22 वर्षीय घोड़े रियो को मिला प्रशंसा पत्र, भारतीय सेना में है इसका अहम योगदान

नई दिल्ली । पिछले 18 वर्षों से गणतंत्र दिवस परेड में शामिल हो रहे भारतीय सेना के सबसे अनुभवी घोड़े को सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने रविवार को प्रशंसा पत्र से सम्मानित किया। 22 वर्षीय घोड़े रियो को यह सराहनीय पदक दिल्ली कैंट के करियप्पा ग्राउंड में आयोजित एक समारोह में दिया गया। भारतीय सेना की इस रेजिमेंट ने अब तक 39 बैटल ऑनर्स जीते हैं और अश्वारोही एवं पोलो में प्रशंसा हासिल की है।​

भारतीय सेना की 61 कैवलरी रेजिमेंट का 22 वर्षीय रियो पहला घोड़ा है जिसे दुनिया में एकमात्र सक्रिय घोड़ा रेजिमेंट का पुरस्कार मिला है। गणतंत्र दिवस की परेड में हिस्सा लेने वाली ​​61 कैवलरी रेजिमेंट का रियो पिछले 16 वर्षों से मार्चिंग दस्ते का कमांडर भी है। सेना से आमतौर पर घोड़े को 22 साल की उम्र में सेवानिवृत्त कर दिया जाता है लेकिन रियो अपनी सतर्कता और तेज प्रतिक्रिया के चलते इस परिपक्व उम्र में और मजबूत होता जा रहा है, इसलिए अभी भी उसकी सेवाएं बरकरार हैं। 61 कैवेलरी दुनिया में एकमात्र सक्रिय सेवारत घुड़सवार रेजिमेंट है। इस रेजिमेंट को 1 अगस्त, 1953 को छह राज्य बलों के साथ एकीकरण किया गया था। इस रेजिमेंट ने अब तक 39 बैटल ऑनर्स जीते हैं और इक्वेस्ट्रियन और पोलो में प्रशंसा हासिल की है।

सेना सूत्रों के अनुसार इस रेजिमेंट ने अब तक एक पद्मश्री, एक सर्वोत्तम जीवन रक्षा पदक, 12 अर्जुन अवार्ड, छह विशिष्ट सेवा पदक, 53 आर्मी स्टाफ कमेंडेशन, एक चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी कमिशन, दो चीफ ऑफ नेवल स्टाफ कमेंडेशन, आठ वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कमेंडेशन, आठ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ कमेंडेशन और 180 जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ कमेंडेशन हासिल किये हैं। इस रेजिमेंट ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1918 में इज़राइल में हाइफा की लड़ाई में भाग लिया था। हर साल 23 सितम्बर को मैसूर और जोधपुर के भारतीय घुड़सवार रेजिमेंटों को श्रद्धांजलि देने के लिए हाइफा दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिसने 1918 में तुर्की, जर्मन और ऑस्ट्रियाई सेनाओं की एक संयुक्त और बहुत बड़ी ताकत को हराकर हाइफा को मुक्त करने में मदद की थी।

भारत-पाक के बीच 1965 के युद्ध के दौरान 61वीं कैवलरी को राजस्थान के गंगानगर सेक्टर में तैनात करके लगभग सौ किलोमीटर क्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई थी जिसके​​ बाद घुसपैठ के कोई मामले सामने नहीं आए थे। 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान इसे राष्ट्रपति भवन की रक्षा करने के लिए तैनात किया गया था। इसके अलावा 1989 में ऑपरेशन पवन, 1990 में ऑपरेशन रक्षक, 1999 में कारगिल में ऑपरेशन विजय, 2001-2002 में ऑपरेशन पराक्रम के दौरान भी इस रेजिमेंट ने योगदान दिया।

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