राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज में समग्र राष्ट्र का रखा ध्यान

आनंद मोहन माथुर

जब जन गण मन को राष्ट्रगान बनाने का विचार चल रहा था तो उस समय नेहरू के पास एक सुझाव आया कि चूंकि सिंध पाकिस्तान में चला गया है इसलिए सिंध की जगह ‘आसाम’ जोड़ दिया जाए। नेहरू ने उत्तर में कहा कि देश में आगे चलकर और भी राज्य बनेंगे इसलिए हमें इस गान की मूल भावना को समझना चाहिए और असम को राष्ट्रगान में शामिल नहीं करना चाहिए।

नेहरू अपनी चिंतन के अनुसार मुल्क को समझाते रहे कि राष्ट्र के असली मायने क्या हैं। वे लाल किले की प्राचीर पर खड़े होकर न छाती ठोंकते थे, न छाती पीटते थे, न कोई घोषणा करते थे। वे वे वहां खड़े होकर हिन्दुस्तानी परिवार के मुखिया की हैसियत से अपने मुल्क से संवाद करते थे, समझाइश देते थे और प्यार से डांट-डपट भी करते थे।

15 अगस्त 1962 को रक्षाबंधन था लालकिले से नेहरू ने कहा कि भारत माता को राखी बंधाई। आगे उन्होंने कहा कि हम एक दूसरे को राखी बांधते हैं राखी एक दूसरे की वफादारी की, एक दूसरे की हिफाजत करने की निशानी है। आज आप राखी अपने दिल में भारत माता को बांधिये और प्रतिज्ञा दोहराइए कि आप उसकी सेवा करेंगे, रक्षा करेंगे। हम चाहे कुछ भी हों, भारत के माथे पर दाग नहीं लगने देंगे। नेहरू पूछते थे कि भारत की सेवा करने के मानी क्या है। भारत कोई एक तस्वीर नहीं है हमारे दिल में तस्वीर है। भारत के रहने वालों की सेवा करना का मतलब है जनता की सेवा करना, बहुत दिन से दबी हुई जनता की सेवा करना। अपने दिल में ये याद रखें कि हमारा पेशा चाहे जो कुछ हो सभी के लिए एक छोटा सा अलग काम है वह है भारत की सेवा का और उसके मानी है अपने पड़ोसियों की सेवा, अपने मुल्क वालों की सेवा चाहे, वह किसी मजहब का हो अगर हिन्दुस्तानी है तो हमारा भाई है। आप छोटे-छोटे झगड़ो और बहसों में न पड़ें, राय अलग अलग हो सकती है और होना भी चाहिए लेकिन एक बात पर अलग राय नहीं हो सकती, वह है हिन्दुस्तान की हिफाजत अगर हमने थोड़ी-थोड़ी सेवा की तो हम एक पहाड़ खड़ा कर सकते हैं जो भारत का विकास करेगा यह पहाड़ भारत की हिफाजत करेगा।

नेहरू ‘भारत माता’ क्या है यह जनता को अपनी जिंदगीभर समझाते रहे। क्योंकि साम्प्रदायिक ताकतों का दुष्प्रचार था, ‘भारत माता’ एक पुतला है जो शेर पर बैठी है और त्रिशूल से राक्षस को मार रही है
‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान बनाना : नेहरू की अगवानी में जन गण मन सबसे पहले 27 दिसम्बर 1911 को कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया था और ये पहली बार 1912 में एक पत्रिका में ‘भारत विधाता’ नाम से प्रकाशित हुआ था। इसके बाद कांग्रेस के हर आयोजनों में ये गाया जाने लगा। सन् 1948 की बात है देश आजाद हो चुका था लेकिन उसके पास उसका अपना कोई राष्ट्रगान नहीं था। इसका फैसला संविधान सभा को करना था।

