ज्योतिरादित्य की तरह सचिन पायलट भी कर चुके हैं अपनी सरकार की आलोचना

विभव देव शुक्ला

मध्य प्रदेश की राजनीति ने पिछले कुछ दिनों में उतार चढ़ाव का एक लंबा दौर देखा। ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस कदम के बारे में शायद ही किसी ने सोचा होगा। गुज़रे कई महीनों से जारी राजनीतिक खींचतान के बाद ज्योतिरादित्य ने ऐसा कदम उठाया जो हर किसी के लिए हैरान कर देने वाला था।
ज्योतिरादित्य ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से 20 साल पुराना रिश्ता एक झटके में खत्म कर दिया। लेकिन इसके अलावा राजस्थान की राजनीति में भी युवा चेहरा है जिनकी अपनी सरकार के प्रति नाराज़गी अक्सर सामने आती रहती है। राजस्थान की राजनीति का ऐसा ही नाम है सचिन पायलट।

ज्योतिरादित्य के साथ कई नेताओं का इस्तीफ़ा
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव एक साथ हुए थे और तीनों ही राज्यों में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। फिलहाल मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस से इस्तीफ़ा देने के बाद कई मंत्रियों और विधायकों ने भी पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया। विधायकों के इस्तीफ़े का सीधा अर्थ है प्रदेश की कमलनाथ सरकार पर संकट। ज्योतिरादित्य ने इस्तीफ़ा देने के लगभग 1 दिन बाद भाजपा की सदस्यता भी ले ली।

सरकार की जवाबदेही
इतना कुछ होने के बाद राजस्थान की राजनीति के जाने पहचाने चेहरे सचिन पायलट के नाम की चर्चा भी ज़ोरों पर है। नाम से ज़्यादा चर्चा उन घटनाओं और बातों की हो रही है जब सचिन पायलट ने राजस्थान सरकार के प्रति नाराज़गी जताई थी। हाल ही में राजस्थान के कोटा स्थित एक सरकारी अस्पताल में बीमारी के चलते लगभग 110 बच्चों की मौत हुई थी।
जिसके बाद गहलोत सरकार की खूब आलोचना हुई थी। इस घटना पर सचिन पायलट ने कहा था ‘मैं आज यहाँ पर एक ज़िम्मेदारी के साथ आया हूँ। मैं इस पूरी व्यवस्था को देख कर काफी आहत हूँ और मैं पुनः कह रहा हूँ कि हम लोगों को जवाबदेही तय करनी पड़ेगी। हमारे पास जवाबदेही तय करने के अलावा कोई और चारा नहीं है, इतने बच्चे मरे हैं इसकी जवाबदेही लेने के लिए कोई तैयार ही नहीं है।’

पिछले सरकार से सवाल क्यों
इसके बाद उन्होंने कहा इस पूरी घटना पर हमारी प्रतिक्रिया और संवेदनशील हो सकती थी। इस तरह की घटनाओं को लेकर हमें और सक्रिय होना पड़ेगा। इतने महीनों का समय गुज़र जाने के बाद यह सही नहीं कहा जा सकता कि हम पिछली सरकार की लापरवाही पर सवाल करें।
अगर उन्होंने गलती नहीं की होती तो उन्हें सत्ता से बाहर क्यों किया गया होता? जनता ने हम पर भरोसा जताया है इसलिए हमें ज़िम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी। बच्चों की मौत कोई आम घटना नहीं है, हम सरकार में है इसलिए हमें सबसे पहले खुद सक्रिय होना पड़ेगा।

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