस प्रकार हो कि कोई भी एक कमाण्डर सर्वशक्तिमान न हो सके, नेहरू ने पंचायत राज कायम करके ग्राम पंचायत के अधिकारों का बंटवारा किया और सत्ता का विकेन्द्रीकरण किया।

सन् 2014 से सेना में हस्तक्षेप किया गया। 5-6 जूनियर जनरल विपिन रावत को सेनाध्यक्ष बनाया, ले. जनरल को प्रभावित किया। हाल में चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ का पद निर्मित कर उस पर जनरल रावत को बिठाया गया।
देश के भीतर जो राजनैतिक प्रक्रिया से चुने हुए लोग सत्ता में आते हैं, वो पारदर्शी ढंग से काम कर सकें इसलिए उन्होंने निर्वाचन आयोग की स्थापना की। बैंकों के नियंत्रण के लिए रिजर्व बैंक बनाया, सरकार की आय-व्यय का ऑडिट करने के लिए नियंत्रक एवं महालेखाकार जैसी संस्था बनाई।

भारत चीन युद्ध 1962 – हार के कारण : नेहरू विकास का एक ऐसा मॉडल बनाकर चल रहे थे जिसमें मदद करने के लिए सोवियत संघ और अमेरिका दोनों शामिल थे। भाखरा नांगल का ठेका यदि अमेरिका को मिला है तो भिलाई स्टील प्लांट का निर्माण सोवियत संघ ने किया है। नेहरू ने रमन संस्थान, भाभा संस्थान जैसे न्यूक्लियर एनर्जी की योजनाओं को बनाया। वे शांति के लिए और विश्व शांति के लिए कटिबद्ध थे।

नेहरू का ये ख्याल रहा कि किसी सेना के लिए तिब्बत और हिमालय को पार करके भारत में घुसपैठ करना कठिन था, उसका कारण था वहां का सख्त मौसम। तिब्बत में भारत की स्थिति को लेकर चीन सरकार से बातचीत हुई थी और तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद कोई आगे हमले का प्रश्न नहीं था।

उत्तर और दक्षिण कोरिया के युद्ध में भारत ने बीच -बचाव करके सोवियत संघ और अमेरिका से सम्मान पाया था उससे चीन बेचैन हुआ। इधर 1959 में दलाई लामा ने भारत में तिब्बत की निर्वाचित सरकार बना ली। ये सब ऐसी परिस्थितियां थीं जिससे चीन भारत से नाराज हो गया था। भारत और चीन का जो युद्ध हुआ उसमें भारत हारा। नेहरू ने इस हार को हीन भावना से न लेते हुए एक दार्शनिक की तरह इसका विश्लेषण किया।

नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को लिखे दिनांक 22 दिसम्बर 1962 के पत्र में इसकी समीक्षा की-
हमारी हार की मुख्य वजह लड़ाई के मैदान का चयन रहा। जहां पर हमें चीन से लड़ना पड़ा वो दुश्मन की फायदे की जगह थी और हमारा नुकसान हो गया। इस जगह तक सड़क या अन्य सम्पर्क मार्ग से कोई साधन नहीं पहुंचाया जा सकता था बल्कि हमको हवाई जहाज से हथियार, रसद और कपड़े गिराना पड़ते थे। दूसरी और चीन के बार्डर के उस ओर सड़कों का नेटवर्क था।

अगर हम सैनिक नजरिये से देखें तो हमें हमारी रक्षा पंक्ति ऐसी जगह चुनना चाहिए था जहां पर हमारे सप्लाई सेंटरों को कम से कम सड़क मार्ग से जोड़ दिया गया हो। ऐसा करने का मतलब था कि हमें हमारी सरहद से पीछे आना पड़ता और चीनियों को बिना लड़ाई के आगे बढ़ने का मौका मिल जाता। ये बात बुद्धिमानी की थी किन्तु सम्मानजनक नहीं होती।