राष्ट्रगान का चुनाव करते समय नेहरू कितनी सारी बातों पर विचार कर रहे थे। हमें जल्दी अपना राष्ट्रगान तय करना होगा लेकिन कुछ फोरी इंतजाम भी करना होंगे, क्योंकि अक्सर ऐसे अवसर आते हैं जब राष्ट्रगान बजाना जरूरी हो जाता है। विदेशों में हमारे दूतावासों में और प्रतिनिधि मंडलों को खास मौके पर राष्ट्रगान बजाना होता है, इसलिए जरूरी हो गया है कि हम फोरी तौर पर एक राष्ट्रगान तय करें। उस समय देश के सामने ‘जन गण मन’ और ‘वंदेमातरम’ दो विकल्प थे। नेहरू का कहना था कि अभी सेना के बैंड भारत और विदेश में सरकारी कार्यक्रम में ‘जन गण मन’ ही बजा रहे हैं। राष्ट्रगान शब्दों का ही एक रूप है लेकिन वह उससे बढ़कर एक धुन या म्यूजिकल स्कोर है, जिसे आर्केस्ट्रा और बैंड अक्सर बजाते हैं, इसलिए संगीत राष्ट्रगान का जरूरी हिस्सा है। राष्ट्रगान को जीवन तथा राष्ट्र की गरिमा से भरपूर होना चाहिए तथा छोटे या बड़े आर्केस्ट्रा और सेना के बैंड और पाइप इसे ढंग से बजा सकें और उसकी धुन ऐसी हो की सब दूर इसकी प्रशंसा की जाए। पिछले कुछ महिनों में विदेश और भारत में आर्केस्ट्रा और बैंड ने इसकी धुन बजाई, जिसकी खूब सराहना हुई।

लंदन फिल्हार्मोनीक सोसायटी है। दुनिया का बेहतरीन संगीत संस्थान है, एक भारतीय संगीतकार इस सोसायटी को सलाह देने के लिए नियुक्ति भी किया है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसका मौजूदा स्वरूप सुभाषचन्द्र बोस ने तैयार किया था। नवम्बर 1943 में सुभाषचन्द्र बोस ने आबिद हसन के साथ मिलकर बंगला में रचित जन गण मन को ‘हिन्दुस्तानी’ में अनुवाद किया। इसका संगीत आजाद हिंद फौज के कैप्टन रामसिंह ने कम्पोज किया। गीत के शब्द और संगीत कैप्टन ने इस तरह बनाया कि इसमें फौज की जरूरत के हिसाब से रवानी, तेजी और जोश आए। ‘जन गण मन’ की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यह है कि इसका एक संस्करण आजाद हिंद फौज ने तैयार किया था और उसे इस्तेमाल किया। इसकी धुन ने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को अपने प्राण न्योछावर करने के लिए तैयार किया। इसे आजाद हिंद फौज ने उनके उत्सवों में और उचित अवसरों पर बजाया। राष्ट्रगान किसी भी स्थिति में 45 सेकंड या 1 मिनट से ज्यादा न बजाए जाए, इसका मानकीकरण किया जाए, विशेष मौकों पर बजाया जाए और इसे हल्केपन से न लिया जाए। जब ये बजाया जाए तो अपने स्थान पर बिना हिले-डुले खड़े होकर इसे सम्मान दिया जाए। जब फ़ौरी तौर पर इसे राष्ट्रगान बनाने का चल रहा था तो उस समय नेहरू के पास एक सुझाव आया कि चूंकि सिंध पाकिस्तान में चला गया है इसलिए सिंध की जगह ‘आसाम’ जोड़ दिया जाए। नेहरू ने उत्तर में कहा कि देश में आगे चलकर और भी राज्य बनेंगे तथा ये बात भी महत्वपूर्ण है कि इसमें न बिहार का उल्लेख है न उत्तरप्रदेश का जबकि नेहरू खुद यूपी के थे, क्या ये दोनों बड़े राज्य नहीं हैं? इसलिए हमें इस गान की मूल भावना को समझना चाहिए और असम को राष्ट्रगान में शामिल नहीं करना चाहिए।

