जवाहरलाल नेहरु की वसीयत में गंगा

आनंद मोहन माथुर

सरकार ने जो 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने के समय हिन्दू मुसलमानों में फर्क डाला उससे फिलहाल तो भाजपा जीत गई लेकिन देश हार गया। यही कहानी 2002 के गुजरात दंगों की है। झूठे बयान देकर और गुजरात के लगभग 10000 मुसलमानों के कत्ल का कोई उचित जवाब या स्पष्टीकरण नहीं मिला। ऐसे ही जब दिल्ली में दंगे हो रहे थे और मानवता का खात्मा तथा पशुता की सीमा पार हो रही थी तब देश का प्रधानमंत्री अपने व्यक्तिगत मेहमान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प और उसके परिवार की मेहमानदारी अभूतपूर्व ढंग से अहमदाबाद में कर रहे थे। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के उच्च अधिकारियों में 50 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम थे, जिनमें रिसालदार काले खां, तहसीलदार मोहम्मद हुसैन, तोपची गुलाम ग़ोस खां, कुंवर खुदा बक्ष। हवलदार गुरबक्ष सिंह और सहेली दलित झलकारी बाई थी। झांसी की रानी के समान मध्यभारत के अमझेरा राज्य के महाराजा बख्तावर सिंह के प्रमुख पदाधिकारियों में सेनापति और मुख्य सचिव बशीरउल्ला खां गुप्तचर प्रमुख शेख सैफुद्दीन, इन्दौर में नियुक्त अमझेरा के वकील हैदर खां, महाराज के विश्वस्त योद्धा शाह रसूल खां, बशीरउल्ला खां, जमादार अता मोहम्मद, गुल खां तोपची और मुंशी नसरउल्ला खां सभी मुसलमान थे।

1857 के विद्रोह में तत्कालीन बहुसंख्यक समाज के लोगों ने मुस्लिम समाज पर पूरा भरोसा किया और उनकी वफादारी पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठाया। राजा बख्तावर सिंह को पकड़वाने का श्रेय तो दो गद्दार देवी प्रसाद और नारायण राव थे। गद्दारी धर्म, जाति नहीं देखती।

राष्ट्रभक्ति या राष्ट्रवाद मापने का कोई यंत्र नहीं है। वफादारी कोई गोली तो है नहीं आपने खिला दी और आदमी एक घंटे में वफादार हो गया। अगर मुस्लिम समुदाय की वफादारी पर अभी तक शक नहीं था तो आज सरकार द्वारा दोनों समुदायों के बीच शक पैदा करना असंवैधानिक कार्य है। इसलिए यह कहना कि मुस्लिमों को वफादारी साबित करना चाहिए तो उन्हें याद रखना चाहिए कि वफादारी की डिग्री का कोई विश्वविद्यालय नहीं है। अचानक हिन्दूवादी सरकार बहुमत में आने से किसी भी हिन्दुस्तानी की वफादारी पर शक कैसे किया जा सकता है। नफरत के माहौल की जगह मोहब्बत का माहौल पैदा कीजिए, अविश्वास की जगह विश्वास का वातावरण निर्मित कीजिए और आपको इस देश की एकता, इतिहाद और इत्तिफाक को मजबूती मिल जाएगी।

विश्वास, विश्वास पैदा करता है और अविश्वास, अविश्वास पैदा करता है। यह बात यदि बहुसंख्यक समाज समझकर अल्पसंख्यक मुस्लिमों से व्यवहार करे तो यह वफादारी की समस्या बहुत जल्दी सुलझ सकती है। हिंदु बहुसंख्यक समाज को हाथ बढ़ाना होगा, सूरत बदल जाएगी। डॉ. बशीर बद्र ने दो मिसरे कहे हैं:-
‘‘प्यार जिंदा है जमाने में भले लोगों से
प्यार का नाम लड़ाई से नहीं चलता है’’
फर्जी राष्ट्रवाद – तानाशाही का जन्म

जब देश गुलाम होता है तो राष्ट्रवाद उस भावना का नाम है जो गुलामों को एक दूसरे से जोड़ती है और आजादी के लिए मर मिटने का जोश भरती है। किन्तु जब देश आजाद हो जाता है तब यही राष्ट्रवाद एक संकुचित फासीवाद बन जाता है। जो बहुसंख्यक समाज है, उसके विचार, उसकी मान्यताएं हैं, उसके निर्णय हैं, वे सही हैं और जो अल्पसंख्यक हैं उन्हें इन्हें मनाना चाहिए। बहुसंख्सक समाज ही राष्ट्र है अल्पसंख्यक का यह कर्तव्य है कि बहुसंख्यक समाज के हर फैसले को वह माने चाहे वह कितना ही निरंकुश अथवा अवैधानिक क्यों न हो।

यह फर्जी राष्ट्रवाद हिंदू एवं मुस्लिम ध्रुवीकरण में बदल जाता है और प्रजातंत्र समाप्त हो जाता है। इसका उदाहरण है हल्दीघाटी का युद्ध जिसमें मुगलों की सेना का नेतृत्व राजा मानसिंह कर रहे थे और राणा प्रताप की सेना का नेतृत्व हकीम खां सूरी कर रहे थे।