हमारा दूसरा नुकसान यह रहा कि हमें हमारी सेनाओं को अचानक समुद्र तल से 14 हजार फीट की ऊॅंचाई पर भेजना पड़ा जहां पर उसे पर्वतों पर रहने का अनुभव नहीं था उसे सिरदर्द, अनिद्रा और शरीर में जड़ता महसूस होने लगी थी। भारतीय सैनिकों को उस वातावरण से तालमेल बैठाने में समय लग रहा था और चीनी सैनिक व फौज हमारी यह सरहद पार करके घुस आए थे। घटना घट जाने के बाद होशियार बनना आसान है और जो कुछ भी हुआ उसकी आलोचना करना तो और भी आसान है।
दुनिया के उस समय दो बड़े ब्लॉक्स या खेमों के बीच शीत युद्ध के हालात थे। दोनों के बीच संतुलन न होने की दशा में परमाणु युद्ध जैसे हालात बन जाते और तबाही को न्यौता दिया जा सकता था। नेहरू ने यह संतुलन बनाने के लिए एक गुटनिरपेक्ष खेमा बनाया, जिससे ये संतुलन को कायम रखा जा सके। इसका मूल मंत्र था शांति और सह अस्तित्व।

भारत चीन युद्ध में दोनो देशों की अलग-अलग भूमिकाएं थी एक तरफ चीन था जो कह रहा था कि परवाह नहीं, कुछ करो मर जाओ तो भी करोड़ों बचे रहेंगे। चीन के सैनिकों को यह भी आदेश था कि अगर वो वापस लौट कर आये तो उन्हें गोली मार दी जाएगी। दूसरी तरफ नेहरू थे जो अपने एक भी आदमी को मौत के मुंह में ढकेलने को तैयार नहीं थे।

चीन के आर्थिक हालात बहुत खराब थे और इनसे निपटने के लिए सोवियत संघ चीन की मदद नहीं कर रहा था, क्योंकि सोवियत संघ का झुकाव भारत की ओर था। सोवियत संघ को अपने पाले में लाने के लिए चीन ने यह हमला किया था। चीन और सोवियत संघ एक-दूसरे की नीतियों की निंदा करते थे और दोनों अलग-अलग नीतियों का संचालन करते थे। चीन उस समय भी अविकसित देश था। चीन ये जानता था कि ताकत औद्योगिक विकास से आती है और ये कठिन और धीमी प्रक्रिया है। सोवियत संघ और चीन में इस हद तक मतभेद था कि रूस ने चीन को विकास में मदद करने से इंकार कर दिया था और अपने सभी टेक्निशियन और एक्सपर्ट वापस बुला लिए थे।

भारत गुट निरपेक्ष देशों का मुखिया था क्योंकि सबसे पहले वही आजाद हुआ था मगर चीन चाहता था कि भारत को किसी तरह अपमानित किया जाए और उसे हराया जाए और ऐसी परिस्थितियों में अमेरिकी कैम्प में धकेला जा सके। इसका परिणाम यह होगा कि रूस की नीति चीन के प्रति बदल जायेगी और वो चीन को मदद करने के लिए मजबूर होगा। चीन की सरकार पर चरमपंथी नेताओं का कब्जा था और उनका विचार था कि जबतक इस तरह का कदम नहीं उठाया जायेगा चीनी तरक्की की रफ्तार धीमी ही रहेगी। अतएव भारत को रोकने के लिए यह जरूरी था कि उसे सोवियत संघ की मदद न मिले इसलिए चीनी हमला किया गया।

आलोचना करने वालों को देशद्रोही नहीं कहा गया : चीन से युद्ध हारने के बाद नेहरू ने अपने प्रचार तंत्र को इस काम में नहीं लगाया कि हार को जीत में घोषित कर दिया जाए और हार की आलोचना करने वाले को गद्दार या देशद्रोही घोषित कर दिया जाए।
नेहरू ने 15 अगस्त 1963 को लालकिले से अपना अंतिम भाषण पढ़ा। उन्होंने कहा कि पिछले साल जिस मुल्क को दोस्त समझते थे उसने बड़ा हमला किया। हम हारे इसकी तकलीफ हुई लेकिन एक अच्छा नतीजा भी हुआ कि उसने सारे मुल्क में हर तरफ जोश और कुर्बानी की भावना को जागृत किया। लोगों ने पैसा, कौड़ी, सोना-चांदी सभी युद्ध के लिए दिया। लोग आपसी झगड़े भूल गए, एकता की हवा चली, हमारी हिम्मतें बढ़ी, ताकतें बढ़ी और हमने कोशिश कि की मुल्क को जल्दी से तैयार करें।

