यह विडम्बना है कि समाज ने चार्ली चैपलिन को कभी विचारक के तौर पर नहीं स्वीकारा – मुकेश तिवारी

विभव देव शुक्ला

हर अभिनेता के लिए अलग-अलग तरह के किरदार निभाना सबसे बड़ी चुनौती होती है लेकिन कुछ अभिनेता ऐसी खासियत के लिए ही मशहूर होते हैं। फिल्मी दुनिया का एक ऐसा ही अनोखा नाम हैं, मुकेश तिवारी जिन्होंने जागीरा (चाइना गेट) से लेकर वसूली भाई (गोलमाल) तक का किरदार निभाया।
कई तरह के किरदार निभाने से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा ‘सबसे बड़ी बात यही है कि एक कलाकार अपनी तय छवि से कितना प्रेम करता है?’ किसी भी कलाकार के लिए सबसे अहम है कि वह अपनी तय छवि से हट कर कितना काम करता है। इसे और सरल शब्दों में कहें तो कलाकार को खुद से कम प्रेम करना होगा और कला से ज़्यादा।
हमारे समाज की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि हम गम्भीर किरदारों से डरते हैं और मज़ाकिया किरदारों की बेइज्ज़ती करते हैं। लोगों का नज़रिया ही कुछ ऐसा है कि ‘जागीरा’ बोलने से पहले एक व्यक्ति सोचता है लेकिन वसूली भाई कोई भी पीछे से बोल कर निकल जाता है। आज तक चार्ली चैपलिन को किसी ने एक गम्भीर विचारक के तौर पर नहीं स्वीकारा जबकि असल में उन्होंने जितना सोचा उतना बहुत कम ही अभिनेता सोच पाते हैं।

क्या कुछ सिनेमा में नहीं रह गया
इसका एक और बुरा पहलू है, जब से सिनेमा में व्यापार का दखल बढ़ा है तब से सिनेमा के मिजाज़ में बहुत बदलाव आया है। फिल्मों से माँ-बाप खत्म हो गए, बुआ खत्म हो गईं, मौसी, भाभी और सौतेले भाई खत्म हो गए। होली, ईद, दिवाली, गाँव, खेत-खलिहान और गाँव की गोरियाँ खत्म हो गईं। अभिनेता सीधा हेलिकॉप्टर से उतरता है और इससे नीचे कोई बात ही नहीं होती है। कुल मिला कर अलग तरह के किरदार करने के लिए खुद की छवि को तोड़ना पड़ता है, कम्फर्ट (आराम) शब्द ने कलाकारों को पैरासाइट (परजीवी) बना दिया है। मुझे इससे दूर रखने का बड़ा श्रेय रोहित शेट्टी को भी जाता है जिन्होंने पहले मुझे ज़मीन में खलनायक का किरदार दिया और गोलमाल में वसूली भाई का।

सिनेमा में भाषा का बिगड़ता स्वरूप
सिनेमा में भाषा के बिगड़ते स्वरूप पर भी मुकेश जी ने कई अहम बातें कहीं। उनके मुताबिक सिनेमा में जिस हिसाब से भाषा का स्वरूप बिगड़ा है उसे सुधारना फिलहाल के लिए बहुत मुश्किल है क्योंकि हम सिनेमा को समाज का आईना मानते हैं। ऐसे में नुकसान दोनों तरफ से हो रहा है और दोनों का हो रहा है। अगर समाज में भाषा का स्वरूप बिगड़ा है तो सिनेमा में भी बिगड़ेगा और सिनेमा में भाषा का स्वरूप बिगड़ रहा है तो समाज में भी कुछ अलग नहीं होगा।
इसका एक और बड़ा कारण है, हमने हर तरह के लोग तैयार किए डॉक्टर, इंजीनियर, खिलाड़ी लेकिन शिक्षक नहीं बनाए। कोई संस्थान ऐसा नहीं है जो शिक्षक तैयार करता है। हमें इस बात को खारिज करना होगा कि आधुनिकता का पैमाना एक भाषा है, लिंगो और एक्सेन्ट कभी आधुनिकता का पैमाना नहीं हो सकते हैं। कोई अमेरिकन एक्सेन्ट में बात करता है या ब्रिटिश एक्सेन्ट में, इसे आधुनिकता का पैमाना बनाना सही नहीं है।