नेहरू राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बारे में सम्रगता से सोच रहे थे और दुनिया के श्रेष्ठ संगीतकारों से सलाह ले रहे थे।
नेहरू जन गण मन के संबंध में एक किस्सा बयान करते थे। 1947 के अक्टूबर में एक अंतराष्ट्रीय समारोह के दौरान संयुक्त राष्ट्र की बैठक के समय जो वॉलडोर्फ स्टोरीया होटल में यह बजाया गया था। इसकी धुन ने सनसनी मचा दी और बहुत से देशों के प्रतिनिधि ने कहा कि अभी तक जितनी भी राष्ट्र धुनें सुनी हैं उनमें ये सबसे बेहतर है। इस घटना के बाद इसका रिकार्ड मंगवाया गया और सेना को सलाह दी गई कि इस बैंड का अभ्यास करे। अब ये राष्ट्रगान थल सेना, जल सेना और वायु सेना तीनों में बजाया जाने लगा। नेहरू आगे ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान बनाने की कहानी सुनाते हैं, 25 अगस्त 1948 को संविधान सभा में इस कहानी के तथ्य है ‘‘1947 में न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में राष्ट्रगान का मुद्दा अचानक उठा और हमारे प्रतिनिधिमंडल को राष्ट्रसंघ ने राष्ट्र धुन उपलब्ध करवाने के लिए कहा, जिसे महासभा में बजाया जाना था। प्रतिनिधिमंडल के पास ‘जन गण मन’ का एक रिकार्ड था उन्होंने वो रिकार्ड वहां मौजूद आर्केस्ट्रा को दे दिया जब आर्केस्ट्रा वालों ने महासभा के सामने बजाया तो इसकी बहुत तारीफ की गई। लोगों ने इसके म्यूजिक को गरिमा पूर्ण समझा और महासभा में बजाए गए रिकार्ड को भारत भेज दिया गया। इस प्रकार ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान बन गया और 24 जनवरी 1950 को भारत के संविधान में जनगणमन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया।

नेहरू और तिरंगा-राष्ट्रध्वज की कहानी : जहां तक तिरंगे राष्ट्र ध्वज का सवाल है तो इसके तीन रंग भारत के हजारों साल के इतिहास, उसकी शांति और अमन की परंपरा और आजादी के प्रतीक हैं। यह समझना कि केसरिया हिन्दुओं का प्रतीक है और हरा मुसलमानों का प्रतीक है तो यह बहुत बड़ी गलतफहमी है। नेहरू ने 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा में प्रस्ताव पेश किया कि भारत का राष्ट्रधवज तिरंगा होगा, जिसमें गहरा केसरिया, सफेद और गहरा हरा रंग बराबर अनुपात में होगा, बीच में सफेद पट्टी में नीले रंग का चक्र होगा और उसकी डिजाइन सारनाथ में रखी अशोक के चक्र जैसी होगी। झण्डे की चौड़ाई और लंबाई 2.3 का अनुपात होगा।
नेहरू ने आगे कहा: ‘‘मुझे याद है और इस सदन में मौजूद बहुत से लोगों का याद होगा कि झंडे को हम न सिर्फ जोश से देखते थे बल्कि इसे देखकर हमारी नसें फड़कने लगती थी। जब हमारे हौसले पस्त होते थे और कंधे झुक जाते थे तब इस झंडे को देखकर हमें आगे बढ़ने का हौसला मिलता था, तब हममें से बहुत से लोग जो यहां मौजूद हैं और बहुत से हमारे साथी जो इस दुनिया में नहीं हैं वे इस झंडे को मजबूती से पकड़े रहे और कई तो इतनी मजबूती से थामे रहे कि जब गिरने लगे तो दूसरे हाथों में इसे थमा दिया ताकि हमारा झंडा झुकने न पाए। इस तिरंगे के लिए नेहरू ने लाठियां खाई और कांग्रेस के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने हॅंसते हुए लाठियों का प्रहार सहा था। जब साइमन कमीशन आया और उसका विरोध हुआ और पुलिस की लाठियों से लाला लाजपतराय की मौत हो गई और साईमन कमीशन ने लखनऊ जाने का प्रोगाम बनाया तो विरोध जुलूस निकालने का फैसला हुआ। 16-16 कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का जत्था हाथ में तिरंगा लेकर जुलूस निकालेगा और उसका नेतृत्व नेहरू करेंगे। जब जत्था आगे बढ़ रहा था तो घोड़ों की टाप सुनाई दी और पुलिस वालों ने स्वयंसेवकों की जबरदस्त पिटाई शुरू कर दी। नेहरू सड़क के बीचोंबीच तिरंगा लिए अकेले खड़े थे उसी समय एक घुड़सवार पुलिस वाला उन पर टूट पड़ा। नेहरू ने उससे कहा ‘‘लगाओ’’, पुलिस वाले ने डंडा चलाया, नेहरू का सिर तो बच गया लेकिन पीठ में दो तगड़े वार पड़े, उनका सिर घूम गया लेकिन वे अपनी जगह खड़े रहे और हाथ में तिरंगा थामे रहे।’’