सन् 1857 के विद्रोह में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की फौज का नेतृत्व तोपची गुलाम गौस खां कर रहे थे, फौज में काले खां, मोहम्मद हुसैन कुंवर खुदा बक्ष थे तो मध्यभारत में राव राणा बख्तावर सिंह अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे जिनकी फौज का नेतृत्व बशीरउल्ला खां कर रहे थे और उनका साथ दे रहे थे शेख सैफुद्यीन, रसूल खां, अता मोहम्मद, गुल खां और नसरूल्ला खां। राणा कहां छुपे थे:- लालगढ़ किले का पता अमझेरा के देवी प्रसाद ने ही दिया और अज्ञातवास से जिसने पकड़वाया वह था नारायण राव। लोग गद्दारी के लिए जयसिंह और मीर जाफर की मिसाले देते हैं। एकता, देशभक्ति के लिए बहुसंख्यक समाज को विश्वास, समानता, भाईचारों का वातावरण पैदा करना है।
गद्दारी और धर्म (मजहब) का कोई ताल्लुक नहीं। हिंदू धर्म का लचीलापन दया, धर्म तो मशहूर है लेकिन कुरान ने मुसलमानों को जो उपदेश दिए हैं उसमें प्रमुख हैं:-
कुरान मजीद
‘‘धर्म के विषय में किसी पर कोई जबरदस्ती नहीं’’
(कुरआन: 2.256)
‘‘क्या तू लोगों को मजबूर करेगा कि मोमिन हो जाएं ऐसा मत करना’’
(कुरआन: 10.99)
‘‘ये लोग ईश्वर को छोड़कर जिन की उपासना करते हैं उनको गाली मत दो’’
(कुरआन: 6.108)
‘‘जो लोग जुल्म के साथ यतीमों के माल खाते हैं दरहकीकत वह अपना पेट आग से भरते हैं’’
(कुरआन: 4.10)
‘‘अच्छा व्यवहार करते रहो, माता पिता के साथ, सगे संबंधियों के साथ बल्कि दूर वाले पड़ोसियों के साथ’’
(कुरआन: 4.36)
नेहरू का वसीयतनामा
जवाहरलाल नेहरू ने 21 जून 1954 को अपना एक वसीयतनामा लिखा था। इसमें उन्होंने लिखा-मुझे इतना मिला कि मैं उसके बोझ तले दब गया हूं। मैं केवल यहीं आशा प्रकट कर सकता हूं कि आगे जितने वर्ष में जिन्दा रहूं अपने लोगों के प्रेम के आयोग्य न बनूं।
मैं पूरी गंभीरता के साथ यह घोषित करना चाहता हूं कि मेरी मृत्यु के बाद मेरे लिए कोई धार्मिक अनुष्ठान न किया जाए, इस तरह के अनुष्ठानों में मेरी कोई आस्था नहीं है। नेहरू प्रकृति के प्रेमी थे और इलाहाबाद उनका निवास था, जहां गंगा और जमुना दोनों बहती थी और नेहरू को बचपन से उनसे लगाव था। उन्होंने मौसम के बदलते रंग में गंगा जमुना को देखा उन्होंने संबंध में इतिहास, परंपराओं, गीतों और कहानियों को सुना। उनका विशेष लगाव गंगा से था क्योंकि भारतीय सभ्यता इसी गंगा के आस पास शुरू हुई पली-बढ़ी, मिट्टी से फिर उठी खड़ी हुई। इकबाल ने भी लिखा था।
‘‘ऐं आबे रोदे गंगा, वो दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा।
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिंदी है हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा’’
तो जितना प्यार इकबाल को गंगा से था, उतना ही नेहरू का था। इसलिए उन्होंने इच्छा प्रकट की थी कि उनका अंतिम संस्कार गंगा के किनारे किया जाए और मुट्ठी भर अस्थियां गंगा में प्रभावित की जाएं, बाकी अंश बचा कर रखा जाए।
नेहरू ने लिखा है कि वो चाहते थे भारत संकुचित जंजीरों से अपने आप को मुक्त करे और जनता में जो अलगाववाद की भावना पैदा हो गई है उसे तोड़ दिया जाए। वो इतिहास की विरासत को अपने आप से जोड़ना चाहते थे, वो इसे धरोहर मानते थे।
मैं चाहता हूं कि मेरे मरने के बाद मेरा दाह संस्कार हो। अगर विदेश में मरूं तो वहीं मेरा दाह संस्कार किया जाए परन्तु मेरी अस्थियां इलाहाबाद लाई जाएं, इनमें से मुठ्‌ठीभर गंगा में प्रभावित की जाए। गंगा से जहां तक मेरा संबंध है कोई धार्मिक भावुकता नहीं है। बचपन से ही मेरी इलाहाबाद की गंगा और जमुना से मेरा लगाव रहा है। जैसे जैसे उम्र बढ़ती गई वैसे वैसे ये लगाव बढ़ता गया।

गंगा विशेषकर वह नदी है जिससे जनता प्यार करती है और जिसके इर्द गिर्द उसकी जातीय स्मृतियां, उसकी आशाएं, आकांक्षाएं, उसके विजय गीत, उसकी विजय और पराजय का ताना-बाना जुड़ा हुआ है। गंगा मेरे लिए भारत के अतीत का एक प्रतीक है और स्मृति के रूप में रही है जो वर्तमान काल में आकर बहती है और भविष्य के महासागर में बहकर चली जाती है। मेरी मुट्ठीभर भस्म गंगा में प्रभावित होकर उस महासागर में मिल जायेगी जो हमारे देश के तटों को पखारता है।

मेरी भस्मी का अधिकांश हिस्सा आकाश में ऊॅंचे एक विमान में ले जाया जाए और खेतों के ऊपर जहां हमारे किसान मेहनत करते हैं बिखराया जाए ताकि वो भारत की धूल और मिट्टी में सन जाए और एक अनचिह्ना अंश हो जाए।’’

 

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