वेब सीरीज़ = सेमी पॉर्न
वेब सीरीज़ के दौर में स्थानीय सिनेमा पर क्या असर पड़ सकता है? सवाल के जवाब में उन्होंने कहा वेब सीरीज़ और हाल फिलहाल के कॉन्टेंट से स्थानीय सिनेमा और रंगमंच पर कोई असर नहीं पड़ेगा। जब शुरू-शुरू में तमाम चैनल आए थे ज़ी, स्टार, वी तब सभी को लगा था कि कलाकार भूखे मरने वाले हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
लेकिन वेब सीरीज़ के कुछ बुरे पहलू भी हैं, आखिरकार वह बना सेमी पॉर्न ही रहे हैं। वेब सीरीज़ बनाने वालों के पास एक सुनहरा मौका था कि वह सरकार को बता पाएँ जब दर्शकों को कुछ दिखाने की आज़ादी हो तो कितने बेहतर पहलू सामने लाए जा सकते हैं। बेशक सौन्दर्य पर कालिदास ने भी लिखा है लेकिन वेब सीरीज़ में ज़्यादातर कला की उल्टी हो रही है।

अभिनय का अलग दर्शन है
छोटे शहरों से आने वाले युवाओं के सामने आने वाली दिक्कतों पर भी मुकेश तिवारी ने कई अहम बातें कहीं। उन्होंने कहा कलाकारों के लिए एक सवाल का जवाब तलाशना बहुत ज़रूरी है ‘वह क्यों अभिनेता/अभिनेत्री बनना चाहते हैं’? जो जीवन में कुछ नहीं कर पाया वह फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बनेगा यह मानसिकता गलत है और फिल्म इंडस्ट्री में ग्लैमर-चकाचौंध है, यह मानसिकता भी गलत है।
हर कलाकार की ज़िन्दगी में एक संघर्ष यात्रा होती है और इसका होना भी बहुत ज़रूरी है, अभिनेता बनने के लिए एक पूरी ज़िन्दगी खर्च करनी पड़ती है। अभिनय का भी एक दर्शन है, अभिनय आत्मा से जुड़ा है, ज़ेहन से जुड़ा है, यह महज़ ब्रांडेड जूतों और कपड़ों तक सीमित नहीं है। अगर युवा ऐसी सोच रखते हैं कि सिर्फ खलनायक को मार कर धौंस जमानी है, अपना रुतबा दिखाना है तो ऐसी सोच के साथ अभिनय में आना अच्छा नहीं है। दिखावे में रहना है तो मॉडलिंग करिए, उसके लिए सबसे बेहतर विकल्प है।

खिड़की से खरीदते थे टिकट
इसके बाद फिल्मों को लेकर लोगों के जज़्बातों में आए बदलावों पर मुकेश तिवारी ने कहा, पहले सब कुछ इतनी आसानी से उपलब्ध नहीं था। पहले बड़े से बड़े शहर में एक फिल्म चुनिन्दा थियेटर में लगती थी और उनमें सिंगल स्क्रीन हुआ करती थी। इतने के बाद उस फिल्म को रील के ज़रिये किसी छोटे शहर में पहुँचते-पहुँचते महीनों लग जाते थे।
हमारे जैसे युवा महीनों इंतज़ार करके खिड़की पर घंटों खड़े होकर टिकट खरीदते थे लेकिन आज आप अपने मोबाइल फोन में पलक झपकते ही टिकट खरीद सकते हैं। पहले हमारे पास विकल्प ही नहीं हुआ करते थे लेकिन आज तमाम विकल्प मौजूद हैं।
पहले लगता था यह फिल्म नहीं देखेंगे तो बवाल हो जाएगा। पता नहीं बाद में देखने का मौका मिलेगा भी या नहीं लेकिन अभी तमाम विकल्प हैं। यही कारण था कि पहले कलाकारों के चाहने वाले उन्हें देख कर बेहोश हो जाते थे लेकिन अभी ऐसे नज़ारे कम ही देखने मिलते हैं।

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