मुल्क को तैयार करने का मतलब है सामान बनाना, कारखाने बनाना जिनमें फौजी सामान का उत्पादन हो, हवाई जहाज और उसके कारखाने बनाना, अनाज ज्यादा पैदा करना, उपयोगी वस्तुओं का सामान बनाना। इस तरह हर एक आदमी अपना अपना फर्ज अदा करे, जिससे हमारी आर्थिक हालात मजबूत हो। पुरानी गफलत फिर आने लगी थी लोग एकता को भूलने लगे थे पूराने झगड़ों को हवा दी जाने लगी। आपका हमारा काम है कि मुल्क को बनाएं, उसके बाद फिर और बाते आती हैं। जो देश अपनी आजादी, अपनी जमीन को नहीं बचा सकता उसकी कदर दुनिया में कौन करेगा और तरक्की करने की उसकी ताकत क्या होगी?

चीन ने भारत से जंग इसलिए की थी कि भारत इस या उस गुट में शामिल होने को मजबूर हो जाये लेकिन युद्ध के बाद भी नेहरू गुटनिरपेक्षता की नीति पर कायम रहे।
जब सरहद पर चीन द्वारा किया गया बड़ा हमला हुआ उसके बाद हमें कई बातें ऐसी करना पड़ी जो हमे अच्छी नहीं लगती थी लेकिन हम करने को मजबूर हो गए। हमें फौज पर दुगने से भी ज्यादा खर्च करना पड़ा और टैक्स लगाकर यह खर्च जमा करना पड़ा। टैक्सेस बढ़ाना न देने वाले को, न बढ़ाने वाले को अच्छा लगता है लेकिन जब मुल्क खतरे में हो तो दो चार पैसे बचाना कोई मायने नहीं रखता। खतरा आए और खतरों से निपटने के लिए चाहे हम मिट भी जाएं तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन हिन्दुस्तान को आंच नहीं आना चाहिए, उसे बचाना ही होगा।

चीन से भारत युद्ध में हारने के बाद नेहरू कहीं छिपे नहीं, न नेहरू ने जनता से आंखे चुराई, हार का सबक लेकर खड़े हुए थे।

15 अगस्त 1963 को लालकिले से भाषण देने के पश्चात् भारत के इतिहास में एक काला दिन आया जब 27 मई 1964 को 17 साल प्रधानमंत्री रहने और 74 साल की उम्र में गांधी का लाल जवाहर दुनिया से अलविदा कह गया। सुबह 06:20 पर दिल का दौरा पड़ा और उनका देहांत हो गया। 10 साल तक अंग्रेजों की जेल में कैदी रहने के बाद और तीन दशक तक भारत की आजादी का सिपाही गांधी का उत्तराधिकारी, तीन मूर्ति भवन में मृत्यु को प्राप्त हुआ। 15 अगस्त 1947 को ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टेनी’ से इस देश को आजादी दिलाने वाला और इस राष्ट्र का निर्माता 27 मई 1964 को नियति के हाथों में त्रिमूर्ति भवन से जमुना के किनारे पंचतत्व में विलीन होकर भारत की मिट्टी में मिल गया। यह तो इतिहासकार बताएंगे कि क्या नेहरू ने किया और क्या नहीं किया? नेहरू का फर्ज था आगे देखने का न कि पीछे देखने का और हमारे कानों में आज भी आवाज आती है और नेहरू पुकार कर कह रहे हैं कि जो काम मैंने अधूरा छोड़ा है उसे पूरा करें, नेहरू अपने मुंह से न अपनी तारीफ करते थे और न अपने देश की तारीफ करते थे बल्कि दूसरे मुल्कों के मुंह से तारीफ सुनना पसंद करते थे।

admin