Kashmir मामले में Pakistan को नहीं मिला साऊदी का साथ

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जो साऊदी अरब (Saudi Arab) पहले कश्मीर मुद्दे (Kashmir Issue) पर पाकिस्तान (Pakistan)का साथ दिया करता था अब वह तटस्थता बरत रहा है। पाकिस्तान की तमाम कोशिश के बाद भी सऊदी अरब ने कश्मीर के मुद्दे पर अपनी तटस्थता को बनाए रखा है। खाड़ी देशों में उसकी लगातार मशक्कतों के बाद भी समर्थन न जुटाने को उसकी कूटनीतिक विफलता माना जा रहा है।

सामरिक विश्लेषक और उसांस फाउंडेशन के सीईओ अभिनव पांड्या बताते हैं कि 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सऊदी अरब के संबंध हमेशा अच्छे बने रहे हैं। अक्टूबर 2019 में प्रधानमंत्री के रियाद दौरे के बाद से सऊदी अरब कश्मीर के मसले पर अपनी तटस्थता बनाए हुए है। यही नहीं उसने सीमा पार से हो रहे आंतकवाद की भी निंदा की।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सऊदी अरब ने पूर्व में कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान का साथ दिया था। वर्तमान में हालात बदल गए हैं। अब सऊदी अरब कश्मीर के मामले में तटस्थता ही बनाकर चल रहा है। सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान की दूरियां उस समय से और ज्यादा बढ़ गईं, जब पाकिस्तान ने सऊदी अरब के नेतृत्व वाले आर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोआपरेशन (ओआईसी) की कश्मीर के मसले पर बैठक बुलाने की मांग की थी।

सऊदी के संबंधों में ये दूरियां उस समय और ज्यादा हो गईं, जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने धमकी दे दी कि यदि सऊदी अरब ने विदेश मंत्रियों की कश्मीर मुद्दे पर बैठक नहीं बुलाई तो पाक ईरान, मलेशिया और तुर्की से समर्थन के लिए बात करेगा। उसके बाद से पाकिस्तान की सऊदी अरब को मनाने की निरंतर कोशिश चलती रहीं, लेकिन सऊदी अरब पाक से दूर होता चला गया।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को लेकर उत्साहित जरूर होते रहते हैं, लेकिन उन्होंने इस परियोजना के गेट वे गिलगित-बाल्टिस्तान की हमेशा उपेक्षा की है। यहां तक कि इस क्षेत्र को आवंटित धन और परियोजनाओं को दूसरे क्षेत्रों में लगा दिया गया। यही कारण है कि इमरान की नीतियों के कारण ही यह योजना परवान नहीं चढ़ पा रही है। गुलाम कश्मीर का यह क्षेत्र काफी पिछड़ा और विकास से दूर है।

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