तिरंगे की शान को जुबान से नहीं बल्कि शरीर पर चोटों के निशान से निभाने वाले नेहरू ने संविधान सभा में कहा:
‘‘मैं ये झंडा आपको पेश करता हूं और भरोसा करता हूं कि आप इसे स्वीकार कर लेंगे। एक तरह से देखा जाए तो ये झंडा लोक स्वीकृति और इस्तेमाल के दम पर दशकों पहले से स्वीकृत है। असल में हमको उस लोक स्वीकृति पर ही औपचारिक मोहर लगाना है।

हमने ऐसे झंडे के बारे में सोचा जो, पूरे तौर पर और अपने हर हिस्से से एक मुल्क के जज्बे का इजहार करे, उसकी परंपराओं का इजहार करे। एक ऐसी मिलीजुली भावनाओं और परंपराओं को खुद में समेटे, जो हजारों साल की यात्रा में हिन्दुस्तान में फली फूली।

ये झंडा बहुत सी चीजों का प्रतीक होगा, ये झंडा दिलोदिमाग से जुड़ी हर एक चीज का प्रतीक होगा जिसने इंसान और मुल्क की जिंदगियों को इज्जत बख्शी है।’’ संविधान सभा में रोम-रोम हिला देने वाला क्षण तब आया जब नेहरू अपने हाथ में झंडा लिये खड़े हो गये।

भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी बार-बार इस झंडे की बात करते हैं लेकिन उन्होंने तो बचपन से भगवा ध्वज ही फहराया है और उसी को उन्होंने प्रणाम किया है। ये वही झंडा है जो 1947 के बाद से आरएसएस के प्रमुख कार्यालय नागपुर में अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने तक लगा रहा, तिरंगा झंडा नहीं फहराया गया। इस झंडे को आरएसएस के कार्यालय में तिरंगा तब फहराया गया जब प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी आरएसएस कार्यालय में आरएसएस प्रमुख से मिलने पहली बार आए। ना तो इनको इस झंडे का कोई सम्मान है और न इन्होंने दिल से उसे अपनाया है। आज भी तिरंगे के साथ-साथ भगवा ध्वज आरएसएस की इमारत पर फहराया जाता है। इसका कारण इनके दिल में तो भगवा झंडा बसा हुआ है लेकिन सत्ता चखने के बाद ये आवश्यक हो गया कि तिरंगे का सम्मान करें। इस सरकार की जितनी भी गतिविधियां हैं, उनसे जाहिर होता है कि ये भारत को हिन्दू राष्ट्र की तरफ ले जाना चाहते हैं और इनके सीने में भगवा ध्वज अभी भी बसा है। इनकी इस सोच का खमियाजा इस देश को और आने वाली नस्लों को कब तक भुगताना पड़ेगा कोई नहीं जानता।

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