खुद ही खाने का निमंत्रण देती मिठाई ‘खाजा’

अर्ध्देन्दु भूषण

बिहार के गांव के हलवाई भी खाजा बनाना जानते हैं, लेकिन बीकानेर की भुजिया, मुरैना की गजक और आगरे के पेठे जैसे ही मशहूर है सिलाव का खाजा। जैसे अपने मध्यप्रदेश में हर गजक की दुकान पर मुरैना की गजक का बोर्ड लगा होता है, वैसे ही बिहार में हर खाजा की दुकान के बाहर आपको सिलाव का खाजा का बोर्ड लगा मिलेगा।

बिहार और उत्तरप्रदेश में शादी-ब्याह तथा अन्य खुशी के मौकों पर एक मिठाई की डिमांड सबसे ज्यादा रहती है। यहां तक की बेटी को विदा करते समय भी 15-20 टोकरी यही मिठाई साथ में भेजी जाती है। आप सोच रहे होंगे इतनी टोकरी क्यों, जनाब इसका साइज ही इतना बड़ा होता है कि यह डिब्बे में समाएगा ही नहीं। हालांकि आजकल यह मिठाई छोटे साइज में भी बनने लगी है, लेकिन उसमें वह बात कहां। सबसे खास बात यह कि यह मिठाई खुद ही आपको खाने के लिए निमंत्रित करती है, क्योंकि इसका नाम ही है ‘खाजा।‘

बिहार के गांव-गांव के हलवाई खाजा बनाना जानते हैं, लेकिन बीकानेर की भुजिया, मुरैना की गजक और आगरे के पेठे जैसे ही मशहूर है सिलाव का खाजा। जैसे अपने मध्यप्रदेश में हर गजक की दुकान पर मुरैना की गजक का बोर्ड लगा होता है, वैसे ही बिहार में हर खाजा की दुकान के बाहर आपको सिलाव का खाजा का बोर्ड लगा मिलेगा। यहां का खाजा ऑनलाइन पूरे देश के साथ विदेश में भी बेचा जाता है।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा में स्थित सिलाव में गली-गली खाजा बनाने की दुकानें हैं। सिलाव राजगीर और बिहारशरीफ के बीच स्थित है। सिलाव के पास ही नालंदा है, जहां देश-विदेश के पर्यटक आते रहते हैं। इसलिए न सिर्फ देश में, बल्कि विदेशों में भी सिलाव के खाजा की पहुंच बनी हुई है। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए ही वर्ष 2015 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खाजा निर्माण को उद्योग का दर्जा दिया था। साथ ही इस उद्योग को सरकार की क्लस्टर विकास योजना से भी जोड़ा गया था। कुछ वर्षों के बाद भारत सरकार ने सिलाव के खाजा को जीआई टैग भी दे दिया।

जीआई टैग मिलने के बाद सिलाव के खाजा की ऑनलाइन बिक्री सबसे पहले संजय लाल की काली शाह नाम के दुकान ने शुरू की है। अभी सिलाव में खाजा की करीब 75 दुकानें हैं। यहां पर खाजा बनाने की परंपरा सैकड़ों साल से है। कुशवाहा और काली शाह का परिवार लंबे अर्से से इस कारोबार से जुड़ा हुआ है। इस वजह से इन दोनों के नाम से सिलाव में आज भी कई दुकानें चलती हैं। पिछले कुछ दशकों में खाजा के कई कारोबारियों ने इस कारोबार को छोड़ दिया, लेकिन काली शाह के वंशज आज भी विरासत को संभाले हुए हैं। काली शाह के परिवार ने ही खाजा की ऑनलाइन बिक्री शुरू की है।

यहां का खाजा कोलकाता, बनारस, लखनऊ, कानपुर, मुंबई सहित कई शहरों के अलावा लंदन, दुबई और पेरिस तक पहुंच चुका है।
इस मिठाई को बनाने के लिए सबसे पहले मैदे में पानी डाल कर उसे लचीला होने तक गूँथा जाता है। फिर उसे 10 मिनट के लिए गीले कपड़े से ढँक कर छोड़ देते हैं। फिर उसकी छोटी-छोटी लोई काटकर रोटी की तरह पतला बेला जाता है। अब कटोरी में थोड़ा सा तेल लेकर उसमें चावल का आटा मिलाया जाता है और इससे एक घोल तैयार किया जाता है। फिर एक रोटी लेकर उसके ऊपर घोल का लेप अच्छी तरह से लगा दिया जाता है, फिर उसके ऊपर दूसरी रोटी रखकर उसके ऊपर भी घोल का लेप लगाया जाता है। इसी तरह कम से कम पाँच रोटियां एक के ऊपर रखीं जाती हैं। फिर इस रोटियों के बंडल का रोल बनाया जाता है। फिर उनमें से 2 -2 अंगुल का टुकड़ा काट कर गरम तेल में अच्छी तरह से सुनहरा भूरा होने तक फ्राई किया जाता है। फ्राई करते समय इसे लगातार हिलाना पड़ता है, ताकि इसकी परतें खुल जाएं। अब इन्हे गर्म चीनी की चाशनी में अच्छे से डुबो कर कुछ देर तक छोड़ दिया जाता है। बस, अब यह तैयार है आपके मुंह में मिठास घोलने के लिए।

यह मिठाई दिखने में पेटीज जैसी होती है। इसकी खासियत इसकी परतें ही हैं। सिलाव में यूं तो कई परतों वाला खाजा बनता है, लेकिन 52 परत वाला खाजा सबसे ज्यादा मशहूर है। यह खाने में ज्यादा कुरकुरा और कम मीठा होता है, जिसकी वजह से लोग इसे पसंद करते हैं। सिलाव में खाजा बनने के चार प्रकार हैं। जल्द खराब नहीं होने वाली इस खास मिठाई के यहां चार प्रकार- मीठा खाजा, नमकीन खाजा, देशी घी का खाजा और सादा खाजा बनाए जाते हैं।

सिलाव का खाजा विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन कार्यक्रमों में अपनी पहचान बनाने में भी कामयाब रहा है। वर्ष 1987 में मॉरीशस में हुए अंतर्राष्ट्रीय मिठाई महोत्सव में सिलाव के खाजे को अंतर्राष्ट्रीय पुरास्कार मिल चुका है। इसके अलावा दिल्ली, पटना, जयपुर व इलाहाबाद में लगी प्रदर्शनियों में भी खाजा को स्वादिष्ट मिठाई का पुरस्कार मिल चुका है